उत्तराखंड में मौसम का रौद्र रूप: नैनीताल-अल्मोड़ा में रेड अलर्ट, स्कूल-कॉलेज बंद, कुमाऊं में 95 सड़कें ठप; पिथौरागढ़ की दारमा घाटी में 58% आबादी हाई रिस्क जोन में

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देहरादून। उत्तराखंड में मानसून एक बार फिर गंभीर रूप ले चुका है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 3 सितंबर को नैनीताल और अल्मोड़ा समेत प्रदेश के कई जिलों में भारी से बहुत भारी बारिश का रेड अलर्ट जारी किया है। लगातार मूसलाधार बारिश, भूस्खलन और नदी-नालों के उफान से कुमाऊं और गढ़वाल मंडल में जनजीवन प्रभावित है। पर्वतीय क्षेत्रों में स्थिति संवेदनशील बनी हुई है। इसी बीच पिथौरागढ़ की दारमा घाटी को लेकर वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों की रिपोर्ट ने खतरे की गंभीरता और बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार दारमा घाटी की करीब 58 प्रतिशत आबादी हाई या वेरी हाई रिस्क जोन में रह रही है।
नैनीताल-अल्मोड़ा में रेड अलर्ट, कई जिलों में भारी बारिश की चेतावनी
मौसम विज्ञान केंद्र देहरादून के अनुसार 3 सितंबर को देहरादून, टिहरी, उत्तरकाशी, चमोली, नैनीताल, चम्पावत, ऊधम सिंह नगर, पिथौरागढ़ और बागेश्वर में कहीं-कहीं भारी बारिश के साथ तेज गर्जना और आकाशीय बिजली चमकने की आशंका है। नैनीताल और अल्मोड़ा में भारी से बहुत भारी बारिश का खतरा देखते हुए प्रशासन को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं।
अल्मोड़ा जिला प्रशासन ने 3 सितंबर को जिले के सभी शासकीय, अशासकीय और निजी विद्यालयों, आंगनबाड़ी केंद्रों और महाविद्यालयों में अवकाश घोषित किया है। प्रशासन का प्राथमिक उद्देश्य विद्यार्थियों और कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। नैनीताल, पिथौरागढ़ और बागेश्वर में भी अधिकारियों को 24 घंटे अलर्ट मोड पर रहने के निर्देश दिए गए हैं।
पिछले 24 घंटों में कुमाऊं मंडल में बारिश से जुड़ी अलग-अलग घटनाओं में छह लोगों की मौत की सूचना है। संवेदनशील नदी तटों और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी गई है।
अल्मोड़ा और रानीखेत बेल्ट में खतरा
अल्मोड़ा जिले में बारिश का दौर जारी है। चौखुटिया, भिकियासैंण, रानीखेत, भनोली, द्वाराहाट और कटारमल सहित कई क्षेत्रों में भारी से बहुत भारी बारिश की चेतावनी है।
पहाड़ी इलाकों से लगातार मलबा आने के कारण अल्मोड़ा जिले की 15 सड़कें बंद हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों का संपर्क प्रभावित हुआ है। अल्मोड़ा शहर और आसपास कोसी नदी का जलस्तर भी बढ़ रहा है। प्रशासन ने स्थानीय लोगों और पर्यटकों से नदी-नालों तथा संवेदनशील पहाड़ी मार्गों से दूरी बनाए रखने की अपील की है।
नैनीताल-हल्द्वानी में भारी बारिश, गौला बैराज से छोड़ा गया पानी
नैनीताल जिले में पिछले 24 घंटों में औसतन 89 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि नैनीताल शहर में बारिश का आंकड़ा 200 मिलीमीटर से अधिक बताया गया है। कैंची धाम और मुक्तेश्वर में भी 100 मिलीमीटर से अधिक बारिश दर्ज हुई।
गौला बैराज से नदी में करीब 27 हजार क्यूसेक पानी छोड़े जाने के बाद निचले क्षेत्रों में चिंता बढ़ गई। हल्द्वानी, रामनगर, भीमताल, भवाली और कोटाबाग के नदी-नाले तेज बहाव में हैं।
