देघाट/पाली पछाऊ। उत्तराखंड के इतिहास में कत्युरी राजवंश का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस राजवंश की उत्पत्ति, राजधानी, शासन क्षेत्र और अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं से इसके संबंध को लेकर इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और लोक परंपराओं में अलग-अलग मत मिलते हैं। शिलालेखों, ताम्रपत्रों, पुरातात्विक अवशेषों, स्थानीय जागरों और ऐतिहासिक ग्रंथों में बिखरे उल्लेखों को जोड़ने पर कुमाऊं और गढ़वाल के प्राचीन राजनीतिक इतिहास की एक लंबी और जटिल तस्वीर सामने आती है।
एक मान्यता के अनुसार अयोध्या के महान नरेश सुमित्र के पुत्र शालीवाहन देव लगभग 2300 से 2500 वर्ष पूर्व उत्तर कौशल के केदारखंड क्षेत्र में आए। माना जाता है कि अयोध्या में राजनीतिक परिवर्तन के बाद शालीवाहन देव अपने लोगों के साथ हिमालय की ओर आए और जोशीमठ को अपना प्रमुख केंद्र बनाया। हालांकि इस काल के संबंध में प्रत्यक्ष समकालीन लिखित प्रमाण सीमित हैं, इसलिए इतिहासकार इस परंपरा को प्रमाणित इतिहास और लोकस्मृति के बीच रखकर देखते हैं।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
जोशीमठ को राजधानी बनाने की परंपरा
स्थानीय इतिहास परंपराओं में कहा जाता है कि शालीवाहन देव ने जोशीमठ को राजधानी बनाकर आसपास के क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाया। प्रश्न यह भी उठता है कि यदि उनका राज्य व्यापक था तो इतनी ऊंचाई वाले क्षेत्र में राजधानी क्यों बनाई गई? कुछ इतिहास संबंधी मतों में इसे स्थायी राजधानी के बजाय ग्रीष्मकालीन अथवा पर्वतीय प्रशासनिक केंद्र के रूप में देखने की संभावना व्यक्त की जाती है।
शालीवाहन देव के वंशजों को आगे चलकर पाल, रजवार, मनराल और जसपुर के रजवार जैसे विभिन्न स्थानीय नामों से जोड़ने वाली परंपराएं भी मिलती हैं। हालांकि इन वंशावलियों की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए अलग-अलग स्रोतों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
खस समाज और प्राचीन उत्तराखंड
कुमाऊं के प्राचीन इतिहास में खस समाज का उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इतिहासकारों के बीच खसों की उत्पत्ति और उत्तराखंड में उनके आगमन के समय को लेकर विभिन्न मत हैं। डॉ. लक्ष्मी दत्त जोशी ने खस समुदाय को आर्य परंपरा से जोड़ने वाला मत प्रस्तुत किया था। दूसरी ओर, स्थानीय इतिहास परंपराओं में यह भी कहा जाता है कि खस लोग उत्तराखंड के अत्यंत प्राचीन निवासी थे और बाद में विभिन्न राजवंशों ने इनके क्षेत्रों पर अपना राजनीतिक प्रभाव स्थापित किया।
कुमाऊं में शिल्पकार और अन्य स्थानीय समुदायों की प्राचीन उपस्थिति के भी अनेक लोक और ऐतिहासिक उल्लेख मिलते हैं। एटकिंसन सहित विभिन्न लेखकों ने हिमालयी समाज की जातीय-सामाजिक संरचना पर चर्चा की है। इसलिए कुमाऊं के इतिहास को केवल राजवंशों का इतिहास मानना अधूरा होगा। इसके पीछे स्थानीय समुदायों, ग्राम व्यवस्थाओं और छोटे-छोटे क्षेत्रीय सत्ता केंद्रों की भी बड़ी भूमिका रही।
