पौड़ी,यूसीसी और उत्तराखंड की अनदेखी पीड़ा।उत्तराखंड में यूनिफॉर्म सिविल कोड का पारित होना जितना बड़ा राजनीतिक फैसला बताया जा रहा है, उतना ही बड़ा भ्रम आम जनता के मन में पैदा कर गया है। सुदूर गांवों, कस्बों और तहसीलों में लोग आज भी नहीं समझ पा रहे कि इस कानून से उनकी रोज़मर्रा की जिंदगी में क्या बदलेगा। बेरोज़गारी, पलायन, शिक्षा-स्वास्थ्य की बदहाली, आपदाएं, भू-कानून और संसाधनों पर माफिया कब्जे जैसे ज्वलंत मुद्दों से जूझ रहे राज्य में यूसीसी को जिस जल्दबाज़ी में पारित किया गया, उसने सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
बिना व्यापक जनसंवाद, सिविल सोसाइटी और कानूनविदों से चर्चा के ऐसा संवेदनशील कानून लाना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विपरीत प्रतीत होता है। यही कारण है कि आम धारणा बन रही है कि यूसीसी का इस्तेमाल वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाने और राजनीतिक ध्रुवीकरण के औज़ार के रूप में किया गया। उत्तराखंड को प्रतीकों से नहीं, बल्कि ज़मीनी मुद्दों पर ईमानदार राजनीति की ज़रूरत है।
पौड़ी,उत्तराखंड जैसे छोटे, संवेदनशील और संसाधन-सीमित हिमालयी राज्य में जब कोई बड़ा कानून अचानक, बिना व्यापक संवाद और सामाजिक विमर्श के पारित किया जाता है, तो स्वाभाविक है कि जनता के मन में संदेह और असमंजस पैदा हो। सुदूर गांवों, तहसीलों और कस्बों में आज यही दुविधा साफ दिखाई देती है। आम आदमी से लेकर पढ़े-लिखे वर्ग तक यह समझ नहीं पा रहा कि विवादास्पद यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) कानून उनकी रोज़मर्रा की जिंदगी को कैसे और किस दिशा में बदलेगा। सवाल यह भी है कि जिन मूल समस्याओं से उत्तराखंड वर्षों से जूझ रहा है, क्या उनसे ध्यान हटाने के लिए इस कानून को प्राथमिकता दी गई?
उत्तराखंड का सामाजिक ताना-बाना विविधता से भरा है। यहां पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों की समस्याएं अलग-अलग हैं, लेकिन पीड़ा एक-सी है—बेरोज़गारी, पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली, आपदाओं का बढ़ता कहर, और संसाधनों पर माफिया-राजनीति का कब्जा। इन सबके बीच अचानक यूसीसी को जिस अफरातफरी में विधानसभा से पारित कराया गया, उसने भरोसे को कमजोर किया है। लोकतंत्र में कानून केवल संख्या बल से नहीं, बल्कि सामाजिक सहमति और संवैधानिक संतुलन से मजबूत होते हैं। यहां वही संतुलन सवालों के घेरे में है।
सबसे बड़ा भ्रम यह है कि यूसीसी से आम नागरिक को क्या मिलेगा। क्या इससे पहाड़ के गांवों में स्कूल खुलेंगे? क्या अस्पतालों में डॉक्टर मिलेंगे? क्या युवाओं को सम्मानजनक रोजगार मिलेगा? क्या खाली होते गांवों में फिर से रौनक लौटेगी? इन सवालों का जवाब सरकार की ओर से स्पष्ट रूप से नहीं दिया गया। न तो व्यापक जनसंवाद हुआ, न ही विधेयक के प्रावधानों पर खुली बहस। सिविल सोसाइटी, महिला संगठनों, युवा प्रतिनिधियों और कानूनविदों को भरोसे में लेने की कोशिश तक नहीं दिखी। परिणामस्वरूप, कानून के बजाय सरकार की मंशा पर बहस तेज हो गई।
