राज्य आंदोलनकारियों की मांगों पर अब होगा ठोस फैसला? सम्मान परिषद ने सरकार पर लगाया अनदेखी का आरोप मुख्यमंत्री धामी से मिले हुकम सिंह कुंवर, सौंपा मांगपत्र;

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मुख्यमंत्री धामी से मिले हुकम सिंह कुंवर, सौंपा मांगपत्र; बोले—राज्य बनाने वालों को अपने अधिकारों के लिए बार-बार सरकार का दरवाजा खटखटाना दुर्भाग्यपूर्ण
10% क्षैतिज आरक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन, छूटे आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण, आश्रित प्रमाण पत्र, सम्मानजनक पेंशन, परिवहन और सरकारी विश्राम गृहों में सुविधा सहित कई मांगें उठाईं
देहरादून। उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए सड़कों पर संघर्ष करने, जेल जाने, पुलिस उत्पीड़न सहने और अपना सर्वस्व समर्पित करने वाले राज्य आंदोलनकारियों की लंबित मांगों को लेकर राज्य निर्माण आंदोलनकारी सम्मान परिषद ने एक बार फिर प्रदेश सरकार के समक्ष आवाज बुलंद की है। परिषद ने आरोप लगाया कि राज्य गठन के ढाई दशक से अधिक समय बाद भी आंदोलनकारियों को अपने अधिकारों और सम्मान से जुड़ी मांगों के समाधान के लिए बार-बार शासन के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
राज्य निर्माण आंदोलनकारी सम्मान परिषद के अध्यक्ष हुकम सिंह कुंवर ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मुलाकात कर राज्य आंदोलनकारियों की विभिन्न लंबित मांगों के संबंध में विस्तृत ज्ञापन सौंपा। इस दौरान राज्य आंदोलनकारी एवं दर्जा राज्यमंत्री मोहन पाठक भी मौजूद रहे।
हुकम सिंह कुंवर ने मुख्यमंत्री के समक्ष कहा कि उत्तराखंड राज्य हजारों आंदोलनकारियों के त्याग, संघर्ष और शहीदों के बलिदान से अस्तित्व में आया। इसलिए राज्य आंदोलनकारियों के सम्मान, सामाजिक सुरक्षा और उनके परिवारों के भविष्य से जुड़े विषयों का समाधान सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रतिनिधिमंडल से वार्ता करते हुए कहा कि राज्य आंदोलनकारियों का सम्मान करना सरकार का नैतिक कर्तव्य है और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए सरकार गंभीरता से कार्य करेगी।
10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण को पूरी तरह धरातल पर उतारने की मांग
सम्मान परिषद ने सरकारी सेवाओं में राज्य आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों के लिए 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन का मुद्दा प्रमुखता से उठाया।
परिषद का कहना है कि आरक्षण से संबंधित कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया आगे बढ़ने के बावजूद कई स्तरों पर व्यावहारिक कठिनाइयां बनी हुई हैं। पात्र आश्रितों को समय पर प्रमाण पत्र उपलब्ध कराने से लेकर नियुक्ति प्रक्रिया तक स्पष्ट और एकरूप व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
हुकम सिंह कुंवर ने कहा कि 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण आंदोलनकारियों के परिवारों के भविष्य से जुड़ा विषय है। सरकार को सभी तकनीकी और प्रशासनिक बाधाओं का समाधान करते हुए पात्र युवाओं को इसका वास्तविक लाभ दिलाना चाहिए।
छूटे वास्तविक आंदोलनकारियों का हो चिन्हीकरण
परिषद ने राज्य आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण की लंबित प्रक्रिया को भी गंभीर विषय बताया। परिषद के अनुसार राज्य आंदोलन के दौरान सक्रिय भूमिका निभाने वाले अनेक वास्तविक आंदोलनकारी विभिन्न कारणों से सरकारी अभिलेखों में चिन्हित होने से वंचित रह गए।
