संपादकीय | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
उत्तराखंड क्रांति दल एक बार फिर अपने ही अंतर्विरोधों के घेरे में खड़ा दिखाई दे रहा है। विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के बीच पार्टी के भीतर नेताओं की बयानबाजी, अनुशासनात्मक कार्रवाई और एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर जिस दल ने उत्तराखंड राज्य आंदोलन में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, वह राज्य बनने के 26 साल बाद भी सत्ता के केंद्र से दूर क्यों है?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
उक्रांद के केंद्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती ने पार्टी के बयानवीरों और बड़बोले नेताओं पर सवाल उठाते हुए कहा है कि उन्हें पता ही क्या है कि उत्तराखंड राज्य के लिए लड़ाई कैसे लड़ी गई। उनका निशाना पूर्व केंद्रीय उपाध्यक्ष आशुतोष नेगी पर भी रहा। पार्टी ने अनुशासनहीनता और पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाने जैसे आरोपों के आधार पर नेगी को छह वर्ष के लिए निष्कासित किया है।
यहां से कहानी सिर्फ एक नेता के निष्कासन की नहीं रह जाती। असली सवाल पार्टी की राजनीतिक कार्यशैली का है।
आशुतोष नेगी के बयान और उनकी राजनीतिक शैली पर सवाल उठ सकते हैं। किसी भी संगठन में अनुशासन आवश्यक है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा अथवा सार्वजनिक मंचों पर लगातार विवाद खड़ा करना संगठन के लिए चुनौती बन सकता है। यदि अनुशासन समिति ने पूरी प्रक्रिया के बाद कार्रवाई की है तो उसका सम्मान होना चाहिए।
लेकिन दूसरा सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है—किसी नेता को तैयार किए बिना, उसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि और संगठनात्मक क्षमता को परखे बिना, अचानक महत्वपूर्ण पद और चुनावी टिकट देने की जिम्मेदारी किसकी थी?
नेगी 2024 में उक्रांद से जुड़े और कुछ ही समय बाद उन्हें लोकसभा चुनाव का टिकट मिल गया। यदि उस समय पार्टी नेतृत्व को उनमें राजनीतिक संभावना दिखाई दे रही थी, तो आज वही व्यक्ति संगठन के लिए इतना बड़ा संकट कैसे बन गया? क्या नेतृत्व ने उस समय पर्याप्त राजनीतिक मूल्यांकन किया था?
यही प्रश्न उक्रांद के सामने बार-बार खड़ा होता है।
राज्य आंदोलन की विरासत निश्चित रूप से उक्रांद की सबसे बड़ी पूंजी है। मगर राजनीति केवल इतिहास के सहारे आगे नहीं बढ़ती। जनता आंदोलनकारी इतिहास का सम्मान करती है, साथ ही वह शासन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पलायन और भ्रष्टाचार जैसे सवालों पर भविष्य का नेतृत्व भी तलाशती है।
राज्य बनने के बाद जनता ने उक्रांद को अवसर दिया। विधानसभा में उसे प्रतिनिधित्व मिला। यह वह समय था जब दल अपने आंदोलनकारी चरित्र को सुशासन की राजनीतिक क्षमता में बदल सकता था। मगर संगठन जनता के बीच वह भरोसा कायम नहीं कर सका जिसकी उसे उम्मीद थी।
आज स्थिति यह है कि पार्टी के भीतर नई पीढ़ी और पुराने नेतृत्व के बीच वैचारिक तथा राजनीतिक दूरी दिखाई दे रही है। युवा चेहरे आक्रामक तरीके से पहाड़, पहाड़ी अस्मिता और उत्तराखंडियत के मुद्दे उठा रहे हैं। उनकी भाषा और शैली पर सवाल हो सकते हैं, मगर यह भी देखना होगा कि युवाओं को अवसर देने के बाद उन्हें नेतृत्व की मुख्यधारा में टिकाए रखने की जिम्मेदारी किसकी है।
किसी युवा नेता की गलती केवल उसकी गलती नहीं होती; उसे तैयार करने वाले संगठन की भी जिम्मेदारी होती है।
मोहित डिमरी जैसे युवा चेहरे के पार्टी से अलग होने और अब आशुतोष नेगी के निष्कासन ने उक्रांद के सामने गंभीर राजनीतिक चुनौती खड़ी की है। सवाल यह है कि क्या पार्टी हर मुखर युवा चेहरे को अनुशासन के नाम पर बाहर करती जाएगी या उनके भीतर मौजूद ऊर्जा को संगठन की ताकत में बदलेगी?
