शनि मंदिर के नाम पर ढांचे को लेकर रानीबाग में विवाद, चित्रेश्वर महादेव धाम बचाने की उठी मांग

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हल्द्वानी/रानीबाग। गौला नदी किनारे स्थित पौराणिक चित्रेश्वर महादेव मंदिर परिसर में शनि मंदिर के नाम पर बनाए गए एक बड़े ढांचे को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। स्थानीय लोगों और धार्मिक आस्था से जुड़े लोगों ने आरोप लगाया है कि मंदिर के पारंपरिक आंगन और आसपास के क्षेत्र को लोहे-सरिया तथा अन्य निर्माण सामग्री से घेरकर धार्मिक स्थल के स्वरूप को प्रभावित किया जा रहा है। उन्होंने प्रशासन से पूरे मामले की जांच कराकर यदि निर्माण नियमविरुद्ध पाया जाए तो ढांचे को हटाने की मांग की है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि उनका विरोध शनिदेव की पूजा या शनिदेव मंदिर से नहीं, बल्कि कथित अतिक्रमण और सार्वजनिक धार्मिक परिसर के सीमित किए जाने से है। उनका तर्क है कि चित्रेश्वर महादेव मंदिर का आंगन सदियों से श्रद्धालुओं, मेलों और धार्मिक आयोजनों का हिस्सा रहा है। ऐसे में किसी भी प्रकार का स्थायी निर्माण अथवा घेराबंदी करने से मंदिर की मूल व्यवस्था और श्रद्धालुओं की आवाजाही प्रभावित हो सकती है।
प्रदर्शनकारियों ने इस मुद्दे को धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक विरासत से जोड़ते हुए नारे लगाए—“अवैध ढांचा हटाओ, चित्रेश्वर धाम बचाओ” और “आंगन खाली कराओ, रानीबाग बचाओ।” उनका कहना है कि यदि निर्माण के लिए संबंधित विभागों से आवश्यक अनुमति नहीं ली गई है तो प्रशासन को तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए।
पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा है चित्रेश्वर धाम
चित्रेश्वर महादेव मंदिर को स्थानीय धार्मिक परंपराओं में अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। लोकमान्यताओं के अनुसार इस क्षेत्र का संबंध मार्कंडेय ऋषि की तपस्या से जोड़ा जाता है। चित्रेश्वर क्षेत्र को पुष्पभद्रा और गार्गी नदियों के संगम तथा गौला नदी की धार्मिक परंपरा से भी जोड़ा जाता है।
रानीबाग का संबंध कत्यूर राजवंश और जिया रानी की लोकगाथा से भी बताया जाता है। स्थानीय मान्यता में जिया रानी को साहस और संघर्ष की प्रतीक माना जाता है। रानीबाग में मौजूद शिला से जुड़ी लोककथाएं आज भी क्षेत्र की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं। इसी कारण प्रदर्शनकारियों का कहना है कि रानीबाग केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि कुमाऊं की ऐतिहासिक और लोक-सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र है।
“मंदिर का आंगन भी मंदिर का हिस्सा”
विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि किसी भी प्राचीन मंदिर की पहचान केवल गर्भगृह अथवा मुख्य भवन तक सीमित नहीं होती। मंदिर का आंगन, रास्ते, पूजा स्थल और परंपरागत आयोजन क्षेत्र भी उसकी धार्मिक व्यवस्था का हिस्सा होते हैं। उनका आरोप है कि कथित ढांचे के कारण मंदिर का खुला क्षेत्र संकुचित हो रहा है।
उनका सवाल है कि यदि मंदिर परिसर के खुले हिस्से को स्थायी ढांचे से घेर दिया गया तो मकर संक्रांति जैसे अवसरों पर लगने वाले पारंपरिक मेलों, श्रद्धालुओं की आवाजाही और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए पर्याप्त स्थान कैसे उपलब्ध रहेगा।
प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन से मांग की है कि मौके का सीमांकन कराया जाए और राजस्व अभिलेखों तथा मंदिर से संबंधित भूमि की स्थिति सार्वजनिक की जाए। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट करने की मांग की गई है कि संबंधित ढांचे के निर्माण के लिए किस विभाग से अनुमति ली गई और निर्माण किस भूमि पर किया गया।
“शनिदेव न्याय के देवता हैं, अतिक्रमण के पक्ष में नहीं”
आंदोलन से जुड़े लोगों ने कहा कि वे शनिदेव के विरोधी नहीं हैं। उनका कहना है कि सनातन परंपरा में शनिदेव को न्याय का देवता माना जाता है और इसी धार्मिक भावना के कारण उनका विरोध किसी देवता के नाम पर नहीं, बल्कि कथित अतिक्रमण के खिलाफ है।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि जांच में निर्माण वैध पाया जाता है तो प्रशासन को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, लेकिन यदि यह सरकारी अथवा सार्वजनिक धार्मिक भूमि पर बिना अनुमति किया गया निर्माण है तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
29 अगस्त की घटना के बाद बढ़ा आक्रोश
विरोध कर रहे लोगों ने दावा किया कि 29 अगस्त को इस मामले को लेकर आवाज उठाई गई थी। इसके बाद से क्षेत्र में असंतोष बढ़ा है। अब आंदोलनकारी प्रशासन से स्पष्ट कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि मामले का समाधान नहीं होने पर व्यापक जनआंदोलन शुरू किया जा सकता है।
हालांकि, पूरे प्रकरण में प्रशासनिक स्तर पर भूमि की वास्तविक स्थिति, निर्माण की अनुमति और ढांचे की वैधानिकता स्पष्ट होना महत्वपूर्ण है। किसी भी निर्माण को अवैध घोषित करने से पहले संबंधित राजस्व अभिलेख, भूमि स्वामित्व, सीमांकन और सक्षम प्राधिकरण की अनुमति की जांच आवश्यक होगी।
विरासत बचाने की मांग
आंदोलनकारियों का कहना है कि रानीबाग की पहचान केवल वर्तमान पीढ़ी तक सीमित नहीं है। चित्रेश्वर महादेव, जिया रानी की लोकगाथा और गौला नदी से जुड़ी धार्मिक परंपराएं क्षेत्र की सामूहिक सांस्कृतिक विरासत हैं। इसलिए धार्मिक स्थलों के संरक्षण के साथ उनके पारंपरिक खुले क्षेत्र को भी सुरक्षित रखना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि “चित्रशिला के लुटेरों सुन लो—रानीबाग खाली करो” जैसे नारों के माध्यम से वे अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं, लेकिन उनकी प्राथमिक मांग कानूनी प्रक्रिया के तहत कथित अतिक्रमण की जांच और कार्रवाई है।
अब नजर प्रशासन की अगली कार्रवाई पर है। यदि प्रशासन मौके का निरीक्षण कर भूमि का सीमांकन और निर्माण की वैधानिक स्थिति स्पष्ट करता है तो विवाद की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है। वहीं, यदि निर्माण नियमों के विपरीत पाया जाता है तो उसे हटाने की कार्रवाई की मांग और तेज हो सकती है।
चित्रेश्वर महादेव धाम और रानीबाग की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत को लेकर उठे इस विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या प्राचीन धार्मिक स्थलों के पारंपरिक आंगन और सार्वजनिक उपयोग वाले क्षेत्रों को किसी भी नए निर्माण से सीमित किया जा सकता है? इसका जवाब अब प्रशासनिक जांच और कानूनी प्रक्रिया से ही सामने आएगा।


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