उत्तराखंड रुद्रपुर,देहरादून/नैनीताल, 23 अगस्त 2026:
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के महानायक और प्रखर जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ की 16वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आज समूचे राज्य में विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक संगठनों द्वारा उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक के सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों और शहरों में स्मृति सभाओं व संगोष्ठियों का आयोजन कर उनके जन-सरोकारों से जुड़े क्रांतिकारी विचारों को याद किया गया।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
गिर्दा की पुण्यतिथि पर आयोजित मुख्य कार्यक्रम में वक्ताओं ने उत्तराखंड के जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए किए गए उनके ऐतिहासिक संघर्षों पर प्रकाश डाला। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि गिर्दा केवल एक कवि नहीं थे, बल्कि वे समाज की हर उस आवाज के संवाहक थे जो हक और न्याय के लिए उठती थी।
डफली की थाप और ग्रामीण आंदोलनों की गूंज:
आंदोलनकारियों ने स्मरण किया कि किस प्रकार गिर्दा अपने कंधे पर डफली टांगकर उत्तराखंड के दुर्गम गांवों का दौरा करते थे। उन्होंने ‘चिपको आंदोलन’ और ‘नशा नहीं रोजगार दो’ जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक अभियानों में महिलाओं और युवाओं को एकजुट करने में अद्वितीय भूमिका निभाई।
राज्य आंदोलन का अनौपचारिक राष्ट्रगीत:
पुण्यतिथि कार्यक्रमों के दौरान गिर्दा के अमर गीतों का गान किया गया। उनका रचित प्रसिद्ध गीत “उत्तराखंड मेरी मातृभूमि, मातृभूमि, पितृभूमि, ओ मेरी ओ प्यारी भूमि…” आज भी हर उत्तराखंडी के भीतर राज्य के प्रति प्रेम और संघर्ष की भावना को जाग्रत करता है। राज्य गठन आंदोलन के दौरान उनके नारे “आज हिमालय जागेगा, क्रूर कसाई भागेगा” ने जन-मानस में अभूतपूर्व जोश भरा था।
22 अगस्त 2010 को भले ही गिर्दा भौतिक रूप से इस दुनिया से विदा हो गए थे, लेकिन उनके विचार, कविताएं और जनगीत आज भी राज्य के हर हक-हकूक की लड़ाई में मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहे हैं। सभा के अंत में दो मिनट का मौन रखकर महान विभूति को नमन किया गया।
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