उत्तराखंड रुद्रपुर/।जिस उत्तराखंड को कभी ‘ऊर्जा प्रदेश’ बनाने का सपना दिखाया गया था, आज वही प्रदेश पीक आवर्स में बिजली की कमी से जूझ रहा है। हालात यह हैं कि पावर एक्सचेंज में करीब 10 रुपये प्रति यूनिट तक कीमत देने की स्थिति के बावजूद पर्याप्त बिजली उपलब्ध नहीं हो पा रही है। शाम चार बजे से सुबह सात बजे तक राज्य में औसतन करीब 350 मेगावाट की कमी बताई जा रही है।
इसका सीधा असर उद्योगों, गांवों और शहरों पर पड़ रहा है। यूपीसीएल के आंकड़ों के अनुसार सितंबर में यूजेवीएनएल का पीक आवर्स उत्पादन पिछले वर्ष के करीब 1094 मेगावाट से घटकर 912 मेगावाट रह गया है। यानी लगभग 170-180 मेगावाट की कमी। केंद्रीय स्रोतों से उपलब्धता में भी गिरावट आई है और टिहरी पंप स्टोरेज प्लांट की दो इकाइयां तकनीकी कारणों से बंद होने से पीक टाइम में करीब 100 मेगावाट क्षमता प्रभावित हुई है।
रुद्रपुर में उद्योग पूछ रहे हैं—बिजली कब मिलेगी?
ऊधमसिंह नगर का रुद्रपुर औद्योगिक क्षेत्र प्रदेश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे समय में जब उद्योगों को लगातार और भरोसेमंद बिजली की जरूरत होती है, रोस्टरिंग और कटौती उत्पादन व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।
यूपीसीएल ने रुद्रपुर में 24 से 30 सितंबर तक कुछ क्षेत्रों में निर्धारित शटडाउन की सूचना भी जारी की है। इसके अलावा राज्यव्यापी बिजली संकट के कारण पीक आवर्स में अलग से दबाव बना हुआ है।
फर्नेस उद्योगों पर कटौती का असर और गंभीर बताया गया है। 19-20 सितंबर से 22-23 सितंबर के बीच कुछ अवधियों में रोस्टरिंग 10 घंटे 40 मिनट से लेकर 15 घंटे तक दर्ज की गई। ग्रामीण क्षेत्रों में भी तीन से पांच घंटे तक कटौती की रिपोर्ट है।
सवाल बिजली का ही नहीं, ‘ऊर्जा प्रदेश’ के दावे का भी है
बारिश और कोयले की आपूर्ति में व्यवधान को मौजूदा संकट का एक कारण बताया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि यदि उत्तराखंड की अपनी जलविद्युत क्षमता, केंद्रीय स्रोत और बाजार से खरीद—तीनों दबाव में आ जाएं तो पीक डिमांड के समय प्रदेश की वैकल्पिक व्यवस्था कितनी मजबूत है?
यूपीसीएल ने संकट से निपटने के लिए केंद्र से अलग-अलग महीनों में 100 से 400 मेगावाट अतिरिक्त बिजली की मांग की है। एक गैस मशीन से करीब 90 मेगावाट अतिरिक्त उत्पादन की संभावना भी जताई गई है।
2027 की तैयारी में बिजली सबसे बड़ा सवाल?
विधानसभा चुनाव 2027 की ओर बढ़ते उत्तराखंड में बिजली अब केवल घरेलू उपभोक्ताओं का मुद्दा नहीं है। यह उद्योग, रोजगार, निवेश और शहरों की अर्थव्यवस्था से जुड़ा सवाल है।
सरकार के सामने चुनौती यह है कि मौजूदा संकट को केवल अस्थायी मौसमजनित समस्या के रूप में संभाला जाए या फिर पीक डिमांड के लिए दीर्घकालीन बिजली सुरक्षा की रणनीति सामने रखी जाए।
रुद्रपुर के कारोबारी और उद्योग जगत के लिए सवाल सीधा है—अगर उद्योगों को पर्याप्त बिजली नहीं मिलेगी तो उत्पादन कैसे चलेगा, रोजगार कैसे बढ़ेगा और निवेश कैसे आएगा?
और यहीं से 2027 से पहले एक बड़ा जनसवाल खड़ा होता है—
रुद्रपुर उत्तराखंड में बारिश, जलविद्युत उत्पादन में गिरावट और कोयले की आपूर्ति प्रभावित होने से बिजली संकट गहरा गया है। पीक आवर्स में करीब 350 मेगावाट की कमी के चलते रुद्रपुर समेत औद्योगिक क्षेत्रों में रोस्टरिंग हो रही है। फर्नेस उद्योगों को कई घंटों की कटौती झेलनी पड़ रही है, जिससे उत्पादन प्रभावित है। यूपीसीएल महंगी बिजली खरीदने के बावजूद मांग पूरी नहीं कर पा रहा। सरकार केंद्र से अतिरिक्त बिजली मांग रही है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सवाल है—जिस प्रदेश को ऊर्जा प्रदेश कहा जाता है, वहां उद्योग और आम जनता बिजली कटौती क्यों झेल रहे हैं?
‘ऊर्जा प्रदेश’ की पहचान बिजली उत्पादन के आंकड़ों से होगी या जनता और उद्योगों को 24 घंटे भरोसेमंद बिजली मिलने से?
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