उत्तराखंड को बारूद के ढेर पर बैठाकर अब ग्लेशियर झीलों की निगरानी की तैयारी! विकास की अंधी दौड़ पर सरकार से हिसाब मांग रहा हिमालय:संपादकीय

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उत्तराखंड,तिब्बत में ग्लेशियर झील टूटने के बाद नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने एक बार फिर हिमालय की भयावह चेतावनी हमारे सामने रख दी है। नेपाल में हुई तबाही को केवल नेपाल की आपदा मानकर आगे बढ़ जाना उत्तराखंड के लिए आत्मघाती भूल होगी। हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएं सीमाओं से बंधी हुई नहीं हैं। तिब्बत, नेपाल और उत्तराखंड का हिमालय एक ही संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा है। वहां ग्लेशियर पिघलते हैं, झीलें बनती हैं, भूस्खलन होते हैं और अचानक पानी का सैलाब नीचे की घाटियों की ओर बढ़ता है तो उसकी चपेट में सीमाओं से परे बसी आबादी आती है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


उत्तराखंड सरकार ने अब संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निगरानी बढ़ाने, वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराने और अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की घोषणा की है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 13 संभावित संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की नियमित एवं वैज्ञानिक निगरानी, अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम और आवश्यकता के अनुसार इनकी संख्या बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। सेंसर, सैटेलाइट और एआई तकनीक के माध्यम से झीलों के जलस्तर, आकार में परिवर्तन, आसपास के भू-भाग और संभावित जोखिम क्षेत्रों की रियल टाइम निगरानी की योजना बनाई जा रही है।
सरकार की यह पहल स्वागत योग्य है। मगर सवाल यह है कि क्या केवल अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने से हिमालय सुरक्षित हो जाएगा? क्या सेंसर उस विकास मॉडल की भरपाई कर सकते हैं जिसने पहाड़ों की प्राकृतिक संरचना को लगातार कमजोर किया है? क्या सैटेलाइट उन देवदार और अन्य वृक्षों को वापस ला सकती है जिन्हें सड़क चौड़ीकरण के नाम पर काट दिया गया? क्या एआई उन पहाड़ों को स्थिर कर सकता है जिनके भीतर सुरंगों और भारी निर्माण की वजह से भूगर्भीय दबाव लगातार बढ़ रहा है? क्या चेतावनी प्रणाली नदी के बाढ़ क्षेत्र में खड़े होटल, रिसोर्ट और कंक्रीट के निर्माण को सुरक्षित कर सकती है?
इन सवालों का जवाब हिमालय खुद दे रहा है।
13 ग्लेशियर झीलें और बढ़ता खतरा
उत्तराखंड में 13 ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील श्रेणी में चिह्नित किया गया है। इनमें से चार का सर्वेक्षण हो चुका है। चमोली स्थित सरस्वती ताल और उत्तरकाशी स्थित केदारताल का सर्वेक्षण भी जल्द किया जाना है। विशेषज्ञ दल इन झीलों की वर्तमान स्थिति, जलस्तर, संरचना और डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव का अध्ययन करेगा।
यह जानकारी अपने आप में बताती है कि खतरा कितना गंभीर है। यदि 13 झीलों को संवेदनशील माना गया है तो उनके आसपास के पूरे जलग्रहण क्षेत्र, नदी घाटियों और डाउनस्ट्रीम आबादी को भी जोखिम के व्यापक दायरे में रखना होगा।
मुख्यमंत्री का यह कहना महत्वपूर्ण है कि हिमालयी क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं को लेकर अत्यधिक संवेदनशील है और आपदाओं को रोका नहीं जा सकता, मगर वैज्ञानिक निगरानी के माध्यम से जानमाल के नुकसान को कम किया जा सकता है। यह बात बिल्कुल सही है। सवाल इसके अगले हिस्से का है—जब खतरे की वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध हो जाए तो क्या सरकार विकास की अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव करेगी?