बसंत देव से कार्तिकेयपुर राजवंश की ओर
कत्युरी इतिहास में बसंत देव, जिन्हें कुछ परंपराओं में वासुदेव भी कहा गया है, का विशेष महत्व है। लगभग सातवीं शताब्दी के आसपास बसंत देव द्वारा स्वतंत्र सत्ता स्थापित किए जाने की परंपरा मिलती है। उनके नाम से जुड़े अभिलेख कत्युरी इतिहास की चर्चा में महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
बसंत देव से पहले इस क्षेत्र के शासकों के कन्नौज की सत्ता से संबंध होने की बात कही जाती है। स्थानीय ऐतिहासिक परंपराओं में यशोवर्मन और हर्षवर्मन जैसे कन्नौज के शासकों का उल्लेख मिलता है। इसके बाद हिमालयी शासकों द्वारा स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता कायम किए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई।
यही वह दौर माना जाता है जब कार्तिकेयपुर राजवंश का प्रभाव बढ़ा। बाद के काल में यही परंपरा कत्युरी या कत्यूर राजवंश के नाम से प्रसिद्ध हुई।
बसंत देव के प्रतापी पुत्र कनक देव के संबंध में भी ऐसी परंपरा मिलती है कि उनका निधन काबुल क्षेत्र में हुआ। हालांकि इस दावे को लेकर भी इतिहास के अलग-अलग स्रोतों की तुलना आवश्यक है।
कत्युरी सत्ता का विस्तार
कत्युरी राजवंश के उत्कर्ष काल को उत्तराखंड के इतिहास का महत्वपूर्ण राजनीतिक चरण माना जाता है। लोक परंपराओं में इनके राज्य का विस्तार हिमालय से लेकर तराई और पश्चिमी क्षेत्रों तक बताया जाता है। कुछ परंपराएं तो राज्य का विस्तार नेपाल, रोहिलखंड, सहारनपुर और उससे भी दूर तक बताती हैं।
हालांकि सिक्किम से काबुल तक अथवा मालवा और कर्नाटक तक प्रत्यक्ष राजनीतिक नियंत्रण जैसे व्यापक दावों को प्रमाणित करने के लिए ठोस समकालीन अभिलेखीय साक्ष्य की आवश्यकता है। इतिहास में ऐसे दावे प्रायः लोकगाथाओं, वंशावलियों और बाद के लेखों में मिलते हैं। इसलिए इन्हें निश्चित तथ्य के बजाय ऐतिहासिक परंपरा के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
कत्युरी शासकों से जुड़े शिलालेख और ताम्रपत्र प्रशासन, भूमि अनुदान, धार्मिक संस्थाओं और स्थानीय सत्ता व्यवस्था की महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। इनसे यह स्पष्ट होता है कि कत्युरी सत्ता का प्रभाव लंबे समय तक हिमालयी क्षेत्र में रहा।
ब्रह्मपुर राज्य का रहस्य
उत्तराखंड के प्राचीन इतिहास का एक और महत्वपूर्ण अध्याय ब्रह्मपुर राज्य से जुड़ा है। कुछ इतिहास परंपराओं में ब्रह्मपुर को कुमाऊं क्षेत्र का प्राचीन राज्य बताया गया है। इसकी राजधानी के रूप में रामगंगा नदी के किनारे स्थित लखनपुर का उल्लेख मिलता है।
इतिहासकार कनिंघम द्वारा तैयार किए गए नक्शों और यात्रा विवरणों की व्याख्या में विराटनगर, लखनपुर और ब्रह्मपुर के बीच संबंध स्थापित करने का प्रयास किया गया है। चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा विवरण को लेकर भी उत्तराखंड के प्राचीन भूगोल से संबंध जोड़ने वाले मत सामने आए हैं। हालांकि इन ऐतिहासिक स्थलों की सटीक पहचान को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं।
