रुद्रपुर। उधम सिंह नगर की राजनीतिक जमीन पर शनिवार को युवा कांग्रेस के प्रदर्शन ने आगामी विधानसभा चुनाव की आहट को और तेज कर दिया। युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता रैली की शक्ल में कलेक्ट्रेट परिसर की ओर बढ़े। कार्यकर्ताओं का उद्देश्य जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपना था, लेकिन कलेक्ट्रेट पहुंचते ही पुलिस ने बैरिकेडिंग कर जुलूस का रास्ता रोक दिया। देखते ही देखते कलेक्ट्रेट परिसर के बाहर राजनीतिक नारों, पुलिस बैरिकेड और युवा आक्रोश का दृश्य दिखाई देने लगा।
कांग्रेस कार्यकर्ताओं का दावा है कि प्रदर्शन में बड़ी संख्या में युवा शामिल हुए और वे कलेक्ट्रेट परिसर में प्रवेश कर जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपना चाहते थे। पुलिस ने मुख्य गेट पर बैरिकेड लगाकर रास्ता अवरुद्ध कर दिया। कलेक्ट्रेट के दूसरे प्रवेश मार्ग पर भी पुलिस बल तैनात किया गया। कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने से रोकने के दौरान तनाव की स्थिति बनी। कांग्रेस की ओर से पुलिस पर दो बार लाठीचार्ज किए जाने के आरोप लगाए गए हैं। पुलिस की ओर से इस कार्रवाई को लेकर आधिकारिक पक्ष सामने आना इस पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष तस्वीर के लिए महत्वपूर्ण होगा।
लाठीचार्ज के आरोपों के बाद युवा कार्यकर्ताओं का आक्रोश और तेज हो गया। प्रदर्शन स्थल पर “चंदा चोर कहां मिलेंगे—भाजपा के दफ्तर में” और “छात्र विरोधी कहां मिलेंगे—भाजपा के दफ्तर में” जैसे नारे गूंजने लगे। कार्यकर्ताओं ने “जब-जब धामी डरता है, पुलिस को आगे करता है” का नारा भी लगाया। यह नारा कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति में आने वाले चुनावी दौर में कितना प्रभावी होता है, इसका फैसला जनता करेगी।
प्रदर्शन में गदरपुर के पूर्व विधायक प्रेमानंद महाजन, पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल, उप नेता प्रतिपक्ष भुवन कापड़ी, देवेंद्र शाही, जेपी जनार्दन, हिमांशु गावा, संजय ठुकराल सहित बड़ी संख्या में कांग्रेस और युवा कांग्रेस कार्यकर्ता मौजूद रहे।
हल्द्वानी की घटना से राष्ट्रीय राजनीति तक
रुद्रपुर का यह प्रदर्शन केवल स्थानीय ज्ञापन या पुलिस बैरिकेड तक सीमित दिखाई नहीं देता। इसके पीछे कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति भी जुड़ी हुई है। हल्द्वानी में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से जुड़े घटनाक्रम को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में पहले से आक्रोश है। कांग्रेस इसे सामाजिक न्याय, संविधान और लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर जनता के बीच ले जाने की कोशिश कर रही है।
मल्लिकार्जुन खरगे लंबे समय से सामाजिक न्याय और संविधान की रक्षा को कांग्रेस की राजनीतिक भाषा का प्रमुख हिस्सा बनाते रहे हैं। ऐसे में उत्तराखंड में युवा कांग्रेस का प्रदर्शन उस राष्ट्रीय विमर्श को स्थानीय राजनीतिक जमीन से जोड़ने का प्रयास भी माना जा सकता है।
रुद्रपुर की सड़क से लेकर कलेक्ट्रेट तक जो राजनीतिक संदेश दिखाई दिया, उसमें एक तरफ भाजपा सरकार के खिलाफ युवाओं का आक्रोश था, तो दूसरी तरफ कांग्रेस आगामी चुनाव के लिए सामाजिक न्याय की राजनीति को मजबूत करने की कोशिश करती दिखाई दी।
एक प्रदर्शन, दो राजनीतिक कार्यक्रम
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि जिस समय युवा कांग्रेस का काफिला कलेक्ट्रेट की ओर बढ़ रहा था, उसी दौरान भाजपा की ओर से कांग्रेस के विरोध में पुतला दहन का कार्यक्रम किया गया।
यही वह बिंदु है जहां रुद्रपुर की राजनीति एक साधारण विरोध-प्रदर्शन से निकलकर वैचारिक संघर्ष का रूप लेती दिखाई देती है।
कांग्रेस का आरोप है कि उसके आंदोलन के जवाब में भाजपा ने पुतला दहन कर राजनीतिक प्रतिरोध दर्ज कराया। भाजपा की ओर से इसे अपने राष्ट्रीय नेतृत्व और वैचारिक पक्ष के समर्थन में उठाया गया कदम माना जा सकता है। सवाल यह है कि लोकतंत्र में विरोध का उत्तर फिर विरोध से देना स्वस्थ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा है या फिर जनता के वास्तविक मुद्दे कहीं पीछे छूट रहे हैं?
