रुद्रपुर टैक्सी चालकों का आक्रोश और अवैध वसूली का सवाल?रुद्रपुर में टैक्सी चालकों से अवैध वसूली – क्या गुंडागर्दी को मिलेगी छूट?

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रुद्रपुर शहर के नैनीताल रोड पर रविवार को टैक्सी चालकों ने एक गंभीर मुद्दा उठाते हुए प्रदर्शन किया। उनका आरोप है कि कुछ बाहरी तत्वों ने फर्जी कमेटी और टैक्सी वैलफेयर एसोसिएशन के नाम पर जबरन उगाही शुरू कर दी है। चालकों का कहना है कि उनसे ₹1100 की पर्ची जबरन काटी जा रही है और विरोध करने पर गाली-गलौज व धमकी दी जाती है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर (उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी)


इस मामले में टैक्सी चालकों ने बाजार चौक पुलिस को तहरीर सौंपी है और विजय कोली, आशु शर्मा, धर्मेंद्र, संजू वाबा, लवीश, रजत मिस्त्री, राकेश दिवाकर समेत कई लोगों के खिलाफ नामजद शिकायत दर्ज की है। चालकों का आरोप है कि इनमें से अधिकांश आरोपी उत्तर प्रदेश के हैं और उनका आपराधिक इतिहास भी रहा है।

दरअसल, टैक्सी चालक बीते वर्षों से ईमानदारी से गाड़ी चलाकर अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। लेकिन अचानक ऐसे तथाकथित “नेताओं” द्वारा जबरन वसूली और धमकियों ने उनकी रोजी-रोटी पर संकट खड़ा कर दिया है। यह न केवल परिवहन व्यवसाय के साथ खिलवाड़ है बल्कि शहर की कानून-व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।

पुलिस को इस मामले में तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। यदि वास्तव में कोई “टैक्सी यूनियन” या “वेलफेयर एसोसिएशन” पंजीकृत है तो उसकी वैधता और पारदर्शिता की जांच होनी चाहिए। वहीं, यदि यह केवल गुंडागर्दी के बल पर अवैध उगाही का तरीका है, तो ऐसे तत्वों को कानून के दायरे में लाना अनिवार्य है।

निष्पक्ष दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस प्रकरण में दो पहलू हैं—

  1. टैक्सी चालकों का अधिकार है कि वे बिना किसी जबरन शुल्क या दबाव के अपना कार्य करें।
  2. किसी भी संगठन या यूनियन को यदि मान्यता मिली है तो उसकी पारदर्शी और लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली होनी चाहिए।

अतः, प्रशासन को चाहिए कि वह निष्पक्ष जांच कर टैक्सी चालकों के हितों की रक्षा करे और अवैध वसूली करने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाए। आखिरकार, शहर की साख और आम जनता की सुविधा इन्हीं चालकों की ईमानदार सेवाओं पर निर्भर करती है।



रुद्रपुर में टैक्सी चालकों से अवैध वसूली – क्या गुंडागर्दी को मिलेगी छूट?रुद्रपुर में टैक्सी चालकों के साथ हो रही जबरन वसूली ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या उत्तराखंड में बाहरी आपराधिक तत्वों को गुंडागर्दी की खुली छूट दी जा रही है?

टैक्सी चालकों का आरोप है कि कुछ लोगों ने फर्जी कमेटी बनाकर उनसे ₹1100 की जबरन पर्ची काटनी शुरू कर दी है। विरोध करने वालों को गाली-गलौज और धमकी दी गई। यह केवल अवैध वसूली नहीं बल्कि संगठित अपराध का रूप है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर कौन-सा कानून किसी को केवल ₹5000 में रजिस्ट्रेशन करा कर “यूनियन” या “कमेटी” के नाम पर लूट का अधिकार दे देता है? क्या इस तरह की रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया मात्र “मधुबनी” (फर्जीवाड़ा) बनकर रह गई है?

आवश्यक कदम –

  1. ऐसे तत्वों की संपत्ति की जांच होनी चाहिए।
  2. उनका आपराधिक रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
  3. वे कब से और किस आधार पर उत्तराखंड में रह रहे हैं, इसकी पड़ताल जरूरी है।
  4. यदि दोषी पाए जाएं, तो इन्हें गुंडा अधिनियम (Goonda Act) के तहत तुरंत घोषित कर कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए।

सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि यदि ऐसे तत्वों पर समय रहते सख़्त कार्रवाई नहीं हुई तो यह प्रवृत्ति आने वाले दिनों में पूरे परिवहन क्षेत्र और आम जनता के लिए खतरा बन सकती है।

उत्तराखंड को गुंडागर्दी की परमिशन नहीं दी जा सकती।


रुद्रपुर की घटना पर जिला प्रशासन और पुलिस पर सवाल

रुद्रपुर में टैक्सी चालकों से जबरन वसूली और गुंडागर्दी का मामला सामने आया है। आरोप है कि कुछ बाहरी लोगों ने फर्जी कमेटी बनाकर ₹1100 की पर्ची काटनी शुरू कर दी और विरोध करने वाले चालकों को गालियां व धमकी दी।

क्या उत्तराखंड में कोई भी ₹5000 देकर संगठन का पंजीकरण करा सकता है और फिर उसके नाम पर खुलेआम लूट-खसोट शुरू कर सकता है? यदि यह सच है, तो यह न केवल कानून की विफलता है बल्कि राज्य की मूल अवधारणा के खिलाफ भी है।


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