2004 से 2013 के बीच जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से निपटने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया गया था। इस अवधि के दौरान आतंकवाद-रोधी अभियानों (Counter-insurgency operations), नियंत्रण रेखा (LoC) पर बाड़ लगाने और पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण हिंसक घटनाओं और घुसपैठ की घटनाएं हुई।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
मोदी-शाह के कार्यकाल में जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव, आतंकवाद पर केंद्रित हुई कार्रवाई।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है। केंद्र सरकार ने आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हुए सुरक्षा एजेंसियों को आतंकियों, उनके सहयोगियों और वित्तीय नेटवर्क पर समन्वित कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर का प्रशासनिक ढांचा केंद्र सरकार के सीधे नियंत्रण में आया। इसके बाद सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ा और आतंकवाद विरोधी अभियानों की गति तेज हुई। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA), जम्मू-कश्मीर पुलिस, सेना और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों ने आतंकवाद के वित्तपोषण, हवाला नेटवर्क, ओवर ग्राउंड वर्कर्स (OGWs) और नार्को-टेरर नेटवर्क के खिलाफ लगातार अभियान चलाए।
केंद्र सरकार के अनुसार, नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ रोकने के लिए निगरानी और तकनीकी संसाधनों को मजबूत किया गया है। सुरक्षा बलों के अभियानों के दौरान पहले की तुलना में पथराव की घटनाओं में कमी दर्ज की गई है, जिससे आतंकवाद विरोधी अभियान अधिक प्रभावी ढंग से संचालित हो रहे हैं।
गृह मंत्रालय ने आतंकवाद के खिलाफ अभियान को मिशन मोड में संचालित करते हुए “जीरो इनफिल्ट्रेशन” का लक्ष्य निर्धारित किया है। सुरक्षा एजेंसियां आतंकियों के साथ-साथ उनके समर्थन तंत्र, फंडिंग नेटवर्क और हथियार एवं मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़े गिरोहों पर भी कार्रवाई कर रही हैं।
केंद्र सरकार का कहना है कि वर्तमान सुरक्षा नीति का उद्देश्य केवल आतंकियों का सफाया करना नहीं, बल्कि आतंकवाद के पूरे इकोसिस्टम को समाप्त कर जम्मू-कश्मीर में स्थायी शांति, सुरक्षा और विकास का वातावरण सुनिश्चित करना है। इसी रणनीति के तहत सुरक्षा और खुफिया एजेंसियां लगातार समन्वित अभियान चला रही हैं।
आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में सुरक्षा नीति को पूरी तरह बदल दिया गया है। पहले की तुलना में आज की स्थिति और नीतियों में प्रमुख अंतर इस प्रकार हैं:
- स्थानीय लोगों और सेना के बीच झड़पें (2004-2013)
अशांति और कानून व्यवस्था: इस कार्यकाल के दौरान कश्मीर घाटी में बड़े पैमाने पर नागरिक विरोध प्रदर्शन और सुरक्षा बलों के साथ झड़पें आम थीं।
प्रमुख आंदोलन: 2008 का अमरनाथ भूमि विवाद और 2010 का कश्मीर आंदोलन (जो माछिल फर्जी मुठभेड़ के बाद भड़का था) इस दौर की सबसे बड़ी घटनाएं थीं। इन आंदोलनों के दौरान सुरक्षा बलों पर भारी पथराव (Stone Pelting) होता था, जिससे निपटने के लिए सेना और अर्धसैनिक बलों को काफी संयम बरतना पड़ता था ताकि नागरिक हताहत न हों।
दबाव: स्थानीय राजनीतिक दलों और मानवाधिकार संगठनों के दबाव के कारण सुरक्षा बलों को अक्सर कानून-व्यवस्था बनाए रखने में कड़े राजनीतिक दिशानिर्देशों का पालन करना पड़ता था, जिससे जमीनी स्तर पर सेना के अभियान जटिल हो जाते थे।
- शक्तियों का तुलनात्मक विश्लेषण: तब और अब
सुरक्षा और नीतिगत आयाम पहले (2004 – 2013) आज (मोदी-शाह कार्यकाल)
ऑपरेशनल फ्रीहैंड सुरक्षा बलों के पास कानूनन अधिकार (AFSPA) थे, लेकिन राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण कार्रवाई करने में कई बार प्रशासनिक हिचकिचाहट होती थी। सरकार ने सुरक्षा बलों को ‘फ्री हैंड’ (पूर्ण परिचालन स्वतंत्रता) दिया है, जिससे वे बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के आतंकियों के खिलाफ त्वरित निर्णय ले सकते हैं।
पथराव और नागरिक झड़पें एनकाउंटर साइट्स या प्रदर्शनों के दौरान सुनियोजित रूप से भारी पथराव होता था, जिससे आतंकवादी अक्सर बचकर भाग निकलते थे। गृह मंत्रालय की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के तहत पथराव करने वालों और उनके वित्तपोषकों (Funders) पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की गई। आज एनकाउंटर स्थलों पर पथराव की घटनाएं लगभग समाप्त हो चुकी हैं।