यही असली परीक्षा है।
गोरी गंगा की तस्वीर सरकार के सामने आईना है
कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर नैनीताल के भूगोल विभाग के प्रो. देवेंद्र परिहार के अध्ययन ने उत्तराखंड के भविष्य की भयावह तस्वीर सामने रखी है। जीआईएस आधारित वर्ष 1990 से 2022 तक के गोरी गंगा क्षेत्र के अध्ययन में सामने आया कि 1990 में गोरी गंगा बेसिन का 30.9 प्रतिशत हिस्सा बर्फ से ढका था। वर्ष 2022 में यह घटकर केवल 10.99 प्रतिशत रह गया।
32 वर्षों में लगभग 20 प्रतिशत बर्फ का खत्म होना सामान्य परिवर्तन मानकर नजरअंदाज करने वाला आंकड़ा नहीं है। यदि यही गति जारी रही तो 2040 से पहले गोरी गंगा बेसिन के पूरी तरह बर्फ विहीन होने की आशंका व्यक्त की गई है।
यह  आंकड़ा उत्तराखंड की जल सुरक्षा, कृषि, नदियों, जैव विविधता, पनबिजली, पर्यटन और भविष्य की पीढ़ियों का सवाल है।
ग्लेशियर पीछे हटेंगे तो नई झीलें बनेंगी। झीलों में मलबा जमा होगा। ग्लेशियर झीलों पर दबाव बढ़ेगा। भारी वर्षा या भू-गतिविधि के दौरान झील टूट सकती है। इसके बाद जो पानी नीचे की ओर आएगा, वह केवल पानी नहीं होगा—वह अपने साथ मलबा, चट्टान, पेड़, सड़क, पुल और मानव बस्तियों को बहाने की क्षमता रखेगा।
पिथौरागढ़ में 77 से अधिक नई झीलें खतरे की घंटी
नेपाल से लगे पिथौरागढ़ जिले के उच्च हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने से 77 से अधिक नई झीलें बनने की जानकारी सामने आई है। इनमें मलबा भरा है और भारी वर्षा अथवा किसी भू-गतिविधि की स्थिति में इनके टूटने का खतरा बताया जा रहा है।
कल्पना कीजिए कि इनमें से एक बड़ी झील अचानक टूटती है। पानी तेजी से नीचे आता है। रास्ते में गांव हैं, सड़कें हैं, पुल हैं, खेत हैं, बिजली परियोजनाएं हैं और नदी किनारे बने तमाम निर्माण हैं। चेतावनी के लिए यदि कुछ मिनट ही उपलब्ध हों तो प्रशासन कितने लोगों को सुरक्षित निकाल पाएगा?
यही कारण है कि अर्ली वार्निंग सिस्टम जरूरी है। मगर इससे भी ज्यादा जरूरी है जोखिम वाले क्षेत्रों में नए निर्माण पर कठोर नियंत्रण।
यदि सरकार एक ओर झीलों की निगरानी करे और दूसरी ओर उन्हीं नदी घाटियों में होटल, रिसोर्ट, सड़क, सुरंग और भारी निर्माण की अनुमति देती रहे तो यह नीति अपने भीतर विरोधाभास पैदा करती है।
चिपको की धरती आज सरकार से हिसाब मांग रही है
उत्तराखंड वह धरती है जहां पेड़ों को बचाने के लिए महिलाओं ने अपनी जान की परवाह किए बिना पेड़ों से लिपटकर दुनिया को पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। चिपको आंदोलन केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं है। यह उत्तराखंड की मूल चेतना है।
इस आंदोलन ने दुनिया को बताया कि पहाड़ के लिए जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं हैं। जंगल पानी हैं, मिट्टी हैं, हवा हैं, खेती हैं, पशुधन हैं और पहाड़ की जीवनरेखा हैं।
आज उसी उत्तराखंड में सड़क चौड़ीकरण, सुरंग, परियोजनाओं और अन्य निर्माण के नाम पर जंगलों तथा वृक्षों पर लगातार दबाव बढ़ता गया। ऋषिकेश-देहरादून मार्ग के चौड़ीकरण के दौरान देवदार सहित पेड़ों के कटान को लेकर पर्यावरण प्रेमियों ने आवाज उठाई। पहाड़ों में विभिन्न परियोजनाओं के लिए वृक्षों के कटान को लेकर समय-समय पर सवाल उठे।
प्रश्न यह है कि जिस समाज ने पेड़ों को बचाने के लिए आंदोलन किया, क्या उसकी आवाज विकास की मशीनरी में दबा दी जाएगी?
सुरंगें विकास की पहचान या हिमालय की परीक्षा?