मांग की गई कि पुराने अभिलेखों, आंदोलन से संबंधित दस्तावेजों, समाचार पत्रों की रिपोर्ट, जेल रिकॉर्ड, पुलिस रिकॉर्ड तथा अन्य प्रमाणों के आधार पर पात्र आंदोलनकारियों के मामलों का निष्पक्ष परीक्षण किया जाए। जिला स्तर पर लंबित प्रकरणों के निस्तारण के लिए स्पष्ट समयसीमा निर्धारित की जाए।
सरकारी नौकरी कर रहे आंदोलनकारियों के आश्रितों को भी मिले प्रमाण पत्र
प्रतिनिधिमंडल ने सरकारी सेवा में कार्यरत राज्य आंदोलनकारियों के आश्रितों को प्रमाण पत्र जारी करने से जुड़ी समस्याओं को भी मुख्यमंत्री के सामने रखा।
राज्य आंदोलनकारियों की सम्मान पेंशन को भी परिषद ने प्रमुख मुद्दा बनाया है। परिषद का कहना है कि अधिकांश आंदोलनकारी अब उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुके हैं जहां स्वास्थ्य संबंधी खर्च और दैनिक आवश्यकताएं लगातार बढ़ रही हैं।
आंदोलनकारी संगठनों के स्तर से लंबे समय से सम्मान पेंशन को कम से कम 15 हजार रुपये प्रतिमाह तक किए जाने की मांग उठती रही है। परिषद का कहना है कि सरकार को इस विषय पर संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाते हुए पेंशन की राशि को वर्तमान महंगाई और बुजुर्ग आंदोलनकारियों की जरूरतों के अनुरूप तय करना चाहिए।
PWD, सिंचाई, मंडी और अन्य सरकारी विश्राम गृहों में मिले रियायती सुविधा
सम्मान परिषद ने राज्य आंदोलनकारियों के लिए सरकारी गेस्ट हाउस एवं विश्राम गृहों में रियायती दर पर ठहरने की व्यापक व्यवस्था की मांग भी उठाई।
परिषद चाहती है कि राज्य संपत्ति विभाग के साथ लोक निर्माण विभाग, सिंचाई विभाग, मंडी परिषद/समितियों तथा अन्य सरकारी विभागों के विश्राम गृहों में भी राज्य आंदोलनकारियों के लिए एक समान व्यवस्था लागू हो।
आंदोलनकारी लंबे समय से मांग करते रहे हैं कि उन्हें सरकारी विश्राम गृहों में करीब 300 रुपये की नाममात्र दर पर कमरा उपलब्ध कराया जाए। इससे उपचार, सरकारी कार्य अथवा आंदोलनकारी संगठनों की बैठकों के लिए देहरादून सहित अन्य शहरों में आने वाले बुजुर्ग आंदोलनकारियों को बड़ी राहत मिलेगी।
परिवहन सुविधा का दायरा बढ़ाने की मांग
परिषद ने राज्य आंदोलनकारियों और पात्र आश्रितों के लिए परिवहन सुविधाओं को अधिक प्रभावी और व्यापक बनाने का मुद्दा भी उठाया। आंदोलनकारियों का कहना है कि राज्य के पर्वतीय और दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले वरिष्ठ आंदोलनकारियों को देहरादून, हल्द्वानी तथा अन्य शहरों तक आने-जाने में आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
सरकार से मांग की गई कि परिवहन निगम की बसों में मिलने वाली सुविधाओं को सरल बनाया जाए तथा आंदोलनकारी परिचय पत्र के आधार पर एयर कंडीशन बसों में भी दो लोगों का सम्मानजनक यात्रा सुविधा सुनिश्चित की जाए।
आंदोलनकारी की मृत्यु के बाद परिवार की सामाजिक सुरक्षा पर बने स्पष्ट नीति
परिषद ने आंदोलनकारी की मृत्यु के बाद उसके परिवार की सामाजिक सुरक्षा के लिए भी स्पष्ट नीति बनाने की मांग रखी। आंदोलनकारी संगठनों की मांग है कि पात्र पति-पत्नी अथवा आश्रितों को सम्मान पेंशन, चिकित्सा तथा अन्य सुविधाओं के संबंध में एक पारदर्शी और सरल व्यवस्था दी जाए।
परिषद का कहना है कि आंदोलनकारी का सम्मान उसके जीवनकाल तक सीमित रखने के स्थान पर उसके परिवार के योगदान और त्याग का भी सम्मान होना चाहिए।
शहीद स्मारकों और आंदोलन की विरासत का हो संरक्षण
