उत्तराखंड। उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था में धामी सरकार की एक और ‘उपलब्धि’ सामने आई है। जिन अतिथि शिक्षकों ने 12 से 15 वर्षों तक दुर्गम और अति दुर्गम क्षेत्रों के राजकीय विद्यालयों में विद्यार्थियों को पढ़ाया, उन्हें अब स्थायी शिक्षकों के तबादलों के बाद विद्यालयों से बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
शिक्षा मंत्री के आश्वासन के बावजूद स्थायी प्रवक्ता और एलटी शिक्षकों के अनुरोध आधार पर तबादलों के बाद सैकड़ों अतिथि शिक्षकों की सेवाएं समाप्त हो गई हैं। बताया जा रहा है कि 100 से अधिक प्रवक्ताओं और 200 से अधिक एलटी शिक्षकों के स्थानांतरण के बाद बड़ी संख्या में अतिथि शिक्षक प्रभावित हुए हैं।
विडंबना यह है कि वर्षों तक सरकार की शिक्षा व्यवस्था का बोझ अपने कंधों पर उठाने वाले इन शिक्षकों का कोई स्पष्ट आधिकारिक रिकॉर्ड तक उपलब्ध नहीं है। सेवा समाप्त होने के बाद उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति की जिम्मेदारी किसकी होगी, इसका जवाब भी व्यवस्था के पास दिखाई नहीं देता।
वर्ष 2024 में अतिथि शिक्षकों ने पद सृजन और सेवा सुरक्षा की मांग को लेकर शिक्षा निदेशालय, ननूरखेड़ा में 40 दिन से अधिक समय तक क्रमिक धरना दिया था। उस समय शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने आश्वासन दिया था कि रिक्त पदों वाले विद्यालयों में अतिथि शिक्षकों को प्राथमिकता दी जाएगी और किसी की सेवा समाप्त नहीं होगी।
अब सवाल यह है कि आश्वासन के बाद भी यदि वर्षों से पढ़ा रहे शिक्षक बेरोजगार हो रहे हैं, तो इसे धामी सरकार की कौन-सी उपलब्धि माना जाए?
दुर्गम पहाड़ों में बच्चों को शिक्षा देने वाले शिक्षक यदि व्यवस्था बदलते ही ‘अतिथि’ से बेरोजगार बन जाएं, तो यह शिक्षा व्यवस्था की मजबूती का प्रमाण है या वर्षों की सेवाओं के बाद शिक्षकों के साथ हुआ अन्याय?
सरकार के लिए सवाल सीधा है—12-15 साल सेवा लेने के बाद अतिथि शिक्षकों को आखिर कब तक मजदूरों की तरह जरूरत के हिसाब से बुलाया और हटाया जाता रहेगा?
