उत्तराखंड में करीब 600 एमबीबीएस इंटर्न डॉक्टरों के कार्य बहिष्कार से सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है। पांच सरकारी मेडिकल कॉलेजों से जुड़े इन इंटर्न डॉक्टरों ने मौजूदा स्टाइपेंड को लेकर विरोध शुरू किया है।

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देहरादून के दून अस्पताल में इंटर्न डॉक्टरों ने ओपीडी के बाहर धरना दिया और स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग उठाई।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

इंटर्न डॉक्टरों का कहना है कि उन्हें फिलहाल 17,000 प्रति माह स्टाइपेंड मिल रहा है, जिसे बढ़ाकर 30,000 प्रति माह किया जाना चाहिए। डॉक्टरों का तर्क है कि अस्पतालों में उनकी जिम्मेदारियां और काम का दबाव देखते हुए मौजूदा राशि पर्याप्त नहीं है।

इंटर्न क्यों उतरे विरोध में?

उत्तराखंड के पांच सरकारी मेडिकल कॉलेजों में इंटर्नशिप कर रहे डॉक्टर इस मुद्दे को लेकर लंबे समय से अपनी मांग उठा रहे हैं। उनका कहना है कि स्टाइपेंड में संशोधन की मांग पहले भी अधिकारियों और शासन के सामने रखी गई, लेकिन ठोस निर्णय नहीं हो सका। इसी के बाद सोमवार से कार्य बहिष्कार का रास्ता अपनाया गया।

इंटर्न डॉक्टरों की प्रमुख मांग है कि मौजूदा 17,000 मासिक स्टाइपेंड को बढ़ाकर कम से कम 30,000 किया जाए। विरोध कर रहे डॉक्टर महंगाई और अस्पताल में काम के बढ़ते दबाव को भी अपनी मांग के पीछे की वजह बता रहे हैं।

ओपीडी और वार्ड सेवाओं पर असर

आंदोलन का सबसे बड़ा असर देहरादून के दून अस्पताल में दिखाई दिया, जहां इंटर्न डॉक्टर ओपीडी के बाहर धरने पर बैठे। कार्य बहिष्कार के चलते ओपीडी, ऑपरेशन थिएटर और वार्डों में इंटर्न डॉक्टरों की नियमित सेवाएं प्रभावित हुईं।

हालांकि मरीजों की गंभीर स्थिति को देखते हुए इमरजेंसी सेवाओं में तैनात इंटर्न डॉक्टर काम करते रहे। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि आपात स्थिति में मरीजों को तत्काल चिकित्सा सहायता मिलती रहे।

यही वजह है कि इस आंदोलन का असर सिर्फ मेडिकल कॉलेजों तक सीमित नहीं है। सरकारी अस्पतालों में इंटर्न डॉक्टर स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं और उनके कार्य बहिष्कार से मरीजों की नियमित सेवाओं पर दबाव बढ़ सकता है।

सरकार ने क्या कहा?

इंटर्न डॉक्टरों के आंदोलन के बीच चिकित्सा शिक्षा निदेशक डॉ. आशुतोष सयाना ने कहा कि स्टाइपेंड में संशोधन के लिए प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। दून मेडिकल कॉलेज और श्रीनगर मेडिकल कॉलेज की ओर से प्रस्ताव मिल चुका है, जबकि बाकी सरकारी मेडिकल कॉलेजों से भी जानकारी मांगी गई है।

सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि मांग पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है और हड़ताल समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। इंटर्न डॉक्टरों से काम पर लौटने की अपील की गई है। इससे संकेत मिलता है कि सरकार अब स्टाइपेंड संशोधन के लिए औपचारिक प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है, लेकिन 30 हजार की मांग पर अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है।

पीजी डॉक्टरों का मुद्दा भी गर्म

उत्तराखंड में स्टाइपेंड को लेकर नाराजगी केवल एमबीबीएस इंटर्न तक सीमित नहीं है। करीब 600 पीजी डॉक्टरों से जुड़ा विरोध भी इसी व्यापक असंतोष का हिस्सा है। पहले सामने आई जानकारी के अनुसार लगभग 1,200 जेन-जी डॉक्टरों, करीब 600 पीजी डॉक्टर और 600 एमबीबीएस इंटर्न के आंदोलन की स्थिति बनी थी।

हालांकि, राहत की बात यह रही कि पीजी डॉक्टरों ने अपनी प्रस्तावित हड़ताल को फिलहाल एक सप्ताह के लिए टाल दिया, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं पर एक साथ पड़ने वाला बड़ा दबाव कुछ कम हुआ है।

इंटर्न आंदोलन को मिला समर्थन

इंटर्न डॉक्टरों के आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर भी समर्थन मिला है। फेडरेशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (FORDA) और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने इंटर्नशिप की मांग का समर्थन किया है।

इससे स्टाइपेंड का मुद्दा केवल उत्तराखंड के मेडिकल कॉलेजों तक सीमित नहीं रह गया है। देश के अलग-अलग राज्यों में मेडिकल इंटर्न के स्टाइपेंड में अंतर और काम के अनुरूप भुगतान का मुद्दा समय-समय पर उठता रहा है।

हाल ही में उत्तर प्रदेश में भी एमबीबीएस और बीडीएस इंटर्न का स्टाइपेंड बढ़ाकर 25,000 प्रति माह किया गया था। वहां कैबिनेट ने अगस्त 2026 में 12,000 से बढ़ाकर 25,000 करने को मंजूरी दी थी।

आगे क्या होगा?

फिलहाल नजर सरकार द्वारा तैयार किए जा रहे संशोधन प्रस्ताव पर है। विभिन्न मेडिकल कॉलेजों से जानकारी जुटाए जाने के बाद प्रस्ताव शासन स्तर पर जा सकता है। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि स्टाइपेंड में कितनी बढ़ोतरी की जाती है और यह कब से लागू होगी। दूसरी तरफ इंटर्न डॉक्टर अपनी मांग पर कायम हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार और प्रदर्शनकारी डॉक्टरों के बीच बातचीत इस पूरे विवाद की दिशा तय कर सकती है।


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