स्थानीय जागर परंपरा में लखनपुर की स्मृति आज भी दिखाई देती है—
“आसान बांका, वासन बांका, सिंहासन बांका,
बांका ब्रह्म, बांका लखनपुर।”
यह लोकपंक्ति केवल सांस्कृतिक स्मृति नहीं, बल्कि उस क्षेत्र में कभी किसी शक्तिशाली राजनीतिक केंद्र के होने की ओर संकेत करने वाली परंपरा के रूप में देखी जाती है।
विराटनगर और ढिकुली की कहानी
रामनगर के निकट ढिकुली क्षेत्र को लेकर भी प्राचीन इतिहास की अनेक धारणाएं हैं। कुछ स्थानीय परंपराओं में इसे विराटनगर से जोड़ा जाता है और पांडव काल से इसके संबंध बताए जाते हैं। आधुनिक समय में इसी व्यापक क्षेत्र में जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान स्थित है।
जंगलों के भीतर प्राचीन अवशेषों और खंडहरों की मौजूदगी ने इस क्षेत्र की पुरातात्विक संभावनाओं को और महत्वपूर्ण बनाया है। लेकिन किसी स्थल को महाभारत कालीन विराटनगर सिद्ध करने के लिए व्यवस्थित पुरातात्विक खुदाई, काल निर्धारण और अभिलेखीय प्रमाण आवश्यक हैं।
इसी तरह कुमाऊं के प्राचीन शासकों को शक, मौर्य अथवा अन्य राजवंशों से जोड़ने वाली कई स्थानीय परंपराएं मौजूद हैं। शकादित्य से संबंधित कथाएं भी इसी ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा हैं, लेकिन इन्हें प्रमाणित इतिहास मानने से पहले उपलब्ध स्रोतों की आलोचनात्मक जांच जरूरी है।
लखनपुर और कत्युरी सत्ता
पाली पछाऊ क्षेत्र की कत्युरी परंपरा में वैराठ, विराट पटनम और लखनपुर का विशेष उल्लेख मिलता है। चौखुटिया के आसपास के क्षेत्र को भी प्राचीन सत्ता केंद्रों से जोड़ा जाता है।
कहा जाता है कि उस समय यहां बौद्ध और ब्राह्मण दोनों परंपराओं के अनुयायी रहते थे। इससे पता चलता है कि हिमालयी समाज धार्मिक दृष्टि से विविध था और राजनीतिक सत्ता के साथ-साथ अलग-अलग धार्मिक-सांस्कृतिक धाराएं भी समानांतर रूप से विकसित हो रही थीं।
कत्युरी शासन में अलग-अलग क्षेत्रों के प्रशासन के लिए क्षेत्रपाल नियुक्त किए जाने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। इससे संकेत मिलता है कि विशाल पर्वतीय भूभाग को स्थानीय सत्ता केंद्रों के माध्यम से संचालित किया जाता था।
कत्युरी राजवंश का विघटन
कत्युरी साम्राज्य के अंतिम दौर में सत्ता कमजोर होने लगी। स्थानीय परंपरा में ब्रह्मदेव या वीरमदेव को अंतिम शक्तिशाली कत्युरी शासकों में गिना जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने चंद शासकों के साथ राजनीतिक समझौते किए और अपनी राजधानी मानिला के निकट मानरदेश क्षेत्र में स्थानांतरित की।
यही मानरदेश आगे चलकर मनराल परंपरा से जोड़ा जाता है। स्थानीय वंश परंपराओं में कहा जाता है कि इसी कारण उनके वंशजों को बाद में मनराल कहा गया।
कत्युरी सत्ता के कमजोर होने के बाद उनका विशाल राजनीतिक ढांचा अनेक छोटे-छोटे सत्ता केंद्रों में विभाजित हो गया। लोक परंपरा में इन्हें 12 रजबारियां कहा जाता है। नेपाल के डोटी और उक्कू से लेकर कुमाऊं के विभिन्न गढ़ों तक इस विभाजन की स्मृतियां आज भी स्थानीय इतिहास में दिखाई देती हैं।
