रुद्रपुर, 29 सितंबर 2026।उत्तराखंड अध्यापक पात्रता परीक्षा (UTET) को निष्पक्ष एवं शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए जिला प्रशासन ने परीक्षा केंद्रों के 200 मीटर दायरे में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा-163 के तहत निषेधाज्ञा लागू की है। रुद्रपुर में 29 सितंबर को दो पालियों में UTET प्रथम एवं द्वितीय की परीक्षा आयोजित की जा रही है। प्रशासन ने नकल, अनधिकृत प्रवेश, मोबाइल फोन, हथियार, भीड़, नारेबाजी तथा परीक्षा से जुड़ी अन्य गतिविधियों पर सख्ती के निर्देश दिए हैं।
परीक्षा की सुरक्षा को लेकर प्रशासन की यह सख्ती स्वाभाविक है। सवाल यह है कि परीक्षा समाप्त होने के बाद उन दस्तावेजों की जांच को लेकर क्या उतनी ही सख्ती दिखाई जाएगी, जिनके आधार पर अभ्यर्थियों को पात्रता, आरक्षण या अन्य सरकारी लाभ मिलते हैं?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
हाल के दिनों में उत्तराखंड में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र, स्थायी निवास तथा अन्य आरक्षित श्रेणी के प्रमाणपत्रों को लेकर गंभीर सवाल सामने आए हैं। देहरादून के मेडिकल प्रवेश प्रकरण में फर्जी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों की जांच के लिए एसआईटी गठित की गई है।
मामला यहीं तक सीमित नहीं रहा। रिपोर्टों के मुताबिक जांच का दायरा अन्य आरक्षित श्रेणियों के प्रमाणपत्रों तक बढ़ाया गया है। 28 सितंबर की रिपोर्ट में 12 और अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र जांच में फर्जी पाए जाने के बाद उनकी सीटें रद्द किए जाने की जानकारी सामने आई।
यहीं से उत्तराखंड सरकार के सामने कुछ सीधे सवाल खड़े होते हैं।
क्या केवल मेडिकल प्रवेश में जमा दस्तावेजों की जांच होगी या सरकारी नौकरियों, प्रतियोगी परीक्षाओं तथा अन्य सरकारी लाभों में लगाए गए प्रमाणपत्रों की भी व्यापक जांच होगी?
क्या उन स्थायी निवास प्रमाणपत्रों का भी सत्यापन होगा, जिन पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं?
क्या स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित या संग्राम सेनानी प्रमाणपत्रों की मूल सरकारी अभिलेखों से दोबारा जांच कराई जाएगी?
यदि किसी व्यक्ति का प्रमाणपत्र फर्जी पाया जाता है तो केवल लाभार्थी पर कार्रवाई होगी या प्रमाणपत्र तैयार करने, सत्यापित करने तथा स्वीकृत करने की पूरी प्रक्रिया की भी जिम्मेदारी तय होगी?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रमाणपत्र केवल कागज का टुकड़ा नहीं होता। उसके आधार पर किसी व्यक्ति को सरकारी सीट, आरक्षण, नौकरी, छात्रवृत्ति अथवा अन्य लाभ मिल सकता है। एक वास्तविक पात्र व्यक्ति का अधिकार यदि फर्जी दस्तावेज के कारण किसी दूसरे को मिल जाए तो इसका असर सीधे व्यवस्था की विश्वसनीयता पर पड़ता है।
उत्तराखंड में सामने आए मौजूदा प्रकरण में अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठे हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार जांच एजेंसियां दस्तावेजों के साथ प्रमाणपत्रों के सत्यापन और स्वीकृति की प्रक्रिया को भी देख रही हैं।
इसलिए सरकार से अपेक्षा है कि UTET जैसी परीक्षाओं में नकल रोकने के साथ-साथ दस्तावेजी पारदर्शिता पर भी समान कठोरता दिखाई जाए। परीक्षा केंद्र के बाहर 200 मीटर की सीमा में कौन प्रवेश करेगा, इसका हिसाब रखा जा सकता है तो सरकारी लाभ लेने वाले व्यक्ति के दस्तावेजों की सत्यता का हिसाब भी सार्वजनिक व्यवस्था के पास होना चाहिए।
सवाल सिर्फ यह नहीं कि परीक्षा कितनी सख्ती से हुई। असली सवाल यह है कि परीक्षा के बाद दस्तावेज कितनी सख्ती से जांचे जाएंगे?
उत्तराखंड सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि फर्जी स्थायी निवास, फर्जी संग्राम सेनानी/आश्रित प्रमाणपत्र अथवा अन्य कूटरचित दस्तावेजों के मामलों में कितने पुराने रिकॉर्ड की जांच होगी, जांच कौन करेगा, समयसीमा क्या होगी और दोषी पाए जाने पर क्या कार्रवाई होगी।
क्योंकि परीक्षा में नकल करने वाला एक अभ्यर्थी व्यवस्था को नुकसान पहुंचाता है, लेकिन फर्जी दस्तावेज के जरिए सरकारी अवसर हासिल करने वाला नेटवर्क व्यवस्था के भरोसे को चुनौती देता है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
