

चलिए जानते हैं इस खास स्थान के बारे में।

कहां स्थित है महेंद्रगिरी पर्वत
महेंद्रगिरी पर्वत एक ऐतिहासिक स्थल है, जो ओडिशा राज्य के गजपति जिले में पूर्वी घाट (Eastern Ghats) की एक प्रमुख चोटी है। यह समुद्र तल से लगभग 1,501 मीटर (4,925 फीट) की ऊंचाई पर स्थित है, जो ओडिशा की दूसरी सबसे ऊंची चोटी मानी जाती है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
भगवान परशुराम: धर्म और न्याय के प्रतीक
भगवान परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं। वे ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र थे। शिवजी की कठोर तपस्या के बाद उन्हें दिव्य फरसा प्राप्त हुआ, जिससे उनका नाम परशुराम पड़ा। सहस्त्रार्जुन द्वारा उनके पिता की हत्या के बाद उन्होंने अन्याय के विरुद्ध 21 बार युद्ध कर अत्याचारी राजाओं का संहार किया। वे महान योद्धा थे ।भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महायोद्धाओं के गुरु भी थे। उनका जीवन धर्म, साहस, तपस्या और न्याय की रक्षा का संदेश देता है।
कल्कि पुराण में मिलता है वर्णन
शास्त्रों में वर्णित है किभगवान विष्णु के अवतार परशुराम ‘अष्टचिरंजीवी’ में शामिल हैं, जो कलयुग के अंत तक जीवित रहेंगे। श्रीमद्भागवत और कल्कि पुराण में यह उल्लेख मिलता है कि वे आज भी महेंद्रगिरि पर्वत पर तपस्या कर रहे हैं। साथ ही यह भी माना जाता है कि वह सूक्ष्म रूप में वहां मौजूद हैं और समय आने पर प्रकट होंगे।
क्यों लिया इस पर्वत पर रहने का निर्णय
भगवान परशुराम ने अपने पिता की हत्या का बदला लेने और अपनी माता के शोक को कम करने के लिए पृथ्वी को अन्यायी राजाओं से मुक्त करने का संकल्प लिया था। उन्होंने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर दिया था। क्षत्रियों के विनाश के बाद उन्होंने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। जब उन्होंने आखिरी बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन किया, तो इसके बाद उन्होंने संपूर्ण धरती को अपने गुरु ऋषि कश्यप को दान के रूप में दे दिया।
ऋषि कश्यप ने परशुराम जी को पृथ्वी से चले जाने का आदेश दे दिया। अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए भगवान परशुराम ने निर्णय लिया कि वह पृथ्वी पर नहीं रहेंगे। तब परशुराम जी दक्षिण समुद्र की ओर चले गए और समुद्र ने महेन्द्राचल पर्वत (महेंद्रगिरी पर्वत) पर उनके रहने की व्यवस्था की। माना जाता है कि परशुराम जी आज भी यहीं रहते हैं।

(Picture Credit- AI Generated)
किससे मिलता था चिरंजीवी होने का वरदान
भगवान परशुराम, महादेव के परम भक्त हैं। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें यह चिरंजीवी अर्थात अमर होने का वरदान दिया था। इस प्रकार वह 8 चिरंजीवियों में से एक हैं, जिनका वर्णन इस श्लोक में मिलता है –
अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।
इस श्लोक में 8 चिनंजीवियों का वर्णन किया गया है, जिसमें अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और परशुराम के साथ-साथ ऋषि मार्कण्डेय भी शामिल हैं।
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं।