उत्तराखंड में सुरंग आधारित विकास को आधुनिकता और तेज संपर्क के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। सड़क और रेल संपर्क की जरूरत से किसी को इनकार नहीं हो सकता। मगर हिमालय की भूगर्भीय संवेदनशीलता को देखते हुए हर सुरंग, हर सड़क और हर बड़े निर्माण का वैज्ञानिक मूल्यांकन होना चाहिए।
हिमालय दुनिया की युवा पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल है। इसकी चट्टानों की प्रकृति, भूगर्भीय सक्रियता और ढलानों की संवेदनशीलता मैदानी क्षेत्रों से अलग है। ऐसे क्षेत्र में विकास की वही परिभाषा लागू करना जो मैदानों में लागू होती है, खतरनाक साबित हो सकती है।
सुरंगों की खुदाई, पहाड़ों की कटिंग, भारी मशीनरी, मलबे का निस्तारण और जलधाराओं में बदलाव—इन सबका संचयी प्रभाव भी देखा जाना चाहिए।
एक परियोजना का पर्यावरणीय प्रभाव अलग हो सकता है। मगर एक ही घाटी में दर्जनों परियोजनाओं का संयुक्त प्रभाव कई गुना अधिक हो सकता है।
नदी के रास्ते में कंक्रीट खड़ा करके बाढ़ को आमंत्रण
उत्तराखंड में बाढ़ का खतरा केवल ग्लेशियर झीलों से पैदा नहीं होता। नदी किनारे अनियोजित निर्माण भी खतरे को बढ़ाता है।
नदियों का अपना प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र होता है। सदियों से नदियां अपने प्रवाह के साथ भू-भाग बदलती रही हैं। जब मनुष्य नदी के रास्ते में होटल, रिसोर्ट, भवन और अन्य निर्माण खड़े कर देता है तो नदी को अपना रास्ता बदलने पर मजबूर किया जाता है।
प्रो. देवेंद्र परिहार ने गोरी गंगा क्षेत्र में त्वरित बाढ़ प्रभावित 15 गांवों, बेतरतीब सड़क निर्माण और अनियोजित विकास से सक्रिय भूस्खलन वाले 91 से अधिक गांवों तथा बार-बार आपदाओं की चपेट में आने वाले 25 से अधिक गांवों की ओर ध्यान आकर्षित किया है।
ये आंकड़े किसी राजनीतिक दल के आरोप नहीं हैं। ये उस भूगोल की चेतावनी हैं जिसे समझे बिना विकास का खाका तैयार किया जा रहा है।
20 हजार से अधिक मौतों का इतिहास क्या भूल गया उत्तराखंड?
उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के 1600 से 2200 मीटर ऊंचाई वाले क्षेत्रों में वर्षों से बादल फटने, भूस्खलन और बाढ़ जैसी घटनाएं होती रही हैं। रुद्रप्रयाग, मुनस्यारी, कपकोट, नाचनी, मालपा, ऊखीमठ, बदरीनाथ और अलकनंदा घाटी जैसी अनेक घटनाएं इस आपदाग्रस्त भूगोल की गवाही देती हैं।
इन बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में लगभग 20 हजार से अधिक लोगों की जान जाने का उल्लेख सामने आया है।
17 जून 2013 की केदारनाथ त्रासदी उत्तराखंड की सामूहिक स्मृति में आज भी जीवित है। मंदाकिनी, भागीरथी और अलकनंदा के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में आई तबाही ने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की पूरी बहस को झकझोर दिया था।
उस आपदा के बाद भी हमने कितना सीखा?
