अयोध्या से हिमालय तक कत्युरियों का सफर, 2500 साल पुराना रहस्य!
कत्युरियों की असली जड़ कहां? अयोध्या, जोशीमठ या लखनपुर!
जोशीमठ से लखनपुर तक छिपा है कत्युरी राज का बड़ा रहस्य
कत्युरी राजवंश की कहानी: अयोध्या से काबुल तक सत्ता का दावा!
सूर्यवंशी शालीवाहन देव से कत्युरियों तक, इतिहास में कितनी सच्चाई?
कत्युरी कौन थे? शिलालेख, ताम्रपत्र और जागरों में छिपा राज
2500 साल पीछे ले जाता है कत्युरी इतिहास, अयोध्या से जुड़ते हैं तार!
कत्युरियों की राजधानी को लेकर बड़ा सवाल—जोशीमठ या लखनपुर?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
कत्युरी राजवंश की जड़ें अयोध्या से हिमालय तक?
शालीवाहन देव से बसंत देव और ब्रह्मदेव तक फैली कहानी, लखनपुर-वैराठ से जोशीमठ तक राजधानी के दावे
रुद्रपुर। उत्तराखंड के इतिहास में कत्युरी राजवंश का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। कत्युरियों के उद्भव, उनकी प्रारंभिक राजधानी और राज्य की वास्तविक सीमा को लेकर इतिहासकारों में अलग-अलग मत मिलते हैं। शिलालेखों, ताम्रपत्रों, स्थानीय लोक परंपराओं, जागरों और ऐतिहासिक यात्रावृत्तांतों को जोड़कर देखें तो कत्युरी इतिहास की एक लंबी और जटिल तस्वीर सामने आती है।
लोक-ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार अयोध्या के राजा सुमित्र के पुत्र शालीवाहन देव लगभग 2300 से 2500 वर्ष पहले उत्तर कौशल से केदारखंड की ओर आए और जोशीमठ को अपना केंद्र बनाया। एक मत यह भी है कि अयोध्या में सत्ता परिवर्तन के बाद सूर्यवंशी राजपरिवार की एक शाखा हिमालय की ओर आई और उसने यहां अपना प्रभाव स्थापित किया। हालांकि इस प्रारंभिक काल के संबंध में प्रत्यक्ष समकालीन लिखित प्रमाण सीमित हैं, इसलिए इसे इतिहास की स्थापित घटना के बजाय एक ऐतिहासिक परंपरा और मत के रूप में देखा जाता है।
कार्तिकेयपुर से कत्युरी नाम तक
कत्युरी राजवंश की प्रारंभिक पहचान कार्तिकेयपुर राजवंश के रूप में बताई जाती है। बाद की परंपरा में यही नाम कत्युरी या क़त्युरी के रूप में प्रचलित हुआ। बसंत देव, जिन्हें कुछ परंपराओं में वासुदेव भी कहा गया है, को इस वंश का महत्वपूर्ण शासक माना जाता है। लगभग सातवीं शताब्दी में उनके स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने का उल्लेख मिलता है।
कत्युरियों के प्रारंभिक राजनीतिक संबंध कन्नौज की सत्ता से जोड़ने वाले मत भी मौजूद हैं। इसी क्रम में नागवंशी शासक ललित मुक्तापीड और हिमालयी शासकों द्वारा कन्नौज की सत्ता को चुनौती दिए जाने की परंपरा सामने आती है। बसंत देव के पुत्र कनक देव के संबंध में काबुल में मृत्यु की परंपरा भी मिलती है, हालांकि इन घटनाओं की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए स्रोतों की आलोचनात्मक जांच आवश्यक है।
जोशीमठ, लखनपुर और वैराठ—राजधानी को लेकर अलग-अलग मत
कत्युरी इतिहास की सबसे दिलचस्प पहेलियों में उनकी राजधानी का प्रश्न है। एक परंपरा जोशीमठ को प्रारंभिक राजधानी मानती है। वहीं पाली पछाऊ क्षेत्र की ऐतिहासिक परंपरा में लखनपुर-वैराठ को महत्वपूर्ण सत्ता केंद्र बताया गया है।
रामगंगा नदी के किनारे स्थित लखनपुर को कुछ इतिहासकार ब्रह्मपुर और विराटनगर से जोड़ते हैं। ब्रिटिशकालीन इतिहासकार अलेक्जेंडर कनिंघम के मानचित्रों और चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा विवरणों की व्याख्या को लेकर भी इस क्षेत्र का उल्लेख किया जाता है। हालांकि इन स्थानों की पहचान को लेकर इतिहासकारों के बीच पूर्ण सहमति नहीं है।
स्थानीय जागर परंपरा में भी लखनपुर का गौरव दिखाई देता है—
“आसान बांका, वासन बांका, सिंहासन बांका,
बांका ब्रह्म, बांका लखनपुर।”
लोकगीतों और जागरों में सुरक्षित ऐसी पंक्तियां कुमाऊं की सामूहिक ऐतिहासिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
