उत्तराखंड में सितोली की यह पौराणिक लोककथा बीजेपी की आज की राजनीतिक
संपादकीय,राजनीति में वादे और फैसले के बीच का अंतर जब बहुत बड़ा हो जाए तो जनता के बीच सवाल उठना स्वाभाविक है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) से जुड़े आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर हालिया बहस ने इसी अंतर को एक पहाड़ी लोक-उदाहरण के जरिए समझने का मौका दिया है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
कहा जाता है कि सिटोली चिड़िया सुबह उठकर अपनी बोली में संकल्प लेती है—आज से गंदगी नहीं खाऊंगी। दोपहर तक वही संकल्प दोहराती रहती है। शाम होते ही जब उसके सामने उसका पसंदीदा भोजन रख दिया जाता है, तो उसका पूरा संकल्प बदल जाता है। लोकभाषा में इस व्यंग्य को यूं कहा जाता है—“गु नि खानों की, खानू!”
आज यही उदाहरण राजनीतिक वादों पर तंज कसने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। सवाल बीजेपी से पूछा जा रहा है कि सामाजिक न्याय, आरक्षण और सवर्ण समाज से जुड़े मुद्दों पर उसका राजनीतिक संदेश आखिर किस दिशा में है? चुनावी दौर में एक वर्ग के बीच उम्मीद जगाने वाली भाषा और सत्ता में आने के बाद दिखाई देने वाली नीतियों के बीच कितना सामंजस्य है?
UGC से जुड़े आरक्षण के मुद्दे ने इस बहस को और तीखा कर दिया है। विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों और आरक्षण व्यवस्था को लेकर अलग-अलग समय पर उठे सवालों ने सामाजिक समूहों के बीच असंतोष को हवा दी है। ऐसे मामलों में सरकार और संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि नीति का उद्देश्य, नियमों की व्याख्या और उसके सामाजिक प्रभाव को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाए।
बीजेपी की राजनीति में सवर्ण समाज लंबे समय से एक महत्वपूर्ण सामाजिक आधार रहा है। इसी कारण जब इस वर्ग को लगता है कि उसकी अपेक्षाओं के विपरीत फैसले लिए जा रहे हैं, तो राजनीतिक प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। दूसरी तरफ सरकार की ओर से सामाजिक न्याय और आरक्षण की नीतियों को संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप बताया जाता है। असली परीक्षा इसी विरोधाभास को स्पष्ट करने की है।
सिटोली की कहानी इसलिए राजनीतिक व्यंग्य का रूप ले रही है क्योंकि इसमें सुबह का वादा और शाम का व्यवहार आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं। जनता का सवाल सरल है—वादे चुनाव के समय के लिए हैं या सत्ता में आने के बाद भी उनकी वही भाषा और भावना कायम रहती है?
राजनीति में किसी भी दल को कठघरे में खड़ा करने का अंतिम अधिकार जनता के पास होता है। बीजेपी हो, कांग्रेस हो या कोई दूसरा दल—जनता अब घोषणाओं से आगे जाकर फैसलों का हिसाब मांग रही है।
सुबह कुछ, दोपहर कुछ और शाम को मूल स्वरूप—उत्तराखंड की पौराणिक लोक मान्यता कहानी,सितोली की यह लोककथा आज राजनीतिक व्यंग्य का आईना बन गई है।
UGC और आरक्षण के सवाल पर सरकार को स्पष्ट जवाब देना चाहिए। क्योंकि जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—संकल्प बदला है या सिर्फ समय के साथ बोली बदल गई है?
