पार्ट 3 आध्यात्मिक इतिहास : नंदा राजजात के लोकविश्वास और परंपराओं में छिपे संकेतआध्यात्मिक इतिहास : नंदा राजजात के लोकविश्वास और परंपराओं में छिपे संकेत

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चमोली। उत्तराखंड की नंदा देवी राजजात केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि हिमालयी लोकजीवन, रिश्तों, रीति-रिवाजों और आध्यात्मिक आस्था का ऐसा संगम है, जिसमें सदियों पुरानी लोक स्मृतियां आज भी जीवित दिखाई देती हैं। गढ़वाली लोकभाषा की पहेलियों और लोककथात्मक रचनाओं में राजजात के पड़ावों, देव परंपराओं और नंदा को बेटी के रूप में विदा करने की भावनाएं विशेष रूप से सामने आती हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


जगमोहन सिंह रावत ‘जगमोरा’ की पजल-श्रृंखला में कांसुवा, नौटी, कुरुड़, भगौती, ईड़ा-बधाणी, भेंटी, लुणतरा और विनायक जैसे स्थानों को नंदा राजजात की आध्यात्मिक यात्रा से जोड़कर देखा गया है। इन रचनाओं में नंदा केवल देवी नहीं, बल्कि मायके से कैलास जाने वाली धियाणी यानी बेटी के रूप में दिखाई देती हैं।
लोकमान्यता में नौटी और कुरुड़ नंदा परंपरा के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। राजजात से जुड़े गीतों में मायके की ओर से बेटी को भेंट देने, विदाई करने और उसके सुखी ससुराल की कामना करने की परंपरा बार-बार उभरती है। ‘भिंटोळी’ इसी भावनात्मक लोकपरंपरा का प्रतीक है, जिसमें बेटी को मायके की ओर से स्नेह और सौगात दी जाती है।
राजजात की आध्यात्मिक यात्रा में चौसिंगा खाडू का विशेष महत्व बताया जाता है। लोकविश्वास में यह नंदा की कैलास यात्रा का अग्रदूत और धार्मिक यात्रा का प्रमुख प्रतीक माना जाता है। इसके साथ देवछतरी यानी छंतोळी, डोली और विभिन्न देवताओं की पूजा यात्रा को सामूहिक धार्मिक अनुष्ठान का स्वरूप देती है।
पजल-श्रृंखला में ईड़ा-बधाणी की सेवाधर्मिता, कांसुवा के राजकुंवरों की मनौती तथा विभिन्न पड़ावों पर होने वाली मिलनी और भेंट को भी प्रमुखता दी गई है। इससे स्पष्ट होता है कि नंदा राजजात केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने वाली यात्रा नहीं, बल्कि अनेक गांवों और समुदायों को जोड़ने वाली सांस्कृतिक परंपरा है।
इसी परंपरा में लाटू देवता का भी महत्वपूर्ण स्थान है। नंदा की यात्रा में विभिन्न पड़ावों पर स्थानीय देवताओं की पूजा, जागर, झोड़ा-चांचरी और सामूहिक भेंट लोकआस्था को जीवंत बनाते हैं। इन परंपराओं में देवता और समाज के बीच संबंध केवल पूजा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरा गांव यात्रा का सहभागी बन जाता है।
पजल-1297 में लुणतरा और उसके आसपास के पड़ावों के माध्यम से नंदा यात्रा के सामाजिक स्वरूप का चित्रण मिलता है। वहीं पजल-1298 में कुरुड़ से दशोली और बधाण क्षेत्र की ओर जाने वाली यात्राओं तथा अलग-अलग पड़ावों की चर्चा है। विनायक को रिद्धि-सिद्धि से जोड़ते हुए इसे यात्रा के शुभ पड़ाव के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
इन लोक रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें नंदा को देवी के साथ-साथ बेटी माना गया है। मायका, ससुराल, भेंट, विदाई, मिलन और विरह—ये सभी मानवीय रिश्तों के प्रतीक राजजात की आध्यात्मिक अनुभूति को और गहरा करते हैं। यही कारण है कि नंदा की कैलास यात्रा में आस्था के साथ बेटी की विदाई का भाव भी जुड़ जाता है।
आध्यात्मिक इतिहास के नजरिये से नंदा राजजात उत्तराखंड की उस जीवंत परंपरा का उदाहरण है, जिसमें प्रकृति, देवी-आस्था, लोकभाषा, कृषि संस्कृति, पारिवारिक रिश्ते और सामुदायिक सहभागिता एक ही यात्रा में समाहित हो जाते हैं। यही लोकविश्वास इस यात्रा को हिमालय की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान प्रदान करता है।
स्रोत-आधार: प्रस्तुत लोक पजल एवं उनके साथ दिए गए शब्दार्थ/भावार्थ; स्थानों और परंपराओं के संबंध में स्थानीय लोकमान्यताओं को उसी रूप में प्रस्तुत किया गया है।


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