यूसीसी जैसे गंभीर विषय का संबंध नागरिकों के व्यक्तिगत कानूनों, निजता, पारिवारिक अधिकारों और धार्मिक विविधता से है। ऐसे में हल्के-फुल्के अंदाज़, व्यंग्य या त्वरित बहुमत के सहारे इसे पारित करना लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर प्रश्नचिह्न लगाता है। संविधान भारत को एक विविध, धर्मनिरपेक्ष और संघीय ढांचे के रूप में परिभाषित करता है। व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव करते समय इस ढांचे की संवेदनशीलता और न्यायपालिका की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यदि किसी राज्य का कानून संविधान की मूल भावना से टकराता है, तो वह लंबे समय तक टिक पाएगा—यह प्रश्न भी जनता पूछ रही है।
इसी पृष्ठभूमि में यह आशंका बलवती होती है कि कहीं यूसीसी को राजनीतिक ध्रुवीकरण के औज़ार के रूप में तो नहीं इस्तेमाल किया गया। चुनावी मौसम में ऐसे मुद्दे अक्सर भावनात्मक बहस को हवा देते हैं और बुनियादी सवाल पीछे छूट जाते हैं। उत्तराखंड में यह और भी चिंताजनक है, क्योंकि राज्य पहले ही असंतुलित विकास, पर्यावरणीय संकट और सामाजिक तनाव से गुजर रहा है। पहाड़ और तराई के बीच संसाधनों के बंटवारे को लेकर असंतोष बढ़ रहा है। यदि समय रहते संतुलित नीति नहीं बनी, तो सामाजिक संघर्ष की जमीन तैयार हो सकती है।
राज्य गठन का मूल उद्देश्य स्पष्ट था—पर्वतीय क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी और रोजगार सुनिश्चित करना, ताकि लोगों को पलायन न करना पड़े। लेकिन ढाई दशक बाद हकीकत यह है कि पलायन तेज़ हुआ है। गांव खाली हो रहे हैं, स्कूलों में बच्चे नहीं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, और युवाओं के हाथ में डिग्रियां तो हैं, पर नौकरी नहीं। विवादास्पद भर्ती व्यवस्थाओं ने पारंपरिक आजीविका के रास्ते भी संकरे कर दिए हैं। ऐसे में युवाओं की शादी की उम्र निकलती जा रही है, परिवार असुरक्षा में जी रहा है, और सामाजिक ताना-बाना कमजोर पड़ रहा है।
आपदाओं का दंश भी कम नहीं। भूस्खलन, बाढ़, भू-धंसाव और अनियोजित निर्माण ने हिमालय को अस्थिर कर दिया है। विकास के नाम पर बनी परियोजनाओं ने पर्यावरणीय संतुलन को तोड़ा है, जबकि जवाबदेही तय करने की इच्छाशक्ति कमजोर दिखती है। जंगली जानवरों के हमले सुदूर गांवों में रोज़मर्रा की त्रासदी बन चुके हैं। महिलाएं और बच्चे असुरक्षित हैं, लेकिन प्रशासन की संवेदनशीलता सवालों के घेरे में है। इन सबके बीच अगर सरकार की प्राथमिकता यूसीसी जैसे विवादास्पद कानून पर केंद्रित दिखती है, तो जनता का भरोसा डगमगाना स्वाभाविक है।
भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोप भी उत्तराखंड की राजनीति का स्थायी सच बन गए हैं। सरकारी नौकरियों से लेकर संसाधनों के दोहन तक, माफिया-राजनीति-नौकरशाही का गठजोड़ बार-बार सामने आया है। चुनावी भाषणों में इन मुद्दों पर शोर मचता है, लेकिन सत्ता में आते ही चुप्पी छा जाती है। नतीजा यह कि असंतोष की चिंगारी भीतर-ही-भीतर सुलगती रहती है। जब ऐसे माहौल में यूसीसी जैसा कानून लाया जाता है, तो लोग इसे समस्याओं से ध्यान हटाने की रणनीति के रूप में देखने लगते हैं।