गौला नदी के तेज बहाव से बिंदुखत्ता, लालकुआं और शांतिपुरी क्षेत्र में कृषि भूमि के कटान की स्थिति बनी हुई है। किसानों को खेतों और फसलों के नुकसान की चिंता सताने लगी है।
ऊधम सिंह नगर में नदी किनारे बस्तियों पर नजर
कुमाऊं की पहाड़ियों में हो रही भारी बारिश का असर मैदानी क्षेत्रों में भी दिखाई दे रहा है। ऊधम सिंह नगर में गौला, कोसी, दाबका, नंधौर और कैलाश नदियों के जलस्तर पर प्रशासन लगातार निगरानी रख रहा है।
लालकुआं और शांतिपुरी के तराई क्षेत्रों में खेतों में पानी पहुंचने से फसलों को नुकसान हुआ है। नदी किनारे बसे लोगों को जलस्तर बढ़ने की स्थिति में तत्काल सुरक्षित और ऊंचे स्थानों पर जाने की सलाह दी जा रही है। राहत एवं बचाव दल भी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।
कुमाऊं में 95 सड़कें बंद, बॉर्डर रोड भी प्रभावित
बारिश और भूस्खलन का सबसे बड़ा असर पर्वतीय यातायात व्यवस्था पर पड़ा है। कुमाऊं मंडल में कुल 95 सड़कें बंद बताई गई हैं।
नैनीताल: 47 सड़कें
पिथौरागढ़: 21 सड़कें
अल्मोड़ा: 15 सड़कें
बागेश्वर: 11 सड़कें
चम्पावत: 1 सड़क
रणनीतिक महत्व रखने वाली धारचूला-तवाघाट और तवाघाट-गूंजी बॉर्डर रोड भी प्रभावित हुई हैं।
नैनीताल जिले में खनस्यू-पतलोट, गर्जिया-बेतालघाट-खैरना और काठगोदाम-सिमलियाबैड स्टेट हाईवे पर मलबा आने से यातायात प्रभावित है। राहत की बात यह है कि प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों पर यातायात जारी रखने के लिए मशीनरी लगातार काम कर रही है। हल्द्वानी-अल्मोड़ा, हल्द्वानी-नैनीताल और टनकपुर-चम्पावत-पिथौरागढ़ राष्ट्रीय राजमार्गों पर मलबा हटाने का काम किया जा रहा है।
देहरादून-विकासनगर में अतिवृष्टि के जख्म बरकरार
देहरादून और विकासनगर क्षेत्र में हाल की अतिवृष्टि से हुए नुकसान के बीच फिर भारी बारिश की चेतावनी ने चिंता बढ़ा दी है। कंडोली, बिधोली, प्रेमनगर, शुद्धोवाला, हरबर्टपुर और नवाबगढ़ समेत कई क्षेत्रों में जलभराव और मकानों को नुकसान पहुंचने की घटनाएं सामने आई हैं।
कई रिहायशी क्षेत्रों में पानी भरने से लोगों की गृहस्थी प्रभावित हुई। जिला प्रशासन और नगर निगम जलभराव वाले क्षेत्रों में पंपिंग सेट के माध्यम से पानी निकालने और प्रभावित लोगों तक राहत पहुंचाने में जुटे हैं।
8 सितंबर तक सक्रिय रह सकता है मानसून
मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार प्रदेश में 8 सितंबर तक मानसून सक्रिय रहने की संभावना है। 4 सितंबर को नैनीताल, चम्पावत, देहरादून, हरिद्वार, रुद्रप्रयाग और बागेश्वर में भारी वर्षा की संभावना है। 5 और 6 सितंबर को देहरादून, हरिद्वार, पौड़ी, बागेश्वर और चमोली में तीव्र बौछारें पड़ने का अनुमान है।
चमोली में भी रुक-रुककर बारिश जारी है। बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर संवेदनशील स्थानों पर बोल्डर गिरने का खतरा बना हुआ है।
दारमा घाटी में भूस्खलन का बड़ा खतरा, 58% आबादी हाई रिस्क जोन में
मौसम की मौजूदा चुनौती के बीच पिथौरागढ़ की दारमा घाटी को लेकर सामने आई वैज्ञानिक रिपोर्ट पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ते भूस्खलन खतरे की गंभीर तस्वीर पेश करती है।
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने दारमा घाटी में भूस्खलन के खतरे, संवेदनशीलता और जोखिम का अध्ययन किया है। वैज्ञानिकों ने वर्ष 2001 से 2023 तक सामने आए 295 भूस्खलन क्षेत्रों की हाई रिजॉल्यूशन मैपिंग की।
