महिला सशक्तिकरण आज राजनीति का सबसे लोकप्रिय नारा बन चुका है। सरकारें महिलाओं के आर्थिक उत्थान से लेकर शिक्षा, रोजगार, आरक्षण और आत्मनिर्भरता तक की योजनाएं गिनाती हैं। मंचों से महिलाओं को सम्मान देने की बातें होती हैं। लखपति दीदी का सपना दिखाया जाता है। महिलाओं को आगे बढ़ाने की घोषणाएं होती हैं। मगर जब उसी समाज में सार्वजनिक स्थान पर एक महिला के साथ खाकी वर्दी पहने पुलिसकर्मी द्वारा कथित तौर पर लात मारने का दृश्य सामने आता है, तो तमाम नारों की असलियत पर सवाल खड़े हो जाते हैं।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
यह सिर्फ एक महिला के साथ कथित दुर्व्यवहार का मामला नहीं है। यह उस व्यवस्था की संवेदनशीलता की परीक्षा है, जिस पर नागरिकों की सुरक्षा और सम्मान की जिम्मेदारी है।
सोशल मीडिया के दौर में कैमरा हर जगह मौजूद है। पहले किसी घटना के बारे में केवल प्रत्यक्षदर्शी बताते थे, आज मोबाइल कैमरा पूरी घटना को समाज के सामने रख देता है। यही वजह है कि सार्वजनिक स्थान पर महिला के साथ कथित रूप से हुआ यह व्यवहार लोगों को झकझोर रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर खाकी वर्दी वाला ही सार्वजनिक स्थान पर एक महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाएगा, तो महिला सुरक्षा और महिला सम्मान का भरोसा किस आधार पर कायम रहेगा?
पुलिस की वर्दी कानून की ताकत का प्रतीक है। इस वर्दी से समाज सुरक्षा की उम्मीद करता है। कोई महिला पुलिस के सामने खुद को सुरक्षित महसूस करे, यही लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी अपेक्षा है। मगर जब किसी वायरल वीडियो में एक पुलिसकर्मी महिला के साथ कथित रूप से शारीरिक बल प्रयोग करता दिखाई देता है, तो मामला सिर्फ एक वीडियो तक सीमित नहीं रहता। वह पुलिस प्रशिक्षण, अनुशासन, जवाबदेही और संवेदनशीलता पर बड़ा प्रश्न बन जाता है।
सरकार महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की बात करती है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से आर्थिक मजबूती की बात होती है। लखपति दीदी जैसे अभियानों के जरिए महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का लक्ष्य रखा जाता है। राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए आरक्षण की चर्चा होती है। सरकारी योजनाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के प्रयास किए जाते हैं।
इन सबका उद्देश्य एक ऐसी महिला तैयार करना है जो आत्मविश्वास के साथ समाज में आगे बढ़ सके।
लेकिन सवाल यह है कि आर्थिक रूप से मजबूत महिला को सामाजिक सम्मान और सुरक्षा कौन देगा?
अगर किसी महिला को सार्वजनिक स्थान पर अपमान का सामना करना पड़े, अगर उसके साथ वर्दी की ताकत का कथित दुरुपयोग हो, तो करोड़ों रुपये की योजनाएं भी उस महिला के आत्मसम्मान की भरपाई नहीं कर सकतीं।
महिला सशक्तिकरण की शुरुआत किसी सरकारी योजना से पहले घर और समाज के व्यवहार से होती है। महिला को सम्मान देना, उसकी बात सुनना, उसके अधिकारों की रक्षा करना और उसके साथ कानूनसम्मत व्यवहार करना ही वास्तविक सशक्तिकरण की नींव है।
इस घटना में एक और गंभीर सवाल सामने आता है—क्या वर्दी पहन लेने के बाद किसी नागरिक के साथ व्यवहार करने का तरीका बदल जाता है?