उक्रांद को यह समझना होगा कि चुनाव अब सिर्फ आंदोलन की स्मृतियों से नहीं जीते जाते। सोशल मीडिया, युवाओं की नई राजनीतिक भाषा, स्थानीय मुद्दे, संगठन की बूथ स्तर तक मौजूदगी और स्पष्ट नेतृत्व—ये सभी चुनावी राजनीति के अनिवार्य हिस्से हैं।
वरिष्ठ नेताओं का अनुभव पार्टी की ताकत है, मगर युवा ऊर्जा उसकी अगली सांस हो सकती है। दोनों के बीच टकराव के स्थान पर संवाद स्थापित करना होगा।
आशुतोष नेगी सही हैं या गलत, इसका अंतिम निर्णय जनता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया करेगी। पार्टी का अनुशासन अपना स्थान रखता है और व्यक्ति की अभिव्यक्ति की राजनीतिक जिम्मेदारी भी।
मगर उक्रांद के लिए सबसे बड़ा सवाल आशुतोष नेगी का निष्कासन नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि उत्तराखंड बनाने के आंदोलन का नेतृत्व करने वाला दल उत्तराखंड की सत्ता चलाने का भरोसा जनता में कब पैदा करेगा?
यदि इसका जवाब पार्टी के पास है तो 2027 उसके लिए अवसर हो सकता है। यदि जवाब फिर पुराने विवादों, आपसी आरोपों और कुर्सी की राजनीति में खो गया, तो इतिहास का गौरव भविष्य की सत्ता की गारंटी नहीं बन पाएगा।
अंकिता भंडारी हत्याकांड में आशुतोष नेगी की भूमिका,अंकिता भंडारी हत्याकांड ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया था। इस मामले में पत्रकार आशुतोष नेगी की भूमिका एक सक्रिय पत्रकार और मामले को लगातार उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सामने आई। उन्होंने अंकिता को न्याय दिलाने की मांग को प्रमुखता से उठाया और जांच की निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े किए।
नेगी ने उत्तराखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर कर मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की थी। याचिका में उन्होंने जांच की प्रक्रिया, महत्वपूर्ण साक्ष्यों और जांच की दिशा को लेकर सवाल उठाए थे।
अंकिता प्रकरण को लगातार उठाने के कारण नेगी की पहचान इस आंदोलन से जुड़ी। मार्च 2024 में पुलिस ने उन्हें एक अलग शिकायत के आधार पर एससी/एसटी अधिनियम से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया था। उनकी गिरफ्तारी को लेकर भी राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस हुई।
उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) की केंद्रीय अनुशासन समिति ने पार्टी नेता आशुतोष नेगी के खिलाफ बड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की है। समिति के अध्यक्ष राकेश सेमवाल की ओर से 27 अगस्त 2026 को जारी आदेश में नेगी की प्राथमिक सदस्यता तत्काल प्रभाव से निलंबित करते हुए उन्हें छह वर्ष के लिए दल से निष्कासित किया गया है।
आदेश में आरोप लगाया गया है कि नेगी सोशल मीडिया और अन्य सार्वजनिक माध्यमों से लगातार दल के वरिष्ठ नेताओं और शीर्ष नेतृत्व के संबंध में कथित तौर पर अनर्गल, भ्रामक एवं तथ्यहीन बयान देते रहे, जिससे पार्टी की छवि और संगठनात्मक गरिमा को नुकसान पहुंचा। समिति के अनुसार, उन्हें इससे पहले भी 9 जुलाई को नोटिस दिया गया था, जिसके जवाब में उन्होंने 17 जुलाई को खेद व्यक्त किया था।
पार्टी ने बताया कि 22 अगस्त को भी आरोपों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करने और स्पष्टीकरण देने का अवसर दिया गया, लेकिन समिति को उनका जवाब संतोषजनक नहीं लगा। आदेश में उनके पूर्व आचरण और कथित दल-विरोधी गतिविधियों का भी उल्लेख किया गया है।
निष्कासन अवधि में नेगी को यूकेडी के नाम, झंडे, चुनाव चिन्ह अथवा अधिकृत प्रतीकों का उपयोग करने और स्वयं को पार्टी का पदाधिकारी या प्रतिनिधि बताने से प्रतिबंधित किया गया है।
राज्य आंदोलन की विरासत को सलाम चाहिए, मगर उत्तराखंड को अब विरासत के साथ परिणाम देने वाला नेतृत्व भी चाहिए।
