रुद्रपुर। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव जन्माष्टमी को लेकर देवभूमि उत्तराखंड में आस्था का रंग गहराने लगा है। प्रदेश के गांवों से लेकर शहरों तक मंदिरों में विशेष सजावट की जा रही है। घरों में बाल गोपाल के लिए पालने सजाए जा रहे हैं और श्रद्धालु मध्यरात्रि में भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव की तैयारी में जुटे हैं। भजन-कीर्तन, शंखनाद, घंटियों और कृष्ण नाम के जयकारों से उत्तराखंड का वातावरण भक्तिमय होने जा रहा है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर 2026 को श्रद्धा और उल्लास से मनाई जाएगी। मध्यरात्रि में बाल गोपाल का पंचामृत अभिषेक, माखन-मिश्री भोग और आरती विशेष फलदायी मानी जाती है। संतान सुख के लिए संतान गोपाल मंत्र, चंद्र दोष शांति हेतु चंद्रमा को अर्घ्य तथा समृद्धि के लिए केसरयुक्त दूध से अभिषेक करने की परंपरा है।
उत्तराखंड की धार्मिक पहचान केवल चारधाम तक सीमित नहीं है। यहां प्रत्येक जनपद में छोटी-बड़ी मंदिर परंपराएं, लोक देवताओं की आराधना और सनातन संस्कृति से जुड़े धार्मिक स्थल जनजीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। जन्माष्टमी के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा के साथ उत्तराखंड की इसी समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा की झलक भी दिखाई देती है।
प्रदेश के 13 जनपद—देहरादून, हरिद्वार, उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी गढ़वाल, पौड़ी गढ़वाल, पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा, चंपावत, नैनीताल और ऊधम सिंह नगर—में जन्माष्टमी को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह है।
रुद्रपुर में शिव शक्ति मंदिर और पंच मंदिर में विशेष आयोजन
ऊधम सिंह नगर के रुद्रपुर में जन्माष्टमी का पर्व हर वर्ष श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। शहर के शिव शक्ति मंदिर और पंच मंदिर सहित विभिन्न मंदिरों में भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा-अर्चना की तैयारी की जा रही है।
मंदिरों में फूलों, विद्युत झालरों और आकर्षक सजावट से भगवान के दरबार को सजाया जा रहा है। जन्माष्टमी की रात विशेष आरती, भजन-कीर्तन और भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का आयोजन श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र रहेगा।
रुद्रपुर की मिश्रित सांस्कृतिक परंपरा में पर्वों का अपना विशेष महत्व है। यहां उत्तराखंड की पहाड़ी संस्कृति के साथ देश के विभिन्न क्षेत्रों से आकर बसे परिवार भी कृष्ण जन्मोत्सव को श्रद्धा के साथ मनाते हैं। इसी कारण शहर के मंदिरों में जन्माष्टमी के अवसर पर धार्मिक उत्सव का व्यापक स्वरूप दिखाई देता है।
किच्छा में मंदिरों में सजेगा कान्हा का दरबार
किच्छा में भी जन्माष्टमी को लेकर धार्मिक वातावरण बनने लगा है। मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की प्रतिमाओं का श्रृंगार किया जाएगा। कई स्थानों पर झांकियों के माध्यम से कृष्ण जन्म और उनकी बाल लीलाओं को प्रदर्शित करने की तैयारी है।
कृष्ण जन्म के समय शंख और घंटियों के साथ आरती तथा प्रसाद वितरण की परंपरा भक्तों के बीच विशेष आकर्षण रखती है। परिवारों में भी बच्चों को कृष्ण और राधा के स्वरूप में सजाने की तैयारी रहती है।
सितारगंज में भजन-कीर्तन से गूंजेंगे मंदिर
सितारगंज में जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की तैयारियां की जा रही हैं। भगवान कृष्ण को माखन-मिश्री, फल, मिठाई और पंजीरी का भोग अर्पित किया जाएगा।
मध्यरात्रि में भगवान के जन्म के समय श्रद्धालु सामूहिक आरती करेंगे। कई घरों में भी बाल गोपाल के लिए पालना सजाकर उन्हें झुलाने की परंपरा निभाई जाएगी।
खटीमा में कृष्ण भक्ति के साथ लोक संस्कृति की झलक
खटीमा में जन्माष्टमी का पर्व धार्मिक उत्साह के साथ मनाए जाने की तैयारी है। मंदिरों में सजावट के साथ कृष्ण लीला से जुड़ी झांकियां श्रद्धालुओं को आकर्षित करेंगी।
उत्तराखंड की लोक परंपराओं में पर्व केवल पूजा तक सीमित नहीं रहते। इनके माध्यम से परिवार और समाज एक साथ जुड़ते हैं। जन्माष्टमी भी इसी सामाजिक और आध्यात्मिक एकता का पर्व है।
काशीपुर में मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना
काशीपुर की धार्मिक पहचान प्राचीन मंदिर परंपराओं से जुड़ी हुई है। जन्माष्टमी के अवसर पर शहर के विभिन्न मंदिरों में भगवान कृष्ण की विशेष पूजा होगी।
रात्रि में भगवान के जन्म के समय अभिषेक, श्रृंगार, आरती और भोग की परंपरा निभाई जाएगी। मंदिरों में भक्तों की आवाजाही बढ़ने के साथ धार्मिक वातावरण और अधिक भक्तिमय होने की संभावना है।
