उत्तराखंड बसाने कीतो फिक्र करें क्यों फिर जमाने की
उत्तराखंड केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक संवेदनशील सभ्यता, संघर्षशील समाज और हिमालयी चेतना का जीवंत प्रतीक है। यह वह भूमि है, जहां पत्थरों ने आंदोलनों को जन्म दिया, माताओं ने अपने बेटों को राज्य के सपने के लिए बलिदान दिया और युवाओं ने बंदूक नहीं, संविधान के सहारे अपनी पहचान की लड़ाई लड़ी। वर्ष 2000 में जिस आशा, संघर्ष और संकल्प के साथ उत्तराखंड का निर्माण हुआ था, आज राज्य बनने के 25 वर्ष बाद भी वह सपना अधूरा दिखाई देता है।
आज भी यह प्रश्न उत्तराखंड की आत्मा को मथता है—
क्या उत्तराखंड वास्तव में उत्तराखंडियों का राज्य बन पाया है?
जब राज्य आंदोलन के मूल प्रश्न—मूल निवास, रोजगार, पलायन, राजधानी, संसाधनों पर अधिकार—हाशिये पर चले जाएं, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसे समय में हिमालय क्रांति पार्टी जैसे वैचारिक मंच का उभरना केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि राज्य आंदोलन की आत्मा की पुनर्व्याख्या है।
हिमालय से प्रेरणा, क्रांति से निर्माण
हिमालय क्रांति पार्टी का मूल विचार यही है—
हिमालय से प्रेरणा और क्रांति से निर्माण।
पार्टी के तृतीय स्थापना एवं संकल्प दिवस के अवसर पर केंद्रीय महासचिव लाल सिंह बिष्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा—
“उत्तराखंड की राजनीति को अब चेहरों और दलों से नहीं, बल्कि मुद्दों और नीतियों से पहचाना जाना चाहिए। हिमालय क्रांति पार्टी किसी सत्ता की भूखी नहीं, बल्कि अपने राज्य के भविष्य के लिए प्रतिबद्ध है। हमारा संघर्ष मूल निवासियों के संरक्षण, रोजगार, गैरसैंण राजधानी और भ्रष्टाचार मुक्त उत्तराखंड के लिए है।”
यह बयान केवल एक औपचारिक वक्तव्य नहीं, बल्कि उस पीड़ा की अभिव्यक्ति है, जिसे आज हर उत्तराखंडी महसूस कर रहा है।
1. मूल निवास का प्रश्न: पहचान बनाम विस्थापन
उत्तराखंड का सबसे बड़ा और सबसे उपेक्षित मुद्दा है—मूल निवास।
राज्य निर्माण के समय यह सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया था कि यह राज्य पर्वतीय समाज, संस्कृति, संसाधनों और स्थानीय नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनेगा। लेकिन आज स्थिति उलट है—
स्थानीय युवा नौकरियों से बाहर हैं
उपजाऊ और सामरिक भूमि बाहरी पूंजी के हाथों जा रही है
प्रशासनिक ढांचे में स्थानीय प्रतिनिधित्व लगातार घटा है
और मूल निवासी अपनी ही धरती पर पहचान के लिए संघर्षरत हैं
“मूल निवास – 1950” की मांग को बार-बार कट्टरता कहकर खारिज किया गया, जबकि यह मांग संवैधानिक, सामाजिक और ऐतिहासिक आधार रखती है। जब हिमाचल, राजस्थान, झारखंड और पूर्वोत्तर के राज्य अपने नागरिकों को कानूनी संरक्षण दे सकते हैं, तो उत्तराखंड क्यों नहीं?
आज सवाल यह नहीं कि कौन बाहर से आया, सवाल यह है कि—
क्या राज्य की नीतियां अपने बच्चों के लिए बनी हैं या उन्हें विस्थापित करने के लिए?