यही सवाल आज फिर सामने खड़ा है।
प्रो. पीसी तिवारी की चेतावनी को गंभीरता से लेने का समय
कुमाऊं विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष और जलवायु परिवर्तन पर लंबे समय से काम कर रहे प्रो. पीसी तिवारी के अनुसार नेपाल की भोटेकोशी नदी क्षेत्र में पहले भी आपदाएं आई हैं। उनका कहना है कि नेपाल से तापमान बढ़ने की दर पश्चिम हिमालय क्षेत्र में अधिक तीव्र है।
तापमान बढ़ेगा तो उत्तराखंड के ग्लेशियरों पर भी प्रभाव पड़ेगा। बर्फ कम होने के बाद काली चट्टानें अधिक सूर्य ऊष्मा सोखेंगी। इससे बर्फ पिघलने की गति और बढ़ सकती है। हिमस्खलन, झीलों का निर्माण और अतिवृष्टि जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि उत्तराखंड में नदी घाटियों के किनारे आबादी, होटल और रिसोर्ट की संख्या काफी बढ़ चुकी है। यदि नदी अपना बाढ़ क्षेत्र वापस मांगती है तो सबसे पहले यही निर्माण खतरे में आएंगे।
प्रो. तिवारी की यह चेतावनी कि नदी 20 से 100 वर्षों के बीच अपना बाढ़ क्षेत्र वापस ले सकती है, नीति निर्माताओं के लिए गंभीर संदेश है।
क्या केवल धामी सरकार जिम्मेदार है? सवाल भाजपा के लंबे शासन का भी है
उत्तराखंड की वर्तमान पर्यावरणीय स्थिति के लिए केवल एक सरकार को जिम्मेदार ठहराकर बहस खत्म करना आसान रास्ता होगा। मगर पिछले वर्षों में राज्य में सत्ता में रही भाजपा सरकारों की पर्यावरणीय नीतियों का मूल्यांकन होना भी जरूरी है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कार्यकाल में विकास परियोजनाओं की गति तेज हुई है। सड़क, सुरंग, रेल, जलविद्युत, पर्यटन और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर जोर दिया गया। सरकार इन परियोजनाओं को रोजगार और आर्थिक विकास का माध्यम बताती है।
मगर प्रश्न यह है कि विकास की कीमत कौन चुका रहा है?
यदि विकास के नाम पर जंगल घटते हैं, पहाड़ काटे जाते हैं, नदियों के किनारे कंक्रीट बढ़ता है, भूस्खलन वाले क्षेत्रों में निर्माण होता है और स्थानीय लोगों की पर्यावरण संबंधी आपत्तियों को विकास विरोधी मानसिकता कहकर खारिज किया जाता है, तो ऐसी विकास नीति की समीक्षा आवश्यक है।
भाजपा को यह भी बताना होगा कि उत्तराखंड की मूल अवधारणा में जिस विकेंद्रीकृत, प्रकृति-सम्मत और स्थानीय संसाधनों पर आधारित विकास की कल्पना की गई थी, वह कहां है?
बाहरी पूंजी और पहाड़ की जमीन
उत्तराखंड के पर्यावरण संकट का एक दूसरा पहलू भूमि नीति भी है।
पहाड़ के लोग पीढ़ियों से अपनी जमीन, जंगल और जलस्रोतों के साथ जीवन जीते आए हैं। जब बड़े निवेश, पर्यटन परियोजनाओं और बाहरी पूंजी के लिए भूमि उपलब्ध कराई जाती है तो उसका पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव भी देखा जाना चाहिए।
सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितनी जमीन पर परियोजना बनी। सवाल यह भी होना चाहिए कि उस परियोजना से स्थानीय जलस्रोतों पर क्या असर पड़ा? स्थानीय आबादी की आजीविका पर क्या असर पड़ा? यातायात कितना बढ़ा? कचरा कितना बढ़ा? सीवेज का प्रबंधन कैसे होगा? आपदा की स्थिति में निकासी मार्ग क्या होगा?
यदि इन सवालों का जवाब परियोजना स्वीकृति के समय ही अनिवार्य कर दिया जाए तो आने वाली आपदाओं का खतरा काफी कम किया जा सकता है।
पर्यावरण प्रेमी खुद को ठगा हुआ क्यों महसूस कर रहे हैं?