रिपोर्ट में दारमा घाटी के करीब 9 प्रतिशत क्षेत्र को बहुत ज्यादा संवेदनशील, 22 प्रतिशत को मध्यम जोखिम, 26 प्रतिशत को कम जोखिम और 43 प्रतिशत क्षेत्र को बहुत कम जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है।
उत्तराखंड का 22 प्रतिशत हिस्सा हाई रिस्क जोन में
रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड का करीब 22 प्रतिशत क्षेत्र भूस्खलन के हाई रिस्क जोन में आता है। प्रदेश के सभी नौ पर्वतीय जिले भूस्खलन के खतरे से प्रभावित हैं।
दारमा घाटी में प्रतिवर्ष औसतन 2,000 से 2,500 मिलीमीटर बारिश होती है। भारत-नेपाल सीमा से जुड़ा यह क्षेत्र कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।
अध्ययन में पाया गया कि बारिश से भूस्खलन का खतरा करीब 13 प्रतिशत और भूकंप से करीब 9 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। बारिश और भूकंप जैसी परिस्थितियां एक साथ उत्पन्न होने पर जोखिम 32 प्रतिशत तक बढ़ने का आकलन किया गया है।
58 प्रतिशत आबादी हाई या वेरी हाई रिस्क क्षेत्र में
रिपोर्ट की सबसे गंभीर बात यह है कि दारमा घाटी की करीब 58 प्रतिशत आबादी हाई या वेरी हाई रिस्क वाले क्षेत्रों में रह रही है।
धार गांव को वेरी हाई रिस्क जोन में रखा गया है। जम्कू, खेत, नगलिंग, सोबला, बालिंग और तवाघाट समेत कई गांव हाई रिस्क क्षेत्र में बताए गए हैं।
दारमा घाटी करीब 1,364 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली है और दारमा नदी के साथ इसकी लंबाई लगभग 91 किलोमीटर है। यहां तवाघाट, जम्कू, खेत, सोबला, दार, बालिंग, चांलकाम, उर्थिंग, मंडप, नागलिंग, फिलम, दुग्तू, बौन, गो, मार्चा, तिदांग और सिपु सहित कई गांव बसे हैं।
कमजोर होती चट्टानें और बढ़ता निर्माण
वैज्ञानिक अध्ययन में यह भी सामने आया कि भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में दक्षिण दिशा की चट्टानें अधिक कमजोर हुई हैं। सूर्य की गर्मी और बार-बार बर्फ पिघलने की प्रक्रिया से चट्टानों की कमजोरी बढ़ रही है। ढलानों की भौगोलिक स्थिति भी भूस्खलन का एक महत्वपूर्ण कारण है।
इसके साथ सड़क और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण भी जोखिम बढ़ाने वाले कारकों में शामिल है। अध्ययन के अनुसार सड़कों के 300 मीटर के दायरे में 36.48 प्रतिशत और नदियों अथवा जलधाराओं के 300 मीटर दायरे में 53.84 प्रतिशत भूस्खलन क्षेत्र पाए गए।
वैज्ञानिक निर्माण और आपात विस्थापन की जरूरत
वैज्ञानिकों ने हाई रिस्क वाले गांवों में रिटेनिंग वॉल, ड्रेनेज चैनल और आपातकालीन विस्थापन की योजनाएं तैयार करने की जरूरत बताई है। सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण में भी वैज्ञानिक भूगर्भीय अध्ययन को प्राथमिकता देने की आवश्यकता बताई गई है।
उत्तराखंड में मौजूदा भारी बारिश और दारमा घाटी की वैज्ञानिक रिपोर्ट एक साथ पर्वतीय क्षेत्रों की चुनौती को सामने रखती हैं। एक ओर मौसम विभाग लगातार भारी बारिश की चेतावनी जारी कर रहा है, दूसरी ओर संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाली बड़ी आबादी भूस्खलन के जोखिम से घिरी हुई है। ऐसे में मौसम चेतावनी, सड़क बंद होने की सूचना, नदी जलस्तर की निगरानी और संवेदनशील गांवों में समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की व्यवस्था जनसुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।


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