गदरपुर और दिनेशपुर में भी जन्माष्टमी का उत्साह
गदरपुर में मंदिरों में जन्माष्टमी की तैयारियां श्रद्धा के साथ की जा रही हैं। वहीं दिनेशपुर क्षेत्र में भी कृष्ण जन्मोत्सव को लेकर लोगों में उत्साह है। घरों में लड्डू गोपाल की पूजा और मंदिरों में विशेष धार्मिक कार्यक्रमों की तैयारियां चल रही हैं।
दिनेशपुर की धार्मिक-सांस्कृतिक विविधता जन्माष्टमी के अवसर पर विशेष रूप से दिखाई देती है। यहां अलग-अलग सामाजिक समुदाय कृष्ण भक्ति के पर्व में अपनी परंपराओं के अनुसार भाग लेते हैं।
देहरादून से हरिद्वार तक कृष्ण नाम की गूंज
राजधानी देहरादून में जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिरों को आकर्षक ढंग से सजाया जाता है। विभिन्न मंदिरों में भगवान कृष्ण की झांकियां, भजन-कीर्तन और विशेष आरती का आयोजन होता है।
हरिद्वार में गंगा की आध्यात्मिक धारा के बीच कृष्ण भक्ति का यह पर्व श्रद्धालुओं के लिए विशेष अनुभूति लेकर आता है। गंगा तट से लेकर मंदिरों तक धार्मिक वातावरण दिखाई देता है।
गढ़वाल और कुमाऊं में भी कृष्ण भक्ति
उत्तरकाशी, चमोली और रुद्रप्रयाग जैसे पर्वतीय जनपदों में जन्माष्टमी की पूजा स्थानीय धार्मिक परंपराओं के साथ की जाती है। टिहरी गढ़वाल और पौड़ी गढ़वाल में गांवों और कस्बों के मंदिरों में कृष्ण जन्म की कथाएं, भजन और कीर्तन आयोजित किए जाते हैं।
कुमाऊं के पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा, चंपावत और नैनीताल में भी जन्माष्टमी श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। पहाड़ों में मंदिरों की घंटियों, भजनों और लोकधुनों के बीच कृष्ण भक्ति का अलग ही रंग दिखाई देता है।
13 जनपद, एक आध्यात्मिक भाव
उत्तराखंड के सभी 13 जनपदों में जन्माष्टमी का स्वरूप स्थानीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग दिखाई दे सकता है, मगर भगवान कृष्ण के प्रति श्रद्धा का भाव एक समान है।
देहरादून, हरिद्वार, उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी गढ़वाल, पौड़ी गढ़वाल, पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा, चंपावत, नैनीताल और ऊधम सिंह नगर में कृष्ण जन्मोत्सव की तैयारियां देवभूमि की धार्मिक चेतना को और जीवंत कर रही हैं।
मध्यरात्रि में होगा कान्हा का जन्म
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में हुआ था। इसी कारण जन्माष्टमी की पूजा में निशीथ काल का विशेष महत्व माना जाता है।
रुद्रपुर से लेकर किच्छा, सितारगंज, खटीमा, काशीपुर, गदरपुर और दिनेशपुर तक श्रद्धालु रात के उस पवित्र क्षण की प्रतीक्षा करेंगे, जब बाल गोपाल का अभिषेक किया जाएगा।
दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से पंचामृत तैयार कर भगवान का अभिषेक किया जाएगा। इसके बाद उन्हें नए वस्त्र, मुकुट, बांसुरी और मोरपंख से सजाया जाएगा। माखन-मिश्री, फल, मिठाई और धनिया पंजीरी का भोग लगाया जाएगा। तुलसी दल अर्पित कर आरती की जाएगी।
भगवान के जन्म के समय मंदिरों और घरों में घंटियां तथा शंख गूंजेंगे। श्रद्धालु पालने में विराजमान लड्डू गोपाल को झुलाएंगे और ‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ के जयकारों से वातावरण कृष्णमय हो उठेगा।
उत्तराखंड के लिए जन्माष्टमी केवल पर्व नहीं, आध्यात्मिक उत्सव
देवभूमि उत्तराखंड में जन्माष्टमी का महत्व केवल भगवान श्रीकृष्ण की पूजा तक सीमित नहीं है। यह पर्व परिवार, समाज और संस्कृति को जोड़ने का माध्यम भी है। बच्चे कृष्ण और राधा का स्वरूप धारण करते हैं, महिलाएं भजन-कीर्तन करती हैं और बुजुर्ग कृष्ण कथा तथा धार्मिक प्रसंगों के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण का जीवन प्रेम, कर्म, नीति और धर्म का संदेश देता है। उनका बाल स्वरूप निश्छलता और आनंद का प्रतीक है, जबकि गीता के उपदेश मनुष्य को कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
देवभूमि के पर्वतीय गांवों से लेकर मैदानी शहरों तक जन्माष्टमी इसी आध्यात्मिक चेतना का उत्सव है। रुद्रपुर के शिव शक्ति मंदिर और पंच मंदिर से लेकर किच्छा, सितारगंज, खटीमा, काशीपुर, गदरपुर और दिनेशपुर तक, तथा देहरादून से लेकर प्रदेश के सुदूर पर्वतीय जनपदों तक कृष्ण भक्ति की एक ही धारा दिखाई देगी।
जब मध्यरात्रि में मंदिरों की घंटियां गूंजेंगी, शंखनाद होगा और बाल गोपाल पालने में विराजेंगे, तब पूरी देवभूमि एक स्वर में कहेगी—‘जय श्रीकृष्ण।’
जन्माष्टमी का यह पावन पर्व उत्तराखंड के हर घर में सुख, शांति, सद्भाव और आध्यात्मिक प्रकाश लेकर आए, यही भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में श्रद्धापूर्ण प्रार्थना है।