2. एक परिवार – एक रोजगार: पलायन का स्थायी समाधान
उत्तराखंड का सबसे दर्दनाक और मौन संकट है—पलायन।
गांव खाली हो रहे हैं, स्कूलों पर ताले लग रहे हैं, खेत बंजर हो रहे हैं और पहाड़ बुजुर्गों के भरोसे छूटता जा रहा है।
“एक परिवार – एक रोजगार”
यह कोई भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि नीति का आधार बन सकता है—
स्थानीय संसाधनों पर आधारित स्वरोजगार
पहाड़ी कृषि और बागवानी का पुनर्जीवन
होम-स्टे, हर्बल, पर्यटन, डेयरी और वन-आधारित उद्योग
ग्राम स्तर पर उद्यमिता और सहकारी मॉडल
आज उत्तराखंड को सरकारी नौकरियों की नहीं, बल्कि स्थायी आजीविका व्यवस्था की जरूरत है। जब तक युवा अपने गांव में सम्मान और सुरक्षा के साथ नहीं जी सकेगा, तब तक कोई भी विकास खोखला रहेगा।
3. राजधानी गैरसैंण: भावनात्मक नहीं, संवैधानिक मुद्दा
गैरसैंण केवल एक स्थान नहीं,
यह राज्य आंदोलन की धड़कन है।
देहरादून को स्थायी राजधानी बनाकर सरकारों ने जो संदेश दिया, वह स्पष्ट था—
शक्ति मैदानों में है, पहाड़ केवल संसाधन हैं।
गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाना—
पहाड़ के साथ न्याय
क्षेत्रीय असंतुलन का अंत
प्रशासनिक विकेंद्रीकरण
और राज्य आंदोलन के प्रति ईमानदारी
यह मुद्दा भावनात्मक नहीं, बल्कि संवैधानिक और नीतिगत प्रतिबद्धता का है, जिसे लगातार टालना राज्य आंदोलन के साथ विश्वासघात है।
4. भ्रष्टाचार मुक्त – सुविधा युक्त प्रदेश: विरोधाभास नहीं, आवश्यकता
उत्तराखंड आज दो समानांतर सच्चाइयों में जी रहा है—
योजनाओं की भरमार
और धरातल पर भ्रष्टाचार की भरमार
चाहे वह—
भर्ती घोटाले हों
भूमि और खनन घोटाले
आपदा राहत में लूट
या ठेकेदारी संस्कृति
हर क्षेत्र में जनता का विश्वास टूट चुका है।
भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश का अर्थ है—
पारदर्शी और स्थानीय भर्ती प्रणाली
जन-निगरानी तंत्र
राजनीतिक जवाबदेही
और अफसरशाही पर लोकतांत्रिक नियंत्रण
जब तक योजनाएं दलाल-मुक्त नहीं होंगी, तब तक सुविधा युक्त प्रदेश केवल पोस्टरों तक सीमित रहेगा।
5. शिक्षा और स्वास्थ्य: पहाड़ का सबसे बड़ा संकट
उत्तराखंड में—
सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति
पहाड़ों में डॉक्टरों की भारी कमी
रेफरल सिस्टम की मजबूरी
ये केवल प्रशासनिक विफलताएं नहीं, बल्कि राजनीतिक असंवेदनशीलता के प्रमाण हैं।
जब एक गर्भवती महिला को 100 किलोमीटर दूर अस्पताल भेजा जाता है,
जब छात्र पढ़ाई के लिए मैदान पलायन को मजबूर होता है—
तो यह केवल व्यवस्था की विफलता नहीं, राज्य की असफलता है।
6. राजनीति बनाम जनसंघर्ष
आज उत्तराखंड की राजनीति—
चुनावी वादों
जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों
तथा सत्ता-संरक्षण
तक सिमट कर रह गई है।
जनता पूछ रही है—
राज्य आंदोलन के मुद्दे कहां गए?
हिमालय क्रांति पार्टी जैसे वैचारिक प्रयास इस प्रश्न को पुनः जीवित करते हैं कि—
राजनीति सत्ता के लिए नहीं, समाधान के लिए होनी चाहिए।
विजन हमारा और साथ तुम्हारा
“विजन हमारा और साथ तुम्हारा”
यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि जन-राजनीति की पुनर्रचना का आह्वान है।
उत्तराखंड को चाहिए—
ईमानदार और कर्मठ नेतृत्व
स्थानीय सोच पर आधारित नीति
और दीर्घकालिक विकास दृष्टि
यह तभी संभव है जब जनता
चेहरों पर नहीं, मुद्दों पर वोट करे।
अध्यक्ष, हिमालय क्रांति पार्टी अजय बिष्ट, मुख्य अतिथि उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी संपादक हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह विष्ट, संचालन दिनेश बिष्ट, महासचिव, लाल सिंह बिष्ट, पौड़ी जिला उपाध्यक्ष रविन्द्र जुयाल, शंकर दत्त, अनिल जोशी, कन्हैया लाल डबरियल,शिवा नन्द नौटियाल सभा को संबोधित किया
सभा में पार्टी के उपस्थित सदस्य एवं पदाधिकारी कुलवंत सिंह नेगी
हंसा दत्तू बेलवाल
लक्ष्मण सिंह रावत
देवेन्द्र सिंह
विजेश चन्द्र बिष्ट
राम सिंह रावत
ए.एस. मेहरा
बिरेन्द्र सिंह बंगारी
महेश चन्द्र डौ
अजय बिष्ट
दिनेश सिंह रावत –
महेश आर्य
महेश उपाध्याय –आदि उपस्थित थे
अजय बिष्ट
अवतार सिंह विष्ट
दिनेश बिष्ट
लाल सिंह बिष्ट
रविन्द्र जुयाल
शंकर दत्त
अनिल जोशी
कन्हैया लाल डबरियल
शिवानंद नौटियाल
कुलवंत सिंह नेगी
हंसा दत्तू बेलवाल
लक्ष्मण सिंह रावत
देवेन्द्र सिंह
विजेश चन्द्र बिष्ट
राम सिंह रावत
ए. एस. मेहरा
बिरेन्द्र सिंह बंगारी
महेश चन्द्र डौ
दिनेश सिंह रावत
महेश आर्य
महेश उपाध्याय
मनोज जुयाल (फिल्म डायरेक्टर, उत्तराखंड)
विपिन कुकरेती
बृजेश शर्मा (दिल्ली)
संजय कुमार (दिल्ली)
गब्बर सिंह चौहान (पौड़ी)
पूजा चमोली
रेखा बालोनी
भारतीय बिष्ट
ग्रुप सिंह भंडारी
संजय सिंह
सत्येंद्र सिंह रावत
अरविंद सिंह रावत
सुरेश चमोली
देवेंद्र गोसाई
पपेंद्र सिंह रावत
मनमोहन
गौरव
रमेश सिंह बेलवाल की उपस्थिति में जालंत मुद्दों पर हुईचर्चा
