आओ गणपति मेरे धाममूलाधार से आज्ञाचक्र तक चेतना-जागरण और आत्मज्ञान की काव्यात्मक साधनानरेंद्र रावत ‘नरेन

Spread the love


संस्थापक एवं मार्गदर्शक, साहित्यिक सचेतना एवं स्वास्तिक पत्रिका
गणपति केवल विघ्नहर्ता ही नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में ज्ञान, विवेक, एकाग्रता, करुणा और आत्मचेतना के प्रतीक भी माने जाते हैं। इन्हीं आध्यात्मिक भावों को केंद्र में रखकर रचित नरेंद्र रावत ‘नरेन’ की यह काव्य-रचना साधना और आत्मबोध की सुंदर यात्रा प्रस्तुत करती है।
️ आओ गणपति मेरे धाम
मूलाधार को अब जगाऊँ,
दीर्घ सूँड-सी श्वास बनाऊँ।
सुषुम्ना का करूँ श्रीगणेश,
आज्ञाचक्र में ऊर्जा हो प्रवेश।
प्राणवायु से दीर्घायु प्राण,
आओ गणपति मेरे धाम।
वृहद उदर सब बात पचाए,
उदार हृदय सबको अपनाए।
छोटी आँखें सूक्ष्म दिखाएँ,
आत्मरूप सबमें इक पाएँ।
प्रारंभ कर दो रुके काम,
आओ गणपति मेरे धाम।
मन-मूषक चंचल फिरता,
चेतना से दो एकाग्रता।
एकदंत जग का दिखता टूटा,
सर्व पूर्ण है, कुछ भी नहीं छूटा।
सबको सद्गति दो भगवान,
आओ गणपति मेरे धाम।
सत्-श्रवण से बरसे ज्ञान,
मुझको भी दो सूफ-से कान।
हाथी-सा मदमस्त बन जाऊँ,
सुख, अभय, मुक्ति को पाऊँ।
रिद्धि-सिद्धि के स्वामी महान,
आओ गणपति मेरे धाम।
अंकुश से मन को राह दिखाएँ,
पाश से मोह-बंधन कटवाएँ।
मोदक ज्ञान-सुधा का धाम,
करुणा बरसे आठों आयाम।
हे विघ्नहर्ता! तुम्हें प्रणाम,
आओ गणपति मेरे धाम।
 भावार्थ
इस रचना में गणपति के विभिन्न स्वरूपों और प्रतीकों को योग, ध्यान, आत्मचेतना और जीवन-दर्शन से जोड़ा गया है। मूलाधार से आज्ञाचक्र तक ऊर्जा की यात्रा, चंचल मन को मूषक के प्रतीक के माध्यम से समझना, एकदंत में अपूर्णता के भीतर पूर्णता का दर्शन और अंकुश-पाश के माध्यम से मन तथा मोह पर नियंत्रण—कविता को आध्यात्मिक गहराई प्रदान करते हैं।
रचना का मूल संदेश है कि बाहरी विघ्नों को दूर करने के साथ-साथ मन के भीतर मौजूद अवरोधों पर विजय प्राप्त करना ही वास्तविक गणपति-साधना है।
— नरेंद्र रावत ‘नरेन’
संस्थापक एवं मार्गदर्शक
साहित्यिक सचेतना एवं स्वास्तिक पत्रिका

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


Spread the love