12 रजबारियों और प्रमुख गढ़
कत्युरी सत्ता के विघटन के बाद जिन स्थानीय केंद्रों का उल्लेख मिलता है, उनमें डोटी, उक्कू, अस्कोट, चौगर्खा, खकमरा, सूई, चंपावत और पाली पछाऊ के विभिन्न गढ़ शामिल हैं।
रांचुलाकोट को प्रमुख राजधानी और लखनपुर-वैराठ को उपराजधानी के रूप में देखने वाली परंपरा भी मौजूद है। अलग-अलग स्थानीय वंशावलियां इन केंद्रों को कत्युरी राजवंश के विभाजित राजनीतिक ढांचे से जोड़ती हैं।
अस्कोट में वनराजी समुदाय के राजाओं की परंपरा भी कुमाऊं के सामाजिक इतिहास को अलग आयाम देती है। इससे स्पष्ट होता है कि हिमालय में सत्ता केवल बड़े राजवंशों तक सीमित नहीं थी, बल्कि छोटे स्थानीय समुदायों और गढ़ों के भी अपने राजनीतिक केंद्र थे।
मनरालों की राजनीतिक विरासत
पाली पछाऊ की कत्युरी परंपरा में मनराल वंश का उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। स्थानीय इतिहास के अनुसार कत्युरी सत्ता के अंतिम चरण के बाद मनराल वंश ने क्षेत्रीय स्तर पर अपना प्रभाव कायम रखा।
सैणमानर में 15वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में किले के निर्माण की परंपरा बताई जाती है। रामगंगा तक पहुंचने के लिए चूड़ीकोट से सुरंग बनाए जाने का उल्लेख भी स्थानीय इतिहास में मिलता है। ऐसे स्थल आज पुरातात्विक और ऐतिहासिक अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
इसी वंश परंपरा में वागदेव और सारंग देव जैसे नाम भी आते हैं। कहा जाता है कि सारंग देव को गढ़वाल क्षेत्र में क्षेत्रपाल के रूप में नियुक्त किया गया और उन्होंने पोखड़ा-धुमाकोट क्षेत्र तथा बाद में देवप्रयाग के निकट कड़ाकोट में अपना ठिकाना बनाया।
इतिहास और लोकस्मृति के बीच कत्युरी गाथा
कत्युरी राजवंश का इतिहास केवल शिलालेखों और ताम्रपत्रों में ही नहीं, बल्कि कुमाऊं के जागरों, भाटों की वंशावलियों, लोकगीतों और स्थानीय स्मृतियों में भी जीवित है। यही कारण है कि कत्युरी इतिहास का एक हिस्सा प्रमाणित अभिलेखीय इतिहास है तो दूसरा हिस्सा लोकपरंपरा के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है।
शालीवाहन देव से लेकर बसंत देव, कार्तिकेयपुर, ब्रह्मपुर, लखनपुर, वैराठ और अंततः 12 रजबारियों तक की यह कथा उत्तराखंड के प्राचीन राजनीतिक भूगोल की जटिलता को सामने रखती है।
इतिहासकारों के लिए चुनौती यही है कि लोकपरंपराओं में सुरक्षित इन कथाओं को शिलालेखों, ताम्रपत्रों, पुरातात्विक साक्ष्यों और समकालीन बाहरी यात्रियों के विवरणों के साथ मिलाकर देखा जाए। तभी यह स्पष्ट हो सकेगा कि कौन-सी कथा ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है और कौन-सी सदियों से चली आ रही लोकस्मृति।
चंदन सिंह मनराल (कत्युरी), टिटिरी, देघाट और पाली पछाऊ की स्थानीय परंपराएं आज भी इस इतिहास को जीवित रखे हुए हैं। यही परंपराएं बताती हैं कि उत्तराखंड का इतिहास केवल राजधानियों और राजाओं का इतिहास नहीं, बल्कि उन गढ़ों, गांवों, समुदायों और लोकगाथाओं का भी इतिहास है जिन्होंने हिमालयी समाज की पहचान को सदियों तक सुरक्षित रखा।