टेरर फंडिंग और इकोसिस्टम आतंकवादियों को स्थानीय स्तर पर हवाला और अलगाववादी नेताओं के जरिए फंडिंग मिलती थी, जिस पर पूरी तरह नकेल नहीं कसी जा सकी थी। NIA (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) को मजबूत करके टेरर फंडिंग नेटवर्क, अलगाववादी संगठनों और उनके भूमिगत समर्थकों (Over Ground Workers) के पूरे इकोसिस्टम को ध्वस्त कर दिया गया है।
संवैधानिक और राजनीतिक ढांचा अनुच्छेद 370 लागू होने के कारण दोहरी व्यवस्था थी, जिससे केंद्रीय कानूनों को लागू करने में राज्य सरकार के रुख पर निर्भर रहना पड़ता था। अनुच्छेद 370 के उन्मूलन के बाद जम्मू-कश्मीर सीधे केंद्र सरकार (गृह मंत्रालय) के नियंत्रण में आ गया है, जिससे सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित हुआ है। - आज की नीति: मिशन मोड में आतंकवाद का अंत
गृह मंत्री अमित शाह के निर्देशों के अनुसार, सुरक्षा एजेंसियां अब जम्मू-कश्मीर को पूरी तरह आतंकवाद-मुक्त बनाने के लिए ‘मिशन मोड’ और ‘जीरो इनफिल्ट्रेशन’ (शून्य घुसपैठ) के लक्ष्य पर काम कर रही हैं। इसके तहत केवल बंदूकधारी आतंकियों को ही नहीं, बल्कि ड्रग्स और हथियारों की तस्करी करने वाले नारको-आतंकवाद (Narco-Terrorism) नेटवर्क को भी पूरी तरह से उखाड़ फेंका जा रहा है।
घाटी में आतंकवाद का ‘इकोसिस्टम’ ध्वस्त: जानिए 2004-2013 के मुकाबले मोदी-शाह युग में कैसे बदली कश्मीर की सुरक्षा रणनीति
श्रीनगर/नई दिल्ली:
जम्मू-कश्मीर में बीते दो दशकों में सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी रणनीतियों में एक बड़ा बदलाव आया है। साल 2004 से 2013 के दौर और आज के ‘मोदी-शाह’ कार्यकाल की तुलना करें, तो यह साफ दिखता है कि केंद्र सरकार ने कश्मीर में सुरक्षा बलों को न केवल ‘फ्री हैंड’ दिया है, बल्कि आतंकवाद के पूरे तंत्र (Eco-system) पर कड़ा प्रहार किया है।
2004-2013: दोहरी चुनौतियों से जूझते सुरक्षा बल
उस दशक में सुरक्षा बलों के पास AFSPA जैसे मजबूत कानूनी अधिकार तो थे, लेकिन उन्हें दोहरे मोर्चों पर लड़ना पड़ता था। एक तरफ बंदूकधारी आतंकवादी थे, तो दूसरी तरफ आतंकियों को बचाने के लिए आगे आने वाली स्थानीय भीड़।
सड़कों पर सुनियोजित पथराव: मुठभेड़ स्थलों (Encounter Sites) पर सुरक्षा बलों का ध्यान भटकाने के लिए भारी पथराव किया जाता था, जिसका फायदा उठाकर कई बार आतंकी भागने में सफल हो जाते थे।
नागरिक अशांति और राजनीतिक दबाव: 2008 के अमरनाथ भूमि विवाद और 2010 के घाटी आंदोलनों के दौरान सुरक्षा बलों और स्थानीय लोगों के बीच तीखी झड़पें हुईं। तत्कालीन राजनीतिक संवेदनशीलताओं के कारण सुरक्षा बलों को अत्यधिक संयम बरतने के कड़े निर्देश थे, जिससे आतंकवाद-रोधी अभियानों की गति प्रभावित होती थी।
मोदी-शाह कार्यकाल: ‘जीरो टॉलरेंस’ और फ्री हैंड नीति
आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में सुरक्षा चक्र पूरी तरह बदल चुका है। सरकार ने “आतंकवाद को जड़ से उखाड़ने” के लिए ‘मिशन मोड’ में नीतियां लागू की हैं:
मुठभेड़ स्थलों पर सख्त घेराबंदी: अब ऑपरेशन के दौरान आम नागरिकों या पत्थरबाजों की दखलअंदाजी को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। ‘फ्री हैंड’ मिलने से सुरक्षा बल बिना किसी बाहरी या राजनीतिक दबाव के त्वरित फैसले ले रहे हैं।
टेरर फंडिंग और अलगाववाद पर नकेल: गृह मंत्रालय के निर्देश पर एनआईए (NIA) और अन्य केंद्रीय एजेंसियों ने हवाला कारोबार, अलगाववादी नेताओं के नेटवर्क और आतंकियों के मददगारों (Over Ground Workers) पर चौतरफा कार्रवाई की है। इसके परिणामस्वरूप पत्थरबाजी और हड़तालों का दौर अब पूरी तरह खत्म हो चुका है।
अनुच्छेद 370 का खात्मा और मजबूत समन्वय: अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद से जम्मू-कश्मीर में केंद्रीय कानून सीधे प्रभावी हैं। इससे सेना, अर्धसैनिक बलों (CRPF) और जम्मू-कश्मीर पुलिस के बीच खुफिया जानकारी साझा करने और संयुक्त अभियानों में अभूतपूर्व तालमेल देखने को मिला है।
आज का रुख: ‘नारको-टेररिज्म’ पर प्रहार
सुरक्षा बलों की रणनीति अब सिर्फ सीमा पार से होने वाली घुसपैठ को रोकने तक सीमित नहीं है, बल्कि सीमा पर ड्रोन के जरिए होने वाली हथियारों और ड्रग्स की तस्करी (Narco-Terrorism) को भी सख्ती से कुचला जा रहा है। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई अब सिर्फ आतंकवादियों पर नहीं, बल्कि आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले हर एक मददगार पर होगी।
