उत्तराखंड के 5 सबसे बड़े चर्चित भ्रष्टाचार के आरोप और घोटाले

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  • यूकेएसएसएससी (UKSSSC) भर्ती घोटाला और पेपर लीक
    यह धामी सरकार के कार्यकाल का सबसे चर्चित और बड़ा घोटाला माना जाता है। उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) द्वारा आयोजित स्नातक स्तरीय परीक्षा, सचिवालय रक्षक और वन दरोगा जैसी विभिन्न भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक होने के गंभीर आरोप लगे
  • अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
  • आरोप: विपक्ष का आरोप था कि इस घोटाले के तार शासन और सत्ता में बैठे ऊंचे रसूखदार लोगों से जुड़े हुए थे और युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया गया।
    सरकारी कार्रवाई: इस मामले में व्यापक विरोध के बाद सरकार ने एसटीएफ (STF) जांच बैठाई, जिसके तहत हाकम सिंह समेत 80 से अधिक नकल माफियाओं और बिचौलियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। इसके बाद सरकार ने कड़ा ‘नकल विरोधी कानून’ भी लागू किया।
  • योग्य उम्मीदवार वंचित रह गए।
  • सरकारी कार्रवाई: चौतरफा घिरने के बाद विधानसभा अध्यक्ष ने एक जांच समिति बनाई थी, जिसकी सिफारिश पर वर्ष 2016 के बाद हुई 200 से अधिक तदर्थ (Ad-hoc) नियुक्तियों को निरस्त कर दिया गया था। हालांकि, विपक्ष का आरोप है कि इस व्यवस्था के असली मास्टरमाइंड्स पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

5. सरकारी जमीनों का निजीकरण और कोचर कॉलोनी विवाद

हाल के दिनों में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने धामी सरकार पर उत्तराखंड के प्राकृतिक संसाधनों और कीमती सरकारी जमीनों को कौड़ियों के दाम निजी क्षेत्र को बेचने का आरोप लगाया है।

  • आरोप: कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने आरोप लगाया कि सरकार भू-माफियाओं और निजी उद्योगों को फायदा पहुंचाने के लिए नियम बदल रही है। इसी तरह देहरादून के चर्चित कोचर कॉलोनी मामले में भी होटल व्यवसायियों और राजस्व अधिकारियों (लेखपालों) के बीच साठगांठ का मामला सामने आया।
  • सरकारी कार्रवाई: कोचर कॉलोनी भूमि मामले में अनियमितता पाए जाने पर धामी सरकार ने आरोपी लेखपालों के खिलाफ विजिलेंस जांच और मुकदमा चलाने की अनुमति दी है।

धामी सरकार का रुख और बचाव

भ्रष्टाचार के इन तमाम आरोपों पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का कहना है कि उनकी सरकार भ्रष्टाचार मुक्त उत्तराखंड के संकल्प पर काम कर रही है। सरकार के अनुसार:

  • पिछले 3-4 वर्षों में भ्रष्टाचार के मामलों में संलिप्त 200 से अधिक लोगों को जेल भेजा जा चुका है, जिनमें बड़े प्रशासनिक अधिकारी (जैसे आईएएस राम विलास यादव और आईएफएस किशनचंद) भी शामिल हैं।
  • शिकायत दर्ज करने के लिए ‘1064 भ्रष्टाचार विरोधी हेल्पलाइन’ और सतर्कता विभाग (Vigilance) को पूरी तरह स्वतंत्र कर दिया गया है ताकि किसी भी भ्रष्ट अधिकारी को बख्शा न जाए।

हरिद्वार नगर निगम जमीन घोटाला (2024–2026)

हरिद्वार नगर निगम में भूमि खरीद प्रक्रिया के दौरान करोड़ों रुपये के वित्तीय घपले और नियमों की अनदेखी का मामला सामने आया।

  • आरोप: आरोप लगाया गया कि प्रशासनिक अधिकारियों ने मिलीभगत करके नगर निगम के लिए जमीन खरीदने में भारी वित्तीय अनियमितताएं कीं और सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया।
  • सरकारी कार्रवाई: इस मामले में विशेष जांच और ऑडिट रिपोर्ट के बाद मुख्यमंत्री धामी ने कड़ा रुख अपनाया। सरकार ने तत्कालीन नगर आयुक्त (IAS वरुण चौधरी) को बर्खास्त करने की सिफारिश की और तत्कालीन जिलाधिकारी (IAS कर्मेंद्र सिंह) समेत अन्य बड़े अधिकारियों के खिलाफ सख्त विभागीय और दंडात्मक कार्रवाई के आदेश दिए

सहकारिता और को-ऑपरेटिव बैंक भर्ती घोटाला (124 करोड़ रुपये का विवाद)

राज्य के सहकारी बैंकों (Co-operative Banks) में नियुक्तियों और जमा पूंजी के प्रबंधन में बड़े पैमाने पर धांधली के आरोप लगे हैं।

आरोप: विपक्ष और जमाकर्ताओं का आरोप है कि बैंक के बोर्ड में तत्कालीन अध्यक्ष और राजनेताओं के करीबियों व रिश्तेदारों को योग्यता मानदंडों को ताक पर रखकर ऊंचे वेतन पर नियुक्त किया गया। साथ ही, लगभग 124 करोड़ रुपये की जमा राशि के प्रबंधन में नियमों की अनदेखी की गई।सरकारी कार्रवाई: इस मामले में गंभीर शिकायतों को देखते हुए सीएम धामी ने पुलिस महानिरीक्षक (गढ़वाल रेंज) और देहरादून एसएसपी को तत्काल जांच करने तथा एक उच्च स्तरीय समिति गठित करने के निर्देश दिए हैं।

विधानसभा बैकडोर भर्ती विवाद

उत्तराखंड विधानसभा में विभिन्न पदों पर बिना किसी खुली प्रतियोगिता या परीक्षा के, बैकडोर (पीछे के दरवाजे) से चहेतों और राजनेताओं के रिश्तेदारों को नौकरियां देने का मामला भारी विवादों में रहा।

  • आरोप: विपक्ष ने आरोप लगाया कि सत्ताधारी दल के मंत्रियों और प्रभावशाली नेताओं ने अपने सगे-संबंधियों को नियमों को ताक पर रखकर विधानसभा सचिवालय में नियुक्तियां दिलवाईं, जिससे योग्य उम्मीदवार वंचित रह गए।
  • सरकारी कार्रवाई: चौतरफा घिरने के बाद विधानसभा अध्यक्ष ने एक जांच समिति बनाई थी, जिसकी सिफारिश पर वर्ष 2016 के बाद हुई 200 से अधिक तदर्थ (Ad-hoc) नियुक्तियों को निरस्त कर दिया गया था। हालांकि, विपक्ष का आरोप है कि इस व्यवस्था के असली मास्टरमाइंड्स पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

सरकारी जमीनों का निजीकरण और कोचर कॉलोनी विवाद

हाल के दिनों में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने धामी सरकार पर उत्तराखंड के प्राकृतिक संसाधनों और कीमती सरकारी जमीनों को कौड़ियों के दाम निजी क्षेत्र को बेचने का आरोप लगाया है।


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