विकास के नाम पर विनाश: उत्तराखंड में कब थमेगा मौत का सिलसिला?

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विकास की अंधी दौड़ में उत्तराखंड: सुरंग, सड़क, जंगल और आपदाओं के बीच दम तोड़ती जिंदगियां
पहाड़ खोदकर किसका विकास? उत्तराखंड में बढ़ती परियोजनाएं और बढ़ता मौत का आंकड़ा
केदारनाथ से पीपलकोटी तक: उत्तराखंड की त्रासदियों ने विकास मॉडल पर खड़े किए बड़े सवाल

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

उत्तराखंड के चमोली जिले के पीपलकोटी में निर्माणाधीन सुरंग में हुआ दर्दनाक हादसा पूरे राज्य के लिए एक चेतावनी है। विष्णुगाड़-पीपलकोटी जल विद्युत परियोजना की टनल में अचानक पानी और मलबा घुसने से कई मजदूर उसमें फंस गए। राहत और बचाव कार्य लगातार जारी है। आठ श्रमिकों की मौत हो चुकी है, जबकि दो मजदूरों की तलाश जारी है।
यह हादसा केवल एक दुर्घटना भर नहीं है। यह उस विकास मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े करता है, जिसके तहत पहाड़ों को काटकर सुरंगें बनाई जा रही हैं, नदियों पर बांध तैयार किए जा रहे हैं और प्राकृतिक संसाधनों का लगातार दोहन हो रहा है।
जिस टनल में हादसा हुआ, वह टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (टीएचडीसी) की विष्णुगाड़-पीपलकोटी जल विद्युत परियोजना का हिस्सा है। यह टेल रेस टनल है, जिसका उपयोग बिजली उत्पादन के बाद पानी को वापस नदी में पहुंचाने के लिए किया जाता है। लगभग तीन किलोमीटर लंबी यह सुरंग अलकनंदा नदी के किनारे बनाई जा रही है।
हिमालय विश्व की सबसे युवा पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल है। यहां की भौगोलिक संरचना अत्यंत संवेदनशील मानी जाती है। भू-वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि बड़े पैमाने पर होने वाले निर्माण कार्यों से पहाड़ों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। इसके बावजूद सुरंगों, जल विद्युत परियोजनाओं और चौड़ी सड़कों का विस्तार लगातार जारी है।
यदि उत्तराखंड के पिछले 25 वर्षों का रिकॉर्ड देखा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि राज्य ने विकास की भारी कीमत चुकाई है।
वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा उत्तराखंड के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में गिनी जाती है। 16 और 17 जून 2013 को आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन में 5,700 से अधिक लोगों की मौत हुई या वे स्थायी रूप से लापता हो गए। हजारों परिवारों की दुनिया उजड़ गई और पूरा राज्य लंबे समय तक उस त्रासदी के घावों से जूझता रहा।
फरवरी 2021 में चमोली जिले की ऋषिगंगा आपदा ने फिर पूरे देश को झकझोर दिया। ग्लेशियर टूटने से आई बाढ़ ने जल विद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया। सुरंगों में काम कर रहे श्रमिकों को बाहर निकलने का अवसर तक नहीं मिला और 206 लोगों की जान चली गई।
आज पीपलकोटी का हादसा उसी दर्दनाक अध्याय की याद ताजा कर रहा है।
प्राकृतिक आपदाओं के आंकड़े भी बेहद चिंताजनक हैं। राज्य गठन के बाद से अब तक बाढ़, बादल फटना, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं में 10,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है या उन्हें लापता घोषित किया जा चुका है। पिछले एक दशक में 27,000 से अधिक आपदाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें 3,839 से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई है।
उत्तराखंड में सड़क हादसों की स्थिति भी भयावह है। वर्ष 2000 से अब तक लगभग 20,000 से अधिक लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हो चुकी है, जबकि 32,000 से अधिक लोग घायल हुए हैं।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 में 820 लोगों की मृत्यु हुई। वर्ष 2022 में 1,042 लोगों ने अपनी जान गंवाई। वर्ष 2023 में मृतकों की संख्या 1,054 रही। वर्ष 2024 में 1,090 लोगों की मौत दर्ज की गई, जबकि वर्ष 2025 में यह आंकड़ा 1,242 तक पहुंच गया।
पहाड़ों में तेजी से हो रहे सड़क निर्माण को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। क्या बिना व्यापक भू-वैज्ञानिक अध्ययन के पहाड़ों की कटाई भविष्य में और बड़े संकट को जन्म दे रही है? क्या निर्माण परियोजनाओं के दौरान सुरक्षा मानकों का पूरी तरह पालन किया जा रहा है?
मानव-वन्यजीव संघर्ष भी उत्तराखंड के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। राज्य गठन के बाद से अब तक लगभग 1,300 लोगों की मौत जंगली जानवरों के हमलों में हो चुकी है। गुलदार, बाघ, हाथी और भालू लगातार मानव बस्तियों की ओर बढ़ रहे हैं।
जंगलों के सिकुड़ते दायरे और प्राकृतिक आवासों में बढ़ते हस्तक्षेप को इसकी प्रमुख वजह माना जाता है। जब जंगलों के बीच सड़कें तैयार होंगी, जब पहाड़ों के भीतर सुरंगों का जाल बिछेगा और जब प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा, तब वन्यजीवों और इंसानों के बीच टकराव भी बढ़ेगा।
उत्तराखंड को बेहतर सड़कों, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और रोजगार की आवश्यकता है। विकास समय की मांग है, मगर विकास का अर्थ केवल बांध, सुरंग और चौड़ी सड़कें नहीं हो सकता।
आज आवश्यकता ऐसे विकास मॉडल की है, जो पर्यावरण, स्थानीय समुदाय और प्राकृतिक संसाधनों के बीच संतुलन स्थापित कर सके। हर बड़ी परियोजना का नियमित तकनीकी परीक्षण होना चाहिए। भू-वैज्ञानिक रिपोर्ट को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। निर्माण स्थलों पर सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन होना चाहिए।
पीपलकोटी की सुरंग में जान गंवाने वाले श्रमिक किसी सरकारी आंकड़े का हिस्सा भर नहीं हैं। उनके साथ कई परिवारों की उम्मीदें भी जुड़ी थीं। किसी बच्चे ने अपना पिता खोया है, किसी माता-पिता ने अपना बेटा खोया है और किसी परिवार का सहारा हमेशा के लिए छिन गया है।
केदारनाथ से लेकर ऋषिगंगा और अब पीपलकोटी तक घटनाओं की यह लंबी श्रृंखला एक स्पष्ट संदेश दे रही है कि उत्तराखंड को विकास की दिशा पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है।
आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकेगा या फिर आने वाले वर्षों में ऐसी घटनाएं और अधिक भयावह रूप धारण करेंगी?
उत्तराखंड की पहचान उसकी नदियों, जंगलों, पहाड़ों और प्राकृतिक विरासत से है। यदि इन्हीं संसाधनों पर सबसे अधिक दबाव पड़ेगा, तो उसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों को भी भुगतना पड़ेगा।
विकास तभी सार्थक माना जाएगा, जब वह प्रकृति और मानव जीवन दोनों की रक्षा कर सके। अन्यथा इतिहास इसी तरह दर्दनाक घटनाओं के नए अध्याय लिखता रहेगा।


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