उज्जैन के खड़े हनुमान टस से मस नहीं हुए…इस खबर की सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हो रही है. इससे जुड़े वीडियो भी वायरल हो रहे हैं। चलिए बताते हैं कि माजरा क्या है, जब सड़क चौड़ी करने के प्रोजेक्ट के रास्ते में कोई ऐसी मूर्ति आ जाए जिसे हटाया न जा सके, तो क्या होता है?

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उज्जैन में कर्मचारियों ने मंदिर का ढांचा तो गिरा दिया है, लेकिन ‘खड़े हनुमान’ की मूर्ति को हटाने की बार-बार की कोशिशें नाकाम रही हैं। अब भक्त इसे ईश्वरीय संकेत मान रहे हैं, कई लोग इसे चमत्कार बता रहे हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

कई का कहना है कि हनुमान जी अपना स्थल नहीं बदलना चाहते हैं जबकि अधिकारी विशेषज्ञों की मदद ले रहे हैं। इस बीच भक्तों ने वहां हनुमान चालीसा का पाठ किया है, वहीं लोगों का कहना है कि गोली चल जाएगी मगर मूर्ति अब यहीं रहेगी। असल में अर्थमूवर्स ने मंदिर तो गिरा दिया, लेकिन मूर्ति को हिलाने में नाकाम रहे।

मध्य प्रदेश के उज्जैन में एक हनुमान मंदिर चर्चा का विषय बन गया है। सड़क चौड़ी करने के लिए मंदिर का ढांचा तो गिरा दिया गया, लेकिन मूर्ति को हटाने की बार-बार की कोशिशें नाकाम रहीं। ‘खड़े हनुमान मंदिर’ उज्जैन में कंथल चौराहा-छतरी चौक रोड पर स्थित है, जहां सड़क चौड़ी करने का काम चल रहा है, कुछ लोगों का दावा है कि यह मंदिर 170 साल पुराना है।

सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के तहत सड़क का काम चल रहा है, इस दौरान उज्जैन में बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों के आने की उम्मीद है। सिंहस्थ उज्जैन में हर 12 साल में मनाया जाने वाला एक बड़ा त्योहार है। यह चार कुंभ मेलों में से एक है, जहां लाखों श्रद्धालु शिप्रा नदी में पवित्र डुबकी लगाने के लिए उज्जैन आते हैं।

यह त्योहार मुख्य रूप से भगवान शिव की पूजा और उज्जैन के मंदिरों से जुड़ा है

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, उज्जैन नगर निगम और ज़िला प्रशासन ने टंकी चौक के पास एक नई जगह पर मूर्ति को सुरक्षित रूप से स्थानांतरित करने की योजना बनाई थी। हालांकि मूर्ति के आस-पास मंदिर का ज़्यादातर ढांचा गिरा दिया गया है, लेकिन हनुमान जी की खड़ी मूर्ति अपनी मूल जगह पर ही बनी हुई है। खबरों के मुताबिक, अधिकारियों और कर्मचारियों ने भारी मशीनों का इस्तेमाल करके इसे हटाने की कई बार कोशिश की, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली।

‘एमपी तक’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ दिनों में चार बार कोशिशें नाकाम रहीं, जिसके बाद भारी मशीनों का इस्तेमाल रोक दिया गया। अमर उजाला जो एक क्षेत्रीय दैनिक समाचार पत्र है उसकी रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारी अब मूर्ति के आधार और उसके आस-पास के ढांचे को स्कैन करने पर विचार कर रहे हैं, ताकि यह तय किया जा सके कि इसे सुरक्षित रूप से कैसे हटाया जा सकता है।

उज्जैन में खड़े हनुमान जी की मूर्ति को लेकर सोशल मीडिया पर ‘दैवीय संकेत’ होने का दावा

इस घटना ने सोशल मीडिया पर काफी चर्चा छेड़ दी है। मूर्ति हटाने की नाकाम कोशिशों के वीडियो और पोस्ट देखकर कुछ भक्तों का मानना ​​है कि यह एक ‘दैवीय संकेत’ है।

झुंड में इकट्ठा हुए बंदर-लोगों ने कहा ये संकेत है

इस चर्चा को और हवा तब मिली जब बंदरों का एक बड़ा झुंड उस जगह के पास इकट्ठा हो गया। मंदिर के पुजारी महेश बैरागी ने ‘एमपी तक’ से बातचीत में कहा कि बार-बार की नाकाम कोशिशों को इस संकेत के तौर पर देखा जाना चाहिए कि देवता इसी जगह पर रहना चाहते हैं।

बैरागी ने कहा, ‘बाबा [भगवान हनुमान] हमें हर दिन संकेत दे रहे हैं कि वह यहीं रहना चाहते हैं। मैं प्रशासन से विनम्रतापूर्वक अनुरोध करता हूं कि वे इन संकेतों को समझें। अगर मूर्ति को हटाना ज़रूरी भी हो, तो मैं चाहता हूं कि देवता को सुरक्षित रूप से उसी रूप और तरीके से स्थानांतरित किया जाए जैसा वह अभी है। जब तक प्रशासन इसकी पूरी सुरक्षा सुनिश्चित न कर ले, तब तक मूर्ति को हटाने की कोई कोशिश नहीं की जानी चाहिए।’

विशेषज्ञों ने उज्जैन मंदिर की और जांच करने का सुझाव दिया है। मंदिर के पुजारी बैरागी ने भी कहा कि प्रशासन ने शुरू में इस मामले को सीधे तरीके से देखा था, लेकिन पुरातत्व विभाग से जुड़े विशेषज्ञों समेत अन्य विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि कोई और कोशिश करने से पहले इसकी और जांच की जानी चाहिए।

माना जाता है कि यह मंदिर लगभग 170 साल पुराना है और स्थानीय लोगों का कहना है कि इसका इतिहास 1857 के आस-पास के समय से जुड़ा है। ऐसे दावे भी हैं कि इस मूर्ति का संबंध और भी पुराने समय जैसे कि परमार काल से हो सकता है, हालांकि इन दावों की अभी तक पक्की पुष्टि नहीं हुई है।

क्या है रहस्य

फिलहाल, मूर्ति उसी जगह पर है और उसे एक अस्थायी शेड के नीचे सुरक्षित रखा गया है, जबकि अधिकारी विशेषज्ञों की राय का इंतज़ार कर रहे हैं। अब सवाल यह है कि प्रशासन हनुमान जी की मूर्ति को बिना नुकसान पहुंचाए वहां से कैसे हटाएगा, खासकर इसलिए क्योंकि अब यह चर्चा का केंद्र बन गई है और कई लोग इसे आस्था बनाम विकास की बहस के तौर पर देख रहे हैं।

गांव के तालाब में 130 साल शांति से रहा मगरमच्छ ‘गंगाराम’, मौत पर रो पड़ा पूरा गांव; हैरान कर रही इंसान और जानवर की ये दुर्लभ कहानी

आइए आपको ‘गंगाराम’ मगरमच्छ की पूरी कहानी सुनाते हैं… छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले में एक गांव है- बावा मोहतरा। यहां के तालाब में एक मगरमच्छ रहता था। जिसे गांव वाले प्यार से गंगाराम पुकारते थे। यह मगरमच्छ सिर्फ एक जंगली जीव नहीं था, बल्कि गांव के लोगों के परिवार का हिस्सा माना जाता था। करीब 130 साल तक तालाब में रहने वाले इस मगरमच्छ ने ऐसी मिसाल कायम की, जिसकी चर्चा आज भी होती है।


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