मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले के सामरसा गांव में तेजा दशमी के अवसर पर चंबल नदी में डुबकी लगाने पर पुजारी या भगत के गले में काला सांप आने की रहस्यमयी घटना जुड़ी हुई है।

Spread the love

तेजा दशमी का मेला: हर साल तेजा दशमी पर चंबल नदी के तट पर मेला लगता है, जहां हजारों श्रद्धालु इकट्ठा होते हैं। गले में सांप आना: स्थानीय मान्यता के अनुसार, मंदिर के भगत (जैसे काडूराम मीणा या पूर्व में अन्य महाराज) नदी में डुबकी लगाते हैं और पानी से बाहर आते वक्त उनके हाथों या गले में काला नाग लिपटा हुआ होता है।आस्था और इलाज: इस सांप को तेजाजी का प्रतीक माना जाता है। भगत इसी स्थिति में बीमारों और सर्पदंश से पीड़ित लोगों का इलाज करते हैं

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

चंबल नदी की लहरों में छिपे मगरमच्छों और घड़ियालों की कहानियां तो आपने बहुत सुनी होंगी, लेकिन इसी नदी के किनारे बसा मध्य प्रदेश का एक गांव हर साल एक ऐसे रहस्य का गवाह बनता है, जहाँ आस्था और अचरज का अनूठा संगम देखने को मिलता है। श्योपुर जिले के सामरसा गांव में तेजा दशमी के पावन पर्व पर हजारों श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। इस मौके पर नदी में डुबकी लगाने के बाद पुजारी के गले में अचानक काला सांप प्रकट होने की घटना एक बार फिर हर तरफ चर्चा का विषय बनी हुई है।

डुबकी लगाते ही हाथों में आ गया नाग

स्थानीय प्रत्यक्षदर्शियों और मंदिर समिति से जुड़े लोगों के अनुसार, तेजा दशमी के दिन मंदिर के मुख्य भगत (पुजारी) ने पूरी श्रद्धा के साथ चंबल नदी के गहरे पानी में डुबकी लगाई। जैसे ही वह पानी से बाहर निकले, उनके हाथों और गले में एक काला नाग लिपटा हुआ था। नदी के घाट पर मौजूद हजारों श्रद्धालुओं ने जयकारों के साथ इस दृश्य का स्वागत किया। स्थानीय लोगों के लिए यह कोई आम घटना नहीं, बल्कि लोक देवता वीर तेजाजी महाराज का साक्षात चमत्कार है।

सर्पदंश से मुक्ति का विश्वास

सामरसा गांव में लगने वाले इस मेले में केवल आसपास के जिलों से ही नहीं, बल्कि राजस्थान और अन्य पड़ोसी राज्यों से भी लोग पहुँचते हैं। मान्यता है कि तेजा दशमी के दिन इस विशेष नाग के दर्शन करने और भगत जी के आशीर्वाद से जहरीले जीवों के काटने (सर्पदंश) का असर खत्म हो जाता है। मेले में आए कई श्रद्धालुओं का दावा है कि वे यहाँ केवल अपनी मन्नतें पूरी होने पर आभार जताने आते हैं।

आस्था या कोई और पहेली?

जहाँ एक तरफ ग्रामीण और श्रद्धालु इसे शुद्ध रूप से दैवीय चमत्कार और अटूट आस्था का प्रतीक मानते हैं, वहीं दूसरी ओर तर्कवादियों और जीव विज्ञान के जानकारों का नज़रिया अलग है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, चंबल और उसके आसपास का इलाका विभिन्न प्रजातियों के सांपों और सरीसृपों का प्राकृतिक आवास है। पानी के भीतर सांपों को पकड़ने या वश में करने की पारंपरिक कला (Snake Charming) के जरिए भी ऐसा संभव हो सकता है।

बहरहाल, विज्ञान चाहे जो भी दलील दे, लेकिन सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों की धार्मिक भावनाओं से मजबूती से जुड़ी हुई है। सामरसा के चंबल घाट पर लगने वाला यह मेला आज भी रहस्य और श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है।



Spread the love