यहीं से ब्राह्मणवाद बनाम सामाजिक न्याय की बहस को समझने की आवश्यकता पैदा होती है।
मनुस्मृति का संदर्भ और आधुनिक लोकतंत्र
ब्राह्मणवाद शब्द का राजनीतिक इस्तेमाल आज अक्सर तीखे विवाद को जन्म देता है। ब्राह्मण समुदाय और ब्राह्मणवाद को एक ही अर्थ में देखना ऐतिहासिक तथा सामाजिक रूप से उचित नहीं होगा। ब्राह्मण समाज के भीतर भी अनेक विचारधाराएं रही हैं और आधुनिक भारत में संविधान आधारित समानता को स्वीकार करने वाले करोड़ों नागरिक हैं।
परंतु जाति-आधारित सामाजिक व्यवस्था की आलोचना भारतीय सामाजिक आंदोलनों का पुराना हिस्सा रही है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जाति व्यवस्था की आलोचना करते हुए धार्मिक-सामाजिक ग्रंथों और परंपराओं के उन हिस्सों पर सवाल उठाया जिन्हें वे सामाजिक असमानता को कायम रखने वाला मानते थे।
मनुस्मृति के कुछ प्रावधानों में वर्ण-आधारित असमान दंड व्यवस्था के उदाहरण मिलते हैं। विशेष रूप से शूद्र द्वारा उच्च वर्ण के व्यक्ति के प्रति कथित अपमान या सामाजिक मर्यादा के उल्लंघन से जुड़े कठोर दंडों का वर्णन मिलता है। कुछ श्लोकों में शूद्र के लिए शारीरिक दंड, अंग-भंग अथवा कान में गर्म पदार्थ डालने जैसे अमानवीय दंडों का उल्लेख किया गया है।
इन प्रावधानों को आधुनिक भारत के संविधान के मूल्यों के साथ रखकर देखें तो अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। आज भारत का संविधान कानून के समक्ष समानता, गरिमा और भेदभाव से संरक्षण की बात करता है। आधुनिक लोकतंत्र में किसी व्यक्ति की जाति उसके अधिकारों या सम्मान का आधार नहीं हो सकती।
इसलिए बहस किसी जाति के व्यक्ति को कटघरे में खड़ा करने की नहीं, उस विचारधारा की आलोचना की होनी चाहिए जो जन्म के आधार पर मनुष्य की श्रेष्ठता या हीनता निर्धारित करती है।
क्या भाजपा का पुतला दहन विकास की राजनीति है?
रुद्रपुर के नागरिकों के सामने अब एक सीधा राजनीतिक सवाल खड़ा हो रहा है—क्या पुतला दहन विकास की राजनीति का हिस्सा है?
सत्ता पक्ष का अपना राजनीतिक उत्तर हो सकता है और विपक्ष का अपना। लोकतंत्र में दोनों को अपनी बात कहने का अधिकार है। मगर जनता यह जरूर पूछेगी कि सड़क, जलभराव, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों, व्यापारियों, युवाओं और शहर के विकास जैसे मुद्दों के बीच राजनीतिक ऊर्जा का कितना हिस्सा पुतला दहन में खर्च होना चाहिए?
रुद्रपुर आज उत्तराखंड के सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक और राजनीतिक केंद्रों में है। यहां जातीय समीकरण भी राजनीति को प्रभावित करते हैं और क्षेत्रीय पहचान भी। देसी समाज, पंजाबी समाज, पहाड़ी समाज, दलित समाज, व्यापारी वर्ग, अल्पसंख्यक समुदाय और युवा मतदाता—सभी आगामी चुनाव में अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं तय करेंगे।
यही कारण है कि 2027 की तैयारी केवल विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं में नहीं, बल्कि सामाजिक समूहों के बीच भी दिखाई देने लगी है।
“जब-जब धामी डरता है…” से मिशन 2027 तक
युवा कांग्रेस का यह नारा—“जब-जब धामी डरता है, पुलिस को आगे करता है”—आने वाले समय में कांग्रेस के चुनावी अभियान का हिस्सा बनता है या केवल एक प्रदर्शन तक सीमित रहता है, यह देखना दिलचस्प होगा।
गढ़वाल से कुमाऊं तक युवाओं के बीच बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रियाओं, शिक्षा और रोजगार से जुड़े सवाल पहले से राजनीतिक मुद्दे हैं। यदि पुलिस कार्रवाई और राजनीतिक विरोध के बीच टकराव बढ़ता है तो विपक्ष इसे सरकार के खिलाफ व्यापक अभियान में बदलने का प्रयास करेगा।
यही 2027 की चुनावी राजनीति की शुरुआत हो सकती है।
कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि वह केवल भाजपा विरोधी नारेबाजी से आगे बढ़कर युवाओं के लिए स्पष्ट रोजगार नीति, शिक्षा नीति, पारदर्शी भर्ती व्यवस्था और स्थानीय विकास का अपना मॉडल सामने रखे।
भाजपा के लिए चुनौती यह है कि वह विपक्ष के आंदोलन को केवल राजनीतिक विरोध मानकर खारिज करने के बजाय जनता के सवालों का जवाब दे।
दलित और देसी समाज किस दिशा में जाएगा?