सबसे पीड़ादायक स्थिति यह है कि जो लोग वर्षों से पर्यावरण की चिंता करते रहे, वे आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
उन्होंने जंगल बचाने के लिए आवाज उठाई। नदियों को बचाने के लिए संघर्ष किया। बांधों और परियोजनाओं के प्रभाव पर सवाल उठाए। भूस्खलन और भू-धंसाव की चेतावनी दी। नदी किनारे निर्माण का विरोध किया।
मगर जब उनकी चेतावनियां सही साबित होती हैं तो नीति निर्माता फिर नई समितियां बनाते हैं, नए सर्वेक्षण कराते हैं और नई चेतावनी प्रणालियों की घोषणा करते हैं।
सरकार को यह समझना होगा कि पर्यावरण आंदोलन विकास विरोधी आंदोलन नहीं हैं। ये भविष्य को सुरक्षित रखने के आंदोलन हैं।
अब केवल चेतावनी प्रणाली नहीं, विकास नीति बदलनी होगी
सेंसर लगाइए। सैटेलाइट निगरानी बढ़ाइए। एआई का उपयोग कीजिए। रियल टाइम डेटा जुटाइए। एनडीआरएफ और एसडीआरएफ को आधुनिक बनाइए। यह सब जरूरी है।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने हिमालयी राज्यों में अत्यधिक संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की पहचान की है। लेक-साइफनिंग और नियंत्रित जल निकासी जैसे उपायों पर भी काम किया जा रहा है। आईएसआरओ और केंद्रीय जल आयोग की सैटेलाइट तथा रिमोट सेंसिंग क्षमता उपयोगी है। आपदा प्रतिक्रिया बलों की क्षमता भी बढ़ाई जा रही है।
मगर तकनीक आपदा के कारणों को खत्म नहीं करती।
तकनीक खतरे की सूचना देती है। खतरे को कम करने के लिए नीति बदलनी पड़ती है।
नेपाल और चीन से रियल टाइम डेटा साझा करना जरूरी
हिमालय की आपदा सीमापार होती है। नेपाल और तिब्बत क्षेत्र से आने वाली नदियां भारत के बड़े हिस्से को प्रभावित करती हैं। ऐसे में सीमा पार रियल टाइम हाइड्रोलॉजिकल और मौसम संबंधी डेटा साझा करने की मजबूत व्यवस्था जरूरी है।
यदि किसी ग्लेशियर झील का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है तो उसकी सूचना भारतीय एजेंसियों तक तत्काल पहुंचनी चाहिए। यदि कहीं ग्लेशियर टूटता है तो डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों को मिनटों में चेतावनी मिलनी चाहिए।
इसके लिए भारत, नेपाल और चीन के बीच वैज्ञानिक और आपदा प्रबंधन स्तर पर अधिक मजबूत तंत्र की जरूरत है।
गांवों को चेतावनी से आगे सुरक्षा चाहिए
अर्ली वार्निंग सिस्टम का अंतिम उद्देश्य केवल मोबाइल पर संदेश भेजना नहीं होना चाहिए।
हर संवेदनशील गांव के लिए निकासी मार्ग तय हो। सुरक्षित स्थान चिह्नित हों। सायरन सिस्टम हो। स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण दिया जाए। आपदा मित्रों की संख्या बढ़ाई जाए। स्कूलों, पंचायतों और स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से नियमित मॉक ड्रिल हो।
क्योंकि आपदा आने पर सबसे पहले सरकारी मशीनरी नहीं, स्थानीय समुदाय ही प्रतिक्रिया देता है।
उत्तराखंड को ‘स्विट्जरलैंड’ बनाने का सपना या अपनी पहचान बचाने की जिम्मेदारी?
उत्तराखंड को स्विट्जरलैंड बनाने के नारों ने वर्षों से राजनीति में जगह बनाई है। मगर सवाल यह है कि उत्तराखंड को किसका स्विट्जरलैंड बनाना है?
ऐसा उत्तराखंड जहां पहाड़ काटकर सड़कें बनें? जहां नदी किनारे होटल खड़े हों? जहां जंगलों की कीमत केवल राजस्व के आंकड़ों से तय हो? जहां स्थानीय लोगों को अपने ही पर्यावरण की रक्षा के लिए संघर्ष करना पड़े?
या ऐसा उत्तराखंड जहां पहाड़ जिंदा रहें, नदियां स्वतंत्र बहें, जंगल सुरक्षित रहें, गांव आबाद रहें और पर्यटन प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़े?
उत्तराखंड की मूल अवधारणा दूसरा रास्ता मांगती है।
सरकार को अब हिमालय से संवाद करना होगा
आज हिमालय चेतावनी दे रहा है।
ग्लेशियर घट रहे हैं। 77 से अधिक नई झीलें खतरे की घंटी बजा रही हैं। गोरी गंगा बेसिन में बर्फ का क्षेत्र 1990 के 30.9 प्रतिशत से घटकर 2022 में 10.99 प्रतिशत रह गया। 13 ग्लेशियर झीलें संवेदनशील चिन्हित हैं। 91 से अधिक गांव सक्रिय भूस्खलन के खतरे में बताए गए हैं। 15 गांव त्वरित बाढ़ की चपेट में हैं और 25 से अधिक गांव बार-बार आपदा के कारण जोखिमग्रस्त हैं।
इन आंकड़ों को फाइलों में बंद करने का समय समाप्त हो चुका है।
अब सरकार को यह तय करना होगा कि विकास परियोजना पहले बनेगी या उसका पर्यावरणीय औचित्य पहले साबित होगा।
नदी के बाढ़ क्षेत्र का वैज्ञानिक सीमांकन पहले होगा या वहां भवन पहले खड़े होंगे।
सड़क निर्माण से पहले पहाड़ की वहन क्षमता का अध्ययन होगा या कटिंग पहले शुरू होगी।
सुरंग से पहले भूगर्भीय अध्ययन होगा या परियोजना की समयसीमा पहले तय होगी।
जंगल की कीमत समझी जाएगी या उसकी कीमत केवल राजस्व से तय होगी।
भाजपा सरकार से पांच सीधे सवाल
उत्तराखंड की जनता सरकार से पांच सवाल पूछने का अधिकार रखती है—
पहला, जब 13 ग्लेशियर झीलें संवेदनशील हैं और 77 से अधिक नई झीलें बनने की जानकारी सामने आ रही है तो इनके डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों में निर्माण की नीति क्या है?
