भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया पर सरकार के प्रतिबंध के खिलाफ जनरेशन Z (Gen Z) के युवाओं द्वारा शुरू किया गया आंदोलन तेजी से तख्तापलट की शक्ल ले चुका है। प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली के इस्तीफे के बाद देश की सत्ता की दौड़ में एक नाम जोर-शोर से गूंज रहा है।

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संकट की घड़ी में भारत विरोधी मेयर बालेन शाह पर सवाल

नेपाल इस समय गहरे राजनीतिक संकट और उथल-पुथल से गुजर रहा है। युवा सड़कों पर हैं, सरकार गिरी हुई है, सेना मोर्चा संभाले हुए है—लेकिन ऐसे नाज़ुक दौर में भी काठमांडू महानगर के मेयर बालेन शाह अपने पुराने सुर में भारत विरोध की राजनीति चमकाने से बाज़ नहीं आ रहे।

बालेन शाह लंबे समय से भारत विरोधी बयानों और कदमों के लिए सुर्खियों में रहे हैं। कभी नेपाल–भारत सीमा विवाद पर भड़काऊ टिप्पणी करना, कभी सांस्कृतिक प्रतीकों को लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा करना, तो कभी दिल्ली और लखनऊ तक भारत के खिलाफ तीखी बयानबाज़ी करना—उनकी छवि एक जिम्मेदार शहरी प्रशासक की बजाय कट्टर राष्ट्रवादी नेता जैसी बन चुकी है। विडंबना यह है कि काठमांडू जैसे शहर की वास्तविक समस्याएँ—यातायात, कचरा प्रबंधन, जल संकट—उनके कार्यकाल में जस की तस हैं।

आज जब नेपाल जल रहा है, लोग बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं, तब बालेन शाह जैसे नेता भारत विरोधी कार्ड खेलकर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने में लगे हैं। इससे साफ झलकता है कि उनके लिए जनता की पीड़ा से ज़्यादा महत्व सत्ता और लोकप्रियता की राजनीति का है। संकट की घड़ी में देश को स्थिरता और समाधान की ज़रूरत है, लेकिन मेयर साहब ऐसे मुद्दे हवा में उछाल रहे हैं जो न केवल नेपाल को भीतर से कमजोर करते हैं बल्कि पड़ोसी भारत से रिश्तों में भी अनावश्यक तनाव पैदा करते हैं।

जनता का सवाल बिल्कुल वाजिब है—क्या काठमांडू के मेयर की प्राथमिकता शहर की सफाई, रोजगार और सुशासन होनी चाहिए या भारत विरोधी नारेबाज़ी? जब तक स्थानीय नेता भी इस दोहरी भूमिका से बाहर नहीं निकलेंगे, नेपाल का लोकतंत्र और सामाजिक ताना-बाना लगातार संकट में रहेगा।

यह नाम है काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह का जिन्हें प्यार से ‘बालेन’ कहा जाता है। 35 वर्षीय यह युवा नेता कभी रैपर था लेकिन अब नेपाली युवाओं का चहेता बन चुका है। हालांकि उनकी लोकप्रियता के पीछे एक विवादास्पद इतिहास भी छिपा है जिसमें उनकी भारत विरोधी हरकतें भी शामिल हैं।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

कौन हैं बालेंद्र शाह?

1990 में काठमांडू में जन्मे बालेन पेशे से इंजीनियर हैं। उन्होंने नेपाल में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और फिर भारत के कर्नाटक स्थित विश्वेश्वरैया टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री हासिल की। राजनीति में आने से पहले वे नेपाल के अंडरग्राउंड हिप-हॉप सीन का हिस्सा थे और अपने रैप गीतों के जरिए भ्रष्टाचार और सामाजिक असमानता पर चोट करते रहे। उनके गाने, जैसे ‘फाइट द पावर’ और ‘नेपाल्स हार्ड लाइफ’ पर आधारित ट्रैक्स, युवाओं की समस्याओं – बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और सामाजिक असमानता को उजागर करते थे। सोशल मीडिया पर ‘बालेन इफेक्ट’ नाम से वायरल हुए वीडियो ने उन्हें 2022 के स्थानीय चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में काठमांडू का मेयर बनाया।

2022 के चुनाव में उन्होंने पारंपरिक दलों को करारी शिकस्त दी और भ्रष्टाचार विरोधी एजेंडे पर फोकस किया। 2022 में वे बतौर निर्दलीय उम्मीदवार काठमांडू के 15वें मेयर चुने गए। उन्होंने 61 हजार से अधिक वोट पाकर बड़े-बड़े दलों के प्रत्याशियों को हराया और बिना पार्टी समर्थन के मेयर बनने वाले पहले शख्स बने। उनकी पत्नी का नाम सबीना काफ्ले है। इतना ही नहीं, टाइम मैगजीन ने उन्हें 2023 में दुनिया के 100 प्रभावशाली लोगों में शामिल किया। फरवरी 2024 में उन्होंने अमेरिकी राजदूत से मुलाकात की, जिसे कुछ लोग विदेशी हस्तक्षेप से जोड़ते हैं।

