

न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि विचाराधीन भूमि ‘प्राग फार्म’ का हिस्सा है, जो लंबे समय से विवादों और न्यायिक कार्यवाहियों का केंद्र रही है। यह भूमि मूल रूप से वर्ष 1933 में तत्कालीन सरकार द्वारा प्राग नारायण अग्रवाल को पट्टे पर दी गई थी, जिसके बाद उत्तराधिकारियों के बीच विवाद उत्पन्न होने पर मामला विभिन्न न्यायालयों तक पहुंचा।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
भास्कर में प्रकाशित खबर के अनुसार, याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि उन्होंने वर्ष 2008 में लीज डीड के आधार पर भूमि पर कब्जा प्राप्त किया और अपने संसाधनों से गन्ने की फसल तैयार की। उनका कहना था कि अगस्त 2025 में जब राज्य सरकार ने भूमि का कब्जा अपने अधिकार में लिया, उस समय फसल पूरी तरह तैयार थी, किंतु उन्हें कटाई की अनुमति नहीं दी गई, जिससे उन्हें भारी आर्थिक क्षति हुई। राज्य सरकार की ओर से प्रतिवाद किया गया कि भूमि पर विधिवत कब्जा ले लिया गया है और याचिकाकर्ताओं का अधिकार केवल एक उप-पट्टे पर आधारित है, जो स्वयं विवादित है। सरकार ने यह भी कहा कि ऐसे में उन्हें भूमि पर प्रवेश या किसी भी प्रकार की गतिविधि की अनुमति देना राज्य के अधिकारों के विपरीत होगा और इससे प्रशासनिक जटिलताएं भी उत्पन्न हो सकती हैं।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायालय ने स्पष्ट किया कि, याचिकाकर्ता न तो मूल लीजधारक हैं और न ही मुख्य वाद में पक्षकार रहे हैं। उनके अधिकार व्युत्पन्न प्रकृति के हैं, जो स्वतंत्र रूप से मान्य नहीं हो सकते। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अन्य मामलों में दी गई अंतरिम राहत का लाभ स्वतः सभी पक्षों पर लागू नहीं होता।




