पहाड़ में पहले नदियां डुबोकर बिजली बनाई, अब बाहर से कोयला मंगाकर धुआं खरीदेंगे! और MBBS में 234 अंक का कमाल—फर्जी प्रमाणपत्रों ने खोल दी व्यवस्था की पोलउत्तराखंड में विकास का नया मॉडल? एक तरफ मेडिकल सीट का खेल, दूसरी तरफ कोयले की कालिख

Spread the love

उत्तराखंड रुद्रपुर। उत्तराखंड में इन दिनों दो अलग-अलग मामले व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। एक तरफ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे से MBBS दाखिले में कथित फर्जी प्रमाणपत्रों का मामला सामने आया है, जिसमें चार छात्राओं के दाखिले निरस्त किए जा चुके हैं और पांच लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ है। दूसरी तरफ राज्य की बढ़ती बिजली जरूरत के नाम पर 1320 मेगावाट कोयला आधारित बिजली दीर्घकालिक आधार पर खरीदने की तैयारी है।
कटाक्ष यही है कि पहाड़ ने अपनी नदियां बांधों के नाम पर डुबो दीं, जंगलों और पर्यावरण पर विकास की कीमत चुकाई, और अब ऊर्जा सुरक्षा के नाम पर बाहर से कोयले की बिजली लेने की तैयारी है। सवाल यह नहीं कि बिजली की जरूरत क्यों है, सवाल यह है कि उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक संपदा का इस्तेमाल करने के बावजूद ऊर्जा व्यवस्था के ऐसे मोड़ पर क्यों पहुंचा जहां कोयले पर निर्भरता बढ़ाने की जरूरत पड़ रही है?
234 अंक और MBBS सीट ने उठाए सवाल
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे में MBBS दाखिले के मामले की जांच में सामने आया कि NEET-UG में 234 अंक पाने वाली स्वाति को श्रीनगर मेडिकल कॉलेज की सीट मिली थी। अन्य अभ्यर्थियों को भी इसी कोटे में मेडिकल कॉलेज आवंटित हुए थे। जांच के दौरान प्रमाणपत्र संदिग्ध पाए गए और संबंधित दाखिले निरस्त कर दिए गए।
देहरादून जिलाधिकारी की ओर से गठित जांच में दस्तावेजों और दिए गए पतों के सत्यापन को लेकर सवाल सामने आए। पुलिस अब आवेदन प्रक्रिया, आधार कार्ड, फोटो, मोबाइल नंबर और अन्य डिजिटल रिकॉर्ड की जांच कर रही है। मामले में चार छात्राओं समेत पांच लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।
यह मामला सिर्फ चार मेडिकल सीटों तक सीमित नहीं रह जाता। असली सवाल यह है कि यदि प्रमाणपत्र जारी करने और सत्यापन की प्रक्रिया में कहीं चूक हुई, तो जिम्मेदारी केवल लाभ लेने वालों की होगी या उस पूरी व्यवस्था की भी जांच होगी जिसने प्रमाणपत्र को वैध मानकर मेडिकल सीट तक पहुंचा दिया?
अब बिजली की कहानी—नदियां अपनी, कोयला बाहर का
इसी उत्तराखंड में ऊर्जा की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड ने 1320 मेगावाट RTC कोयला आधारित बिजली दीर्घकालिक आधार पर खरीदने के लिए नियामक मंजूरी की प्रक्रिया शुरू की है। UERC के रिकॉर्ड में 1320 मेगावाट कोयला आधारित बिजली खरीद से संबंधित आवेदन दर्ज है।
UERC के समक्ष रखे गए दस्तावेजों में बताया गया कि केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की Resource Adequacy Study में वर्ष 2031-32 तक उत्तराखंड के ऊर्जा मिश्रण में अतिरिक्त 1181 मेगावाट थर्मल क्षमता की जरूरत बताई गई थी। प्रस्तावित स्थानीय परियोजना समय पर उपलब्ध न हो पाने के बाद 1320 मेगावाट कोयला आधारित बिजली की खरीद का रास्ता अपनाया गया।
यानी पहाड़ की नदियों पर बांध बनाकर बिजली पैदा की, पहाड़ों की घाटियों को जलाशयों में बदला और अब बिजली की बढ़ती जरूरत पूरी करने के लिए कोयले पर भी निर्भरता बढ़ाने की तैयारी है।
पर्यावरण के सवाल का जवाब कौन देगा?
उत्तराखंड की पहचान हिमालय, जंगल, नदियों और जलविद्युत से है। ऐसे में कोयला आधारित बिजली खरीद का निर्णय केवल बिजली की उपलब्धता का विषय नहीं है। इसके साथ कार्बन उत्सर्जन, कोयले की आपूर्ति, परिवहन, दीर्घकालिक लागत और पर्यावरणीय प्रभाव जैसे सवाल भी जुड़े हैं।
सरकार और ऊर्जा विभाग का पक्ष है कि बढ़ती मांग और विश्वसनीय बिजली आपूर्ति के लिए अतिरिक्त बेस-लोड बिजली की आवश्यकता है। दूसरी ओर, इस फैसले को लेकर राजनीतिक विरोध और पर्यावरण संबंधी सवाल भी उठ रहे हैं।
दो मामले, एक बड़ा सवाल—व्यवस्था किस दिशा में जा रही है?
एक मामले में कागज पर बने कथित रिश्ते और प्रमाणपत्र मेडिकल सीट तक पहुंच गए, दूसरे में ऊर्जा संकट के समाधान के लिए कागज पर बनी दीर्घकालिक योजना कोयले की बिजली उत्तराखंड तक लाने जा रही है।
पहले पहाड़ की नदियों को बांधों में कैद किया गया, अब कोयले की बिजली का रास्ता खुल रहा है। ऐसे में उत्तराखंड के सामने सवाल सिर्फ विकास का नहीं बल्कि विकास की दिशा, पारदर्शिता और पर्यावरणीय कीमत का भी है।
व्यंग्य यही है—
मेडिकल कॉलेज में सीट के लिए प्रमाणपत्र की जरूरत है और बिजली के लिए कोयले की। लेकिन पहाड़ के जंगल, नदियां और हवा आखिर किस खाते में दर्ज होंगे?
अब निगाहें दो जांचों पर हैं—एक फर्जी प्रमाणपत्रों के नेटवर्क की और दूसरी 1320 मेगावाट बिजली खरीद की प्रक्रिया की। दोनों मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही ही तय करेगी कि व्यवस्था में गलती हुई है या व्यवस्था का इस्तेमाल किया गया।


Spread the love