खस, कुलिंद और कत्युरियों का विस्तार
कत्युरी शासन के संदर्भ में खस समाज और अन्य प्राचीन स्थानीय समूहों का उल्लेख मिलता है। कुछ परंपराएं कत्युरियों द्वारा विभिन्न खस राज्यों को अपने अधीन लाने की बात कहती हैं। वहीं कुलिंद और कत्युरियों को एक ही वंश मानने वाले मत भी सामने आते हैं, लेकिन दोनों की समानता को स्थापित करने के लिए ठोस ऐतिहासिक प्रमाण आवश्यक हैं।
डॉ. लक्ष्मी दत्त जोशी सहित कुछ विद्वानों ने खस समाज को प्राचीन आर्य परंपरा से जोड़कर देखा है। दूसरी ओर, उत्तराखंड की प्राचीन सामाजिक संरचना में शिल्पकार और अन्य स्थानीय समुदायों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। इसलिए उत्तराखंड के प्राचीन इतिहास को केवल राजवंशों की कहानी के रूप में देखना अधूरा होगा।
विराटनगर से ढिकुली तक
कुमाऊं की ऐतिहासिक परंपराओं में रामनगर के निकट ढिकुली क्षेत्र को भी प्राचीन विराटनगर से जोड़ने का प्रयास किया गया है। आधुनिक समय में यही क्षेत्र जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के आसपास आता है। स्थानीय परंपराओं में पांडवों, विराट और प्राचीन बस्तियों से जुड़े अनेक आख्यान आज भी सुनाई देते हैं।
कुछ ऐतिहासिक परंपराओं में कुमाऊं की सत्ता को शक, हुण और कुलिंद जैसे प्राचीन समूहों से भी जोड़ा गया है। इसी प्रकार शकादित्य नामक शासक से संबंधित कथाएं भी प्रचलित हैं। इन दावों की पुष्टि के लिए पुरातात्विक और अभिलेखीय प्रमाणों को अलग-अलग परखना जरूरी है।
कत्युरी सत्ता का व्यापक प्रभाव
मध्यकालीन परंपराओं में कत्युरी राज्य को अत्यंत विस्तृत और शक्तिशाली बताया गया है। कुछ स्थानीय ऐतिहासिक स्रोत इसकी सीमा पश्चिम में रोहिलखंड-सहारनपुर और पूर्व में नेपाल के गंडकी क्षेत्र तक बताते हैं। कुछ परंपराएं इससे भी व्यापक राजनीतिक प्रभाव का दावा करती हैं।
लेकिन कत्युरी साम्राज्य की सीमा को सिक्किम से काबुल और मालवा-कर्नाटक तक मानने जैसे दावों को प्रमाणित इतिहास से अलग रखकर देखना आवश्यक है। उपलब्ध अभिलेखों और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर कत्युरी सत्ता का प्रभाव हिमालयी क्षेत्र और उससे जुड़े मैदानी इलाकों में महत्वपूर्ण था, लेकिन उसकी अधिकतम सीमा पर इतिहासकारों में मतभेद हैं।
ब्रह्मपुर और बारह राजबारियों की परंपरा
उत्तराखंड के इतिहास में ब्रह्मपुर नामक राज्य का उल्लेख भी मिलता है। इसके साथ लखनपुर को सत्ता केंद्र तथा क्षेत्रपाल व्यवस्था से जोड़ने वाली परंपरा है। बाद के समय में कत्युरी सत्ता के विघटन के साथ अनेक छोटे-छोटे राजवंश और स्थानीय सत्ता केंद्र उभरे, जिन्हें लोक परंपरा में बारह राजबारियों से जोड़ा जाता है।
डोटी, उक्कू, अस्कोट, चौगर्खा, सूई, खकमरा और पाली पछाऊ सहित अनेक क्षेत्रों में कत्युरी वंश से संबंध बताने वाली परंपराएं आज भी मौजूद हैं।
ब्रह्मदेव और कत्युरी सत्ता का अवसान
कत्युरी इतिहास में ब्रह्मदेव अथवा वीरमदेव का नाम अंतिम प्रभावशाली शासकों में लिया जाता है। लोक परंपरा के अनुसार उन्होंने चंद शासकों के साथ राजनीतिक समझौता किया और अपनी सत्ता का केंद्र मानिला क्षेत्र के आसपास स्थानांतरित किया। इसी क्षेत्र को बाद में मानरदेश कहा गया और उनके वंशजों के लिए मनराल नाम प्रचलित होने की परंपरा भी बताई जाती है।
सैणमानर में किले के निर्माण तथा रामगंगा नदी की ओर जाने वाली सुरंग से जुड़ी स्थानीय मान्यताएं भी इसी ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा हैं। कत्युरी सत्ता के कमजोर पड़ने के बाद कुमाऊं में चंद वंश का प्रभाव बढ़ा और इसी परिवर्तन को लोकभाषा में “सूर्यास्त और चंद्रोदय” जैसे प्रतीकों से व्यक्त किया गया।
इतिहास के पन्नों से ज्