भारत के खिलाफ उगल चुके हैं जहर: ग्रेटर नेपाल का सपना

बालेंद्र शाह की लोकप्रियता भारत के लिए चिंता का विषय हो सकती है, क्योंकि वे ‘ग्रेटर नेपाल’ के समर्थक माने जाते हैं। यह एक विवादास्पद विचारधारा है, जो 1816 के सुगौली संधि से पहले गोरखा साम्राज्य के विस्तार पर आधारित है। उनके अनुसार, नेपाल का मूल क्षेत्र आज के भारत के उत्तराखंड (कुमाऊं-गढ़वाल), हिमाचल प्रदेश (शिमला डिवीजन, बिलासपुर सहित दक्षिणी हिस्से) और सिक्किम तक फैला था। जून 2023 में, जब भारतीय संसद में ‘अखंड भारत’ का नक्शा दिखाया गया, तो शाह ने अपने मेयर कार्यालय में ‘ग्रेटर नेपाल’ का नक्शा लगाया। इसमें भारत के इन क्षेत्रों को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा। शाह ने कई मौकों पर भारत को ‘हस्तक्षेपकारी’ बताया।

मां सीता को लेकर किया था विरोध

2023 में ही उन्होंने फिल्म ‘आदिपुरुष’ में एक डायलॉग को लेकर काठमांडू में भारतीय फिल्मों के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया। फिल्म में कहा गया था कि “सीता मां भारत की बेटी हैं,” जिसका उन्होंने कड़ा विरोध किया। जब नेपाल के सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने बैन हटाया, तो उन्होंने नेपाल सरकार और अदालत को ‘भारत के प्रभाव’ में होने का आरोप लगाया। उनके समर्थक इन्हें ‘राष्ट्रवादी’ कहते हैं, लेकिन भारत में इसे ‘क्षेत्रीय विस्तारवाद’ माना जाता है।

शाह का सबसे विवादास्पद विरोध ‘सीता मां’ से ही जुड़ा है। रामायण में जनकपुर (नेपाल) को सीता का जन्मस्थान माना जाता है, जो हिंदू संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र है। 2023 में, जब भारत में जनकपुर से जुड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए, तो शाह ने इसे ‘भारतीय सांस्कृतिक विस्तार’ बताते हुए विरोध किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि नेपाल की धरोहर को भारत ‘अपनाने’ की कोशिश कर रहा है। कुछ ने इसे ‘सीता मां’ की नेपाली पहचान को चुनौती देने वाला बताया। यह विरोध नेपाल के हिंदू-बहुल समाज में विवाद पैदा कर गया। पशुपतिनाथ मंदिर पर हालिया हमले के बाद, शाह की चुप्पी ने सवाल खड़े किए। क्या वे हिंदू राष्ट्रवाद के समर्थक हैं? कुछ रिपोर्ट्स कहती हैं कि शाह नेवारी बौद्ध परिवार से हैं, लेकिन मैथिल मूल के कारण वे हिंदू संस्कृति से जुड़े हैं। फिर भी, उनके बयान भारत-विरोधी लगते हैं।

ओली के आलोचक और स्वतंत्र छवि

बालेंद्र शाह लंबे समय से ओली के आलोचक रहे हैं। उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर ओली को “भ्रष्ट” तक कहा। हालांकि, मौजूदा GenZ आंदोलन के दौरान उन्होंने साफ कहा कि चूंकि उनकी उम्र 28 वर्ष से अधिक है, इसलिए वे इस आंदोलन का नेतृत्व नहीं करेंगे। शाह ने युवाओं से खुद आगे आने और आंदोलन को दिशा देने की अपील की। प्रधानमंत्री ओली के इस्तीफे के बाद शाह ने मंगलवार को फेसबुक पर एक संदेश जारी कर प्रदर्शनकारियों से संयम बरतने की अपील की। उन्होंने लिखा, “सरकार के इस्तीफे की मांग पूरी हो चुकी है। अब सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना बंद करना चाहिए। देश की संपत्ति का नुकसान दरअसल हमारी अपनी संपत्ति का नुकसान है। अब जरूरी है कि हम संयमित होकर आगे बढ़ें।”

नेपाल में Gen Z आंदोलन

नेपाल में यह आंदोलन 8 सितंबर से तेज हुआ, जब युवाओं ने भ्रष्टाचार, महंगाई और राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ काठमांडू की सड़कों पर उतर आए। Gen Z यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मे युवाओं ने सोशल मीडिया के जरिए संगठित होकर संसद भवन, राष्ट्रपति भवन (सितल निवास) और मीडिया हाउसों पर हमला किया। आगजनी, तोड़फोड़ और हिंसा में दर्जनों लोग घायल हुए। पशुपतिनाथ मंदिर के दरवाजे तोड़ने की कोशिश ने हिंदू आस्था को झकझोर दिया। प्रधानमंत्री ओली ने इस्तीफा दे दिया, और अब सत्ता की रेस में बालेंद्र शाह के अलावा रवि लामिछाने और सुशीला कार्की जैसे नाम हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे ‘नया नेपाल’ चाहते हैं – भ्रष्टाचार मुक्त और युवा-केंद्रित।

भारत के लिए खतरा या अवसर?