कानून व्यवस्था संभालने वाले जवानों को तनावपूर्ण परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। भीड़ नियंत्रण से लेकर विवादों तक पुलिस की भूमिका कठिन होती है। मगर कठिन परिस्थिति भी कानून और मर्यादा की सीमा को समाप्त नहीं करती। पुलिस के पास कार्रवाई के लिए कानूनी अधिकार हैं। इसी कारण उससे संयम और अनुशासन की अपेक्षा भी अधिक होती है।
यदि वायरल वीडियो में दिख रहा घटनाक्रम वास्तविक है, तो इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। पूरे घटनाक्रम का संदर्भ सामने आना चाहिए। वीडियो के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय संबंधित अधिकारियों को तथ्यों की जांच करनी चाहिए। यदि पुलिसकर्मी दोषी पाया जाता है तो विभागीय और कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
क्योंकि वर्दी सम्मान मांगती है, मगर वर्दी को भी कानून और मर्यादा का सम्मान करना पड़ता है।
यहां सरकार से भी सवाल पूछा जाना चाहिए। महिला सशक्तिकरण के नाम पर विज्ञापन और भाषणों से आगे बढ़कर सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि सरकारी तंत्र के हर स्तर पर महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता दिखाई दे।
महिला को 30 प्रतिशत आरक्षण मिले या उससे अधिक प्रतिनिधित्व, महिला आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बने या सरकारी योजना की लाभार्थी बने—इन उपलब्धियों का वास्तविक मूल्य तभी है जब वह सड़क पर भी सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे।
महिला सशक्तिकरण का सबसे बड़ा प्रमाण सरकारी मंच पर खड़े होकर दिया गया भाषण नहीं, सड़क पर महिला के सम्मान की रक्षा है।
आज सोशल मीडिया जनता की आंख बन चुका है। कैमरे ने जो दृश्य कैद किया, उसने एक ऐसी बहस शुरू कर दी है जिसे केवल बयान जारी करके समाप्त नहीं किया जा सकता। जनता जानना चाहती है कि घटना की वास्तविकता क्या है, महिला के साथ ऐसा व्यवहार किन परिस्थितियों में हुआ और जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई।
सरकार को भी इस सवाल का जवाब देना होगा कि महिला सम्मान केवल चुनावी भाषणों और सरकारी योजनाओं का विषय है या सरकारी तंत्र के व्यवहार में भी उसकी झलक दिखाई देगी?
क्योंकि एक तरफ सरकार कहती है—बेटी आगे बढ़ेगी।
दूसरी तरफ अगर वही बेटी, बहन या मां सार्वजनिक स्थान पर अपमानित होती दिखाई दे, तो समाज के मन में स्वाभाविक सवाल उठता है—
आखिर यह कैसी महिला सशक्तिकरण की तस्वीर है?
जिस महिला को सरकार आत्मनिर्भर बनाने का सपना दिखा रही है, उसके सम्मान की रक्षा करना उसी सरकार और उसके तंत्र की पहली जिम्मेदारी है।
महिला के हाथ में आर्थिक स्वतंत्रता देना जरूरी है। उसे शिक्षा देना जरूरी है। उसे रोजगार देना जरूरी है। उसे राजनीतिक अधिकार और प्रतिनिधित्व देना जरूरी है।
मगर इन सबसे पहले उसे सम्मान देना जरूरी है।
क्योंकि जिस दिन किसी महिला के सम्मान पर सार्वजनिक रूप से खाकी की लात पड़ती दिखाई देती है, उस दिन सवाल सिर्फ पुलिसकर्मी से नहीं पूछा जाता।
सवाल पूरी व्यवस्था से पूछा जाता है।
और यही सवाल आज समाज के सामने खड़ा है—
“महिला को आगे बढ़ाने की बात करने वाली सरकार, क्या महिला के सम्मान की रक्षा भी उतनी ही मजबूती से करेगी?”
संभावित मुख्य शीर्षक:
महिला के सम्मान पर खाकी की लात! फिर किस मुंह से सशक्तिकरण के नारे?
लखपति दीदी के नारों के बीच महिला के सम्मान की यह कैसी तस्वीर?
एक तरफ महिला सशक्तिकरण, दूसरी तरफ खाकी की कथित बदसलूकी!
आरक्षण और योजनाओं से आगे बढ़कर महिला के सम्मान की गारंटी कब?
महिला को आगे बढ़ाने का दावा, सड़क पर सम्मान की परीक्षा में व्यवस्था क्यों फेल?
