उत्तराखंड की जमीन, पराए हाथों में आवास? प्रधानमंत्री आवास योजना के आवंटन पर उठते गंभीर सवाल

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देहरादून में प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) की समीक्षा बैठक के दौरान राज्य सरकार ने 30 सितंबर 2026 तक सभी लंबित आवासीय परियोजनाओं को पूरा करने के निर्देश दिए। सचिव आवास डॉ. आर. राजेश कुमार ने गुणवत्ता, पारदर्शिता और नियमित मॉनिटरिंग पर विशेष जोर दिया। सरकार का यह प्रयास सराहनीय है, परंतु इससे भी बड़ा प्रश्न आवासों के आवंटन को लेकर उठ रहा है।
यदि उत्तराखंड के मूल निवासी वर्षों से अपने घर के इंतजार में हैं और दूसरी ओर बाहरी राज्यों से जुड़े लोगों को कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर प्रधानमंत्री आवास का लाभ मिल रहा है, तो यह केवल एक प्रशासनिक चूक का विषय भर नहीं, बल्कि उत्तराखंड राज्य निर्माण की मूल भावना से जुड़ा गंभीर मामला है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


उत्तराखंड राज्य आंदोलन का उद्देश्य स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा करना था। रोजगार, संसाधन और सरकारी योजनाओं का पहला लाभ राज्य के मूल निवासियों तक पहुंचे, यही जनभावना रही है। ऐसे में यदि प्रधानमंत्री आवास योजना के आवंटन पर सवाल उठ रहे हैं, तो सरकार और प्रशासन दोनों को इसका स्पष्ट उत्तर देना चाहिए।
रुद्रपुर सहित कई क्षेत्रों से समय-समय पर शिकायतें सामने आती रही हैं कि वास्तविक पात्र परिवार आज भी प्रतीक्षा कर रहे हैं, जबकि दूसरे राज्यों से जुड़े लोगों को आवास आवंटित होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
सरकार निर्माण कार्य की समयसीमा तय कर रही है, मॉनिटरिंग की व्यवस्था बना रही है और गुणवत्ता सुनिश्चित करने की बात कर रही है। साथ ही यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि हर आवास उसी पात्र परिवार तक पहुंचे जिसके लिए योजना बनाई गई है। केवल भवन तैयार हो जाना योजना की सफलता का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
सबसे बड़ा सवाल लाभार्थियों के चयन की प्रक्रिया पर है। दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर हुआ? निवास प्रमाण, आय प्रमाण और पात्रता की जांच कितनी पारदर्शी रही? यदि जांच पूरी तरह सही थी, तो विवाद सामने क्यों आए? यदि कहीं चूक हुई, तो उसके लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए।
उत्तराखंड का गरीब परिवार वर्षों तक किराये के मकान में जीवन बिताए और कथित रूप से अपात्र लोग सरकारी आवास का लाभ प्राप्त कर लें, ऐसी स्थिति जनभावनाओं को आहत करती है। इससे सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगता है।
जहां-जहां फर्जी दस्तावेजों के आधार पर आवंटन होने की शिकायतें हैं, वहां प्रत्येक मामले की दोबारा जांच होनी चाहिए। अपात्र लाभार्थियों के आवंटन निरस्त किए जाएं और वास्तविक पात्र परिवारों को उनका अधिकार मिले। दोषी अधिकारियों और संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई भी आवश्यक है।
सरकार का उद्देश्य केवल आवास निर्माण तक सीमित न रहे। योजना का वास्तविक लक्ष्य पात्र गरीब परिवारों को सुरक्षित और सम्मानजनक घर उपलब्ध कराना है। यह लक्ष्य तभी पूरा होगा जब चयन प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष होगी।
उत्तराखंड के लोगों की अपेक्षा केवल इतनी है कि राज्य की योजनाओं का लाभ सबसे पहले उत्तराखंड के पात्र नागरिकों तक पहुंचे। यदि प्रधानमंत्री आवास योजना में किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार, फर्जीवाड़ा या पक्षपात हुआ है, तो उस पर तत्काल कार्रवाई समय की मांग है।
राज्य सरकार को प्रत्येक प्रधानमंत्री आवास परियोजना का सामाजिक और प्रशासनिक ऑडिट कराना चाहिए। लाभार्थियों की सूची सार्वजनिक की जाए, शिकायतों की स्वतंत्र जांच कराई जाए और प्रत्येक पात्र परिवार के अधिकार की रक्षा सुनिश्चित की जाए। यही उत्तराखंड राज्य आंदोलन की भावना का सम्मान होगा और यही सुशासन की वास्तविक पहचान भी।


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