अगर बालेंद्र शाह नेपाल के अगले प्रधानमंत्री बने, तो भारत-नेपाल संबंधों पर असर पड़ेगा। ग्रेटर नेपाल का एजेंडा सीमा विवाद बढ़ा सकता है, खासकर उत्तराखंड के कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख दर्रे को लेकर। हालांकि कुछ विश्लेषक कहते हैं कि शाह की की बयानबाजी से इतर उनका मुख्य फोकस आंतरिक सुधार पर हो सकता है नाकि भारत के लड़ाई पर। नेपाल की सेना में भारतीय प्रशिक्षित गोरखा हैं और वे भारत के प्रति वफादार है।

यहाँ नेपाल में चल रहे हालिया घटनाक्र समाचार संपादकीय की एक व्यवस्थित और विश्लेषणात्मक रूपरेखा दी जा रही है:
नेपाल में Gen Z-संचालित विरोधों का भू-राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषण

  1. विरोधों का उत्प्रेरक: सोशल मीडिया प्रतिबंध
    4 सितंबर 2025 को नेपाल सरकार ने फेसबुक, X, YouTube और अन्य 26 लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को बंद कर दिया, क्योंकि इनकी सरकार के साथ पंजीकरण और अनुपालन नहीं हुई थी। यह कदम सरकार द्वारा सूचना और भाषण नियंत्रण की कोशिश के रूप में व्यापक बहस में आया।
    इस निर्णय ने जन खासकर युवा वर्ग में असंतोष को भड़काया — ना सिर्फ सेंसरशिप, बल्कि भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमी के खिलाफ नारा बन गया।
  2. Gen Z का जनक्रांति स्वरूप सीमा पार कर गया
    युवा, विशेषकर Gen Z, ने इस कदम को भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था का प्रतीक माना। जनता विशेषकर सोशल मीडिया पर राजनीतिक परिवारों की आर्थिक विलासिता (जिसे “Nepo Kid” ट्रेंड के माध्यम से उजागर किया गया) से नाराज थी।
    प्रदर्शनों में तेज़ी से हिंसा हुई, जिसमें सरकारी भवनों, संसद, कोर्ट, टेलीविजन संस्थानों जैसे मीडिया हाउस और पारितंत्र की नींव को चुनौती दी गई।
  3. हिंसा, गिरफ्तारी और सरकार की प्रतिक्रिया
    विरोधों की तीव्रता के दौरान कम से कम 19 प्रदर्शनकारियों की मृत्यु हुई, दर्ज संख्या और भी अधिक होने की आशंका है।
    आक्रमण में पुलिस और सैनिक महिलाओं ने जवाबी कार्रवाई की, जिससे स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई। सेना को सड़कों पर भेजा गया और राजधानी काठमांडू में कर्फ्यू लगाया गया।
    सरकार ने सोशल मीडिया प्रतिबंध वापस लिया, मृतकों के परिवारों के लिए मुआवजा और इलाज की घोषणा की।
  4. प्रधानमंत्री का इस्तीफ़ा और राजनीतिक अस्थिरता की धरोहर
    9 सितंबर 2025 को प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली ने इस्तीफ़ा दे दिया। उनका स्थान अस्थायी कार्यवाहक रूप में बन सकता है, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता की परंपरा जारी है — 2008 से सिर्फ़ एक भी सरकार पूर्ण 5-वर्ष का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई।
  5. श्रम, सीमा और भारत-नेपाल संबंधों पर प्रत्यक्ष प्रभाव
    राजनीतिक उथल-पुथल से नेपाल-भारत सीमा क्षेत्रों पर प्रभाव हुआ। सोनौली सीमा पर एक दूल्हे को पैदल अपनी बारात ले जाना पड़ा और पर्यटक फंस गए।
    त्रिभुवन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा बंद हुआ; कई उड़ानें रद्द या लखनऊ/दिल्ली में डायवर्ट की गईं।
    आंध्र प्रदेश सरकार ने भारत में फंसे नागरिकों के लिए दिल्ली-संबंधित आपातकालीन सहायता केंद्र स्थापित किया।
    भारत सरकार ने अपने नागरिकों से नेपाल यात्रा स्थगित करने का आग्रह किया।
    नेपाल में वर्तमान संकट जन भावनाओं और संरचनात्मक समस्याओं का परिणाम है—भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, अभिव्यक्ति की असुरक्षा, और लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक अस्थिरता।

Gen Z ने इस द्वंद्व को प्रज्वलित किया—सोशल मीडिया को अभिव्यक्ति का माध्यम, और युवा वर्ग की आवाज़ में परिणत किया।
यह केवल सरकारों के बदलाव की मांग नहीं रह गई; यह अभिव्यक्ति की आज़ादी, जवाबदेही और न्याय के लिए एक जनांदोलन बन गया।
अब देखने वाली बात है कि नई सरकार और समाज कैसे इस संघर्ष का सामना करते हुए, संरचनात्मक सुधारों की दिशा में कदम बढ़ाता है।


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