दूसरा, जब गोरी गंगा क्षेत्र में तीन दशकों में बर्फ का क्षेत्र लगभग 20 प्रतिशत घट गया तो जलवायु परिवर्तन के अनुरूप विकास नीति में क्या मूलभूत बदलाव किया गया?
तीसरा, जब 91 से अधिक गांव सक्रिय भूस्खलन के खतरे में बताए गए हैं तो सड़क और अन्य निर्माण परियोजनाओं के लिए जोखिम मानचित्रों को कितना महत्व दिया जा रहा है?
चौथा, नदी किनारे होटल, रिसोर्ट और अन्य निर्माणों के लिए बाढ़ क्षेत्र की वैज्ञानिक सीमा का कितना पालन हो रहा है?
पांचवां, पर्यावरणीय आपत्तियां उठाने वाले स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों को विकास विरोधी मानने के बजाय नीति निर्माण में भागीदारी कब दी जाएगी?
हिमालय का फैसला अंतिम होता है
राजनीतिक सरकारें पांच वर्ष के लिए आती हैं। परियोजनाओं की समयसीमा कुछ वर्षों की होती है। मगर हिमालय हजारों-लाखों वर्षों से यहां खड़ा है।
सरकारें बदलेंगी। मुख्यमंत्री बदलेंगे। राजनीतिक दल बदलेंगे। मगर यदि हिमालय कमजोर हुआ तो उसकी कीमत आने वाली पीढ़ियां चुकाएंगी।
इसलिए आज आवश्यकता केवल ग्लेशियर झीलों की निगरानी की नहीं है। आवश्यकता विकास की पूरी अवधारणा की समीक्षा की है।
उत्तराखंड को कंक्रीट का जंगल बनाकर सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। पहाड़ की सुरक्षा जंगल, जलस्रोत, नदी, मिट्टी और स्थानीय समुदाय की सुरक्षा से जुड़ी है।
चिपको आंदोलन की धरती से निकली आवाज को सुनना होगा। उन पर्यावरण प्रेमियों की बात सुननी होगी जो वर्षों से चेतावनी देते रहे हैं। गांवों की पारंपरिक समझ को वैज्ञानिक अध्ययन के साथ जोड़ना होगा। विशेषज्ञों की रिपोर्टों को सरकारी फाइलों से बाहर निकालकर नीति का आधार बनाना होगा।
आज नेपाल की बाढ़ ने चेताया है। कल उत्तराखंड की कोई ग्लेशियर झील चेतावनी देने का अवसर भी दे सकती है और सीधे विनाश का दृश्य भी दिखा सकती है।
अब फैसला सरकार को करना है—उत्तराखंड को केवल परियोजनाओं का प्रदेश बनाना है या हिमालय की आत्मा को बचाकर विकास का ऐसा मॉडल तैयार करना है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित हो।
उत्तराखंड के पहाड़ आज सवाल पूछ रहे हैं।
कितना और काटोगे?
कितना और कंक्रीट बिछाओगे?
कितने और जंगल खोओगे?
कितनी और चेतावनियों के बाद जागोगे?
हिमालय की सहनशक्ति को विकास की असीमित प्रयोगशाला समझने की भूल अब भारी पड़ सकती है।
उत्तराखंड बारूद के ढेर पर बैठा है—और इस बार बारूद प्राकृतिक आपदा से कम, हमारी विकास संबंधी गलत प्राथमिकताओं से अधिक तैयार हो रहा है।
अब सरकार को चेतावनी सुननी होगी।
क्योंकि हिमालय की अदालत में अगली तारीख शायद इतनी दूर न हो।


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