यह भी विचारणीय है कि क्या एक राज्य में पारित ऐसा कानून पूरे देश के संवैधानिक ढांचे के साथ सामंजस्य बिठा पाएगा। यदि अलग-अलग राज्यों में समान विषयों पर अलग-अलग नियम बनने लगें, तो न्यायिक व्यवस्था में टकराव बढ़ेगा। अंततः इसका खामियाजा आम नागरिक को ही भुगतना पड़ेगा—लंबे मुकदमे, कानूनी अनिश्चितता और सामाजिक तनाव के रूप में।
आज ज़रूरत इस बात की है कि उत्तराखंड में प्राथमिकताओं का पुनर्निर्धारण हो। भू-कानून, जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा, रोजगार सृजन, शिक्षा-स्वास्थ्य का सुदृढ़ीकरण, और आपदा-प्रबंधन—ये वे मुद्दे हैं जिन पर ठोस नीति और ईमानदार अमल चाहिए। कानून तभी सार्थक होते हैं जब वे जनता की वास्तविक समस्याओं का समाधान करें, न कि उन्हें और उलझाएं।
लोकतंत्र में सरकार का दायित्व केवल कानून बनाना नहीं, बल्कि जनता को विश्वास में लेना भी है। व्यापक संवाद, पारदर्शिता और संवैधानिक मर्यादाओं का पालन ही स्थायी समाधान की राह दिखा सकता है। यदि यूसीसी वास्तव में समाज के हित में है, तो उसे खुली बहस, विशेषज्ञों की राय और जनता की सहभागिता के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए था। जल्दबाज़ी और अफरातफरी ने इसके उद्देश्य पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।
हिमालयी राज्य की असली पहचान उसकी प्रकृति, संस्कृति और संघर्षशील जनता है। यहां की पीड़ा को समझे बिना, दूर बैठे नीति-निर्माण से समाधान नहीं निकलेगा। उत्तराखंड को प्रतीकों और ध्रुवीकरण से नहीं, बल्कि संवेदनशील, समावेशी और ज़मीनी राजनीति से दिशा मिलेगी। आज का सवाल यही है—क्या सरकार इस सच्चाई को स्वीकार कर ज्वलंत मुद्दों पर लौटेगी, या फिर विवादों की आड़ में असली समस्याएं यूं ही दबती रहेंगी?
अध्यक्ष, हिमालय क्रांति पार्टी अजय बिष्ट, मुख्य अतिथि उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी संपादक अवतार सिंह विष्ट, संचालन दिनेश बिष्ट,महासचिव, लाल सिंह बिष्ट, पौड़ी जिला उपाध्यक्ष रविन्द्र जुयाल, शंकर दत्त, अनिल जोशी, कन्हैया लाल डबरियल,शिवा नन्द नौटियाल सभा को संबोधित किया।
सभा में पार्टी के उपस्थित सदस्य एवं पदाधिकारी कुलवंत सिंह नेगी
हंसा दत्तू बेलवाल
लक्ष्मण सिंह रावत
देवेन्द्र सिंह
विजेश चन्द्र बिष्ट
राम सिंह रावत
ए.एस. मेहरा
बिरेन्द्र सिंह बंगारी
महेश चन्द्र डौ
अजय बिष्ट
दिनेश सिंह रावत –
महेश आर्य
महेश उपाध्याय –आदि उपस्थित थे
अजय बिष्ट
अवतार सिंह विष्ट
दिनेश बिष्ट
लाल सिंह बिष्ट
रविन्द्र जुयाल
शंकर दत्त
अनिल जोशी
कन्हैया लाल डबरियल
शिवानंद नौटियाल
कुलवंत सिंह नेगी
हंसा दत्तू बेलवाल
लक्ष्मण सिंह रावत
देवेन्द्र सिंह
विजेश चन्द्र बिष्ट
राम सिंह रावत
ए. एस. मेहरा
बिरेन्द्र सिंह बंगारी
महेश चन्द्र डौ
दिनेश सिंह रावत
महेश आर्य
महेश उपाध्याय
मनोज जुयाल (फिल्म डायरेक्टर, उत्तराखंड)
विपिन कुकरेती
बृजेश शर्मा (दिल्ली)
संजय कुमार (दिल्ली)
गब्बर सिंह चौहान (पौड़ी)
पूजा चमोली
रेखा बालोनी
भारतीय बिष्ट
ग्रुप सिंह भंडारी
संजय सिंह
सत्येंद्र सिंह रावत
अरविंद सिंह रावत
सुरेश चमोली
देवेंद्र गोसाई
पपेंद्र सिंह रावत
मनमोहन
गौरव
रमेश सिंह बेलवाल
की उपस्थिति में जालंत मुद्दों पर हुई चर्चा