उधम सिंह नगर की राजनीति में दलित और देसी समाज की भूमिका महत्वपूर्ण है। रुद्रपुर तथा आसपास के क्षेत्रों में इन समुदायों का राजनीतिक रुख चुनावी परिणामों पर प्रभाव डाल सकता है।
यही कारण है कि ब्राह्मणवाद, सामाजिक न्याय और संविधान की बहस को कांग्रेस जिस तरह जनता के बीच ले जा रही है, उसका प्रभाव कितना होगा, यह आगामी महीनों में स्पष्ट होगा।
परंतु एक महत्वपूर्ण सवाल यहां भी है—क्या किसी समुदाय को दूसरे समुदाय के खिलाफ खड़ा करके सामाजिक न्याय हासिल किया जा सकता है?
उत्तर स्पष्ट होना चाहिए—भारत की लोकतांत्रिक राजनीति का रास्ता जातीय संघर्ष से आगे जाकर समान नागरिकता की ओर जाना चाहिए।
दलित समाज को सम्मान चाहिए, अवसर चाहिए, शिक्षा चाहिए, रोजगार चाहिए और संवैधानिक अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा चाहिए। देसी समाज को भी आर्थिक अवसर और राजनीतिक प्रतिनिधित्व चाहिए। ब्राह्मण समाज को भी किसी सामूहिक अपराधबोध में धकेलना सामाजिक न्याय का रास्ता नहीं हो सकता।
राजनीति का वास्तविक लक्ष्य उस व्यवस्था को चुनौती देना होना चाहिए जो किसी व्यक्ति को जन्म के आधार पर ऊंचा या नीचा मानती है।
2027 की आहट
रुद्रपुर कलेक्ट्रेट के बाहर लगे बैरिकेड शायद कुछ घंटों के लिए थे, लेकिन उनके पीछे खड़ा राजनीतिक संघर्ष लंबा चलने वाला है।
एक तरफ भाजपा अपनी सरकार के विकास कार्यों और राजनीतिक उपलब्धियों को जनता के बीच ले जाएगी। दूसरी तरफ कांग्रेस सामाजिक न्याय, संविधान, बेरोजगारी और सरकारी कार्रवाई को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी कर रही है।
युवा कांग्रेस के इस प्रदर्शन ने यह संकेत जरूर दिया है कि 2027 की चुनावी लड़ाई अब दूर दिखाई देने वाली चीज नहीं रह गई है। राजनीतिक दल अपने-अपने सामाजिक समीकरणों को सक्रिय करने लगे हैं।
अब उधम सिंह नगर के मतदाताओं के सामने सवाल केवल भाजपा या कांग्रेस चुनने का नहीं होगा। सवाल यह भी होगा कि वे किस प्रकार की राजनीति चाहते हैं—पुतला दहन और नारेबाजी की राजनीति या विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक बराबरी की राजनीति?
और यदि ब्राह्मणवाद के नाम पर किसी विचारधारा की आलोचना होती है तो उसका अंतिम लक्ष्य किसी जाति का विरोध नहीं, जातिगत भेदभाव की समाप्ति और संवैधानिक समानता होना चाहिए।
रुद्रपुर के कलेक्ट्रेट का बैरिकेड आज हट जाएगा। प्रदर्शनकारी भी अपने घर लौट जाएंगे। पुतले भी जलकर राख हो जाएंगे। मगर 2027 का सवाल अपनी जगह खड़ा रहेगा—
क्या उत्तराखंड की अगली राजनीति जाति और प्रतिशोध के नारों से तय होगी, या संविधान, सामाजिक न्याय और विकास के सवालों से?
कलेक्ट्रेट के बैरिकेड से 2027 की दस्तक तकरुद्रपुर में युवा कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन, लाठीचार्ज के आरोप और ब्राह्मणवाद की सियासत
