हिंदू-मुस्लिम कार्ड चला तो श्रेय विकास शर्मा का, नहीं चला तो ठीकरा भी उन्हीं के सिर? किच्छा नगर पालिका चुनाव:संपादकीय | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट




नगरपालिका चुनाव में इस बार मुद्दे सिर्फ प्रत्याशी और विकास के नहीं हैं, चुनावी गणित के साथ राजनीतिक रणनीतियां भी मैदान में दिखाई दे रही हैं। रुद्रपुर के मेयर विकास शर्मा की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में खूब चर्चा है। माना जा रहा है कि उन्होंने चुनावी माहौल में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की रणनीति को हवा देने की कोशिश की है। अब सवाल यह है कि यह रणनीति वास्तव में कितनी कारगर साबित होती है?
क्षेत्र की सामाजिक संरचना को देखते हुए भाजपा को उम्मीद है कि यह राजनीतिक समीकरण उसके पक्ष में माहौल बनाने में मदद कर सकता है। मगर चुनाव केवल किसी एक कार्ड से नहीं जीते जाते। अंततः मतदाता, स्थानीय मुद्दे, संगठन की ताकत और सबसे महत्वपूर्ण प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़ भी निर्णायक भूमिका निभाती है।
यहीं से असली व्यंग्य शुरू होता है।
जीत हुई तो कहा जाएगा—रणनीति देखिए, विकास शर्मा ने कमाल कर दिया।
और अगर परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं आया तो सवाल उठेगा—आखिर इतनी बड़ी राजनीतिक बाजी किसके भरोसे खेली गई थी?
यानी पासा भाजपा के पक्ष में पड़ा तो रणनीतिकार की वाहवाही और पासा पलट गया तो राजनीतिक जिम्मेदारी भी उसी रणनीति के सबसे चर्चित चेहरे के सिर!
लेकिन कांग्रेस भी इस मुकाबले को हल्के में लेने के मूड में नहीं है। पार्टी को उम्मीद है कि उसका संगठन, प्रत्याशी की पकड़ और स्थानीय मुद्दे मतदाताओं को अपने पक्ष में ला सकते हैं। कांग्रेस का दावा है कि चुनाव परिणाम उसके पक्ष में आ सकते हैं।
दूसरी तरफ भाजपा को भरोसा है कि चुनावी ध्रुवीकरण और संगठन की ताकत उसके लिए परिस्थितियां बदल सकती हैं।
अब देखना यह है कि चुनावी गणित में कार्ड बड़ा होता है या प्रत्याशी?
यही सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स ने इससे पहले उधम सिंह नगर की राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर अपने सर्वे और विश्लेषण में संकेत दिया था कि सितारगंज को छोड़कर जिले की अधिकांश सीटों पर कांग्रेस मजबूत स्थिति में पहुंच सकती है।
लेकिन राजनीति में सर्वे पत्थर की लकीर नहीं होते। परिस्थितियां बदलती हैं, समीकरण बदलते हैं और मतदाता का मन अंतिम समय में भी बदल सकता है।
अगर इस चुनाव में भाजपा का समीकरण सफल रहता है और परिणाम उसके पक्ष में जाता है तो निश्चित रूप से यह सवाल उठेगा कि क्या विकास शर्मा की रणनीति ने वास्तव में राजनीतिक परिस्थितियों को बदल दिया?
और यदि परिणाम कांग्रेस के पक्ष में जाता है तो यही परिणाम हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स के पूर्व विश्लेषण को मजबूती देगा।
यानी फिलहाल गेंद मतदाता के पाले में है और राजनीतिक दावे अपनी-अपनी जगह खड़े हैं।
सियासत का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि चुनाव से पहले हर रणनीतिकार खुद को विजेता मानता है, लेकिन परिणाम आने के बाद जीत का श्रेय लेने वालों की संख्या बढ़ जाती है और हार की जिम्मेदारी लेने वाले कम हो जाते हैं।
इसलिए असली परीक्षा विकास शर्मा की रणनीति की नहीं, बल्कि मतदाता की समझ और प्रत्याशी की स्वीकार्यता की है।
हिंदू-मुस्लिम का राजनीतिक कार्ड कितना चला, किसके पक्ष में चला और किस सीमा तक चला—इसका फैसला मंचों पर नहीं, मतदान केंद्रों पर होगा।
और परिणाम आने के बाद शायद सबसे बड़ा सवाल यही होगा—
अगर रणनीति सफल हुई तो श्रेय किसे मिलेगा?
और अगर रणनीति असफल हुई तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
यही चुनावी राजनीति का वह आईना है, जिसमें नेता अपनी तस्वीर जीत के बाद देखना पसंद करते हैं, लेकिन हार के बाद आईना ही बदलने की कोशिश शुरू हो जाती है।