उत्तराखंड आंदोलन से जुड़े शहीद स्मारकों के संरक्षण का विषय भी आंदोलनकारियों की भावनाओं से जुड़ा है। देहरादून कचहरी स्थित शहीद स्मारक सहित प्रदेश के विभिन्न आंदोलनकारी स्थलों को राज्य की ऐतिहासिक विरासत के रूप में संरक्षित और विकसित करने की मांग लंबे समय से उठती रही है।
परिषद का कहना है कि ये स्मारक केवल पत्थर और भवन नहीं, उत्तराखंड राज्य निर्माण के संघर्ष, शहादत और जनभावनाओं के जीवंत प्रतीक हैं। नई पीढ़ी को राज्य आंदोलन के इतिहास से जोड़ने के लिए इन स्थलों पर आंदोलन के दस्तावेज, शहीदों का परिचय और संघर्ष की घटनाओं को प्रदर्शित करने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए।
“राज्य बनाने वालों की उपेक्षा स्वीकार्य नहीं”—हुकम सिंह कुंवर
हुकम सिंह कुंवर ने कहा कि आंदोलनकारियों ने व्यक्तिगत लाभ के लिए संघर्ष नहीं किया था। उनका सपना ऐसा उत्तराखंड बनाने का था जहां जल, जंगल, जमीन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन, मूल निवास और स्थानीय युवाओं के अधिकारों को प्राथमिकता मिले।
उन्होंने कहा कि राज्य निर्माण के लिए युवाओं, महिलाओं, कर्मचारियों, पूर्व सैनिकों, छात्रों और आम नागरिकों ने ऐतिहासिक संघर्ष किया। अनेक लोगों ने जेल यात्राएं कीं, पुलिस की लाठियां खाईं और कई आंदोलनकारियों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। ऐसे में आंदोलनकारियों की जायज मांगों को वर्षों तक फाइलों में लंबित रखना राज्य निर्माण की भावना के अनुरूप आचरण नहीं माना जा सकता।
मूल निवास, भू-कानून और पलायन पर भी आंदोलनकारियों की नजर
राज्य आंदोलनकारी समुदाय के बीच मूल निवास, सशक्त भू-कानून, स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता, पहाड़ से पलायन रोकने और राज्य की सांस्कृतिक पहचान बचाने जैसे विषय भी लगातार चर्चा के केंद्र में रहे हैं।
आंदोलनकारियों का मानना है कि उत्तराखंड का निर्माण केवल प्रशासनिक सीमाओं में बदलाव के लिए नहीं हुआ था। राज्य की स्थापना के पीछे पर्वतीय क्षेत्रों के संतुलित विकास, प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समाज के अधिकार तथा भावी पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की व्यापक अवधारणा थी।
मुख्यमंत्री से शीघ्र निर्णय की उम्मीद
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से हुई मुलाकात के बाद परिषद ने उम्मीद जताई है कि सरकार आंदोलनकारियों की मांगों पर विभागवार समीक्षा कर जल्द ठोस निर्णय लेगी।
हुकम सिंह कुंवर ने कहा कि मुख्यमंत्री ने आंदोलनकारियों के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए समस्याओं के समाधान का भरोसा दिया है। अब आंदोलनकारी समाज की नजर इस बात पर रहेगी कि यह भरोसा शासनादेश और धरातलीय कार्रवाई में कितनी शीघ्रता से परिवर्तित होता है।
सम्मान परिषद ने स्पष्ट किया कि चिन्हीकरण, 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का प्रभावी क्रियान्वयन, आश्रित प्रमाण पत्र, सम्मान पेंशन में वृद्धि, परिवहन सुविधा, चिकित्सा सुरक्षा, सरकारी विश्राम गृहों में रियायत तथा शहीद स्मारकों का संरक्षण आंदोलनकारियों के सम्मान से जुड़े मूल विषय हैं।
उत्तराखंड के रजत जयंती काल में राज्य निर्माण आंदोलनकारियों की अपेक्षा है कि जिस प्रदेश को बनाने के लिए उन्होंने अपना यौवन और जीवन संघर्ष में लगाया, उसी प्रदेश में उन्हें अपने अधिकारों के लिए बार-बार आवाज उठाने की स्थिति से मुक्ति मिले। सरकार यदि इन मांगों पर समयबद्ध फैसला करती है तो इसे राज्य निर्माण के शहीदों और आंदोलनकारियों के प्रति वास्तविक सम्मान के रूप में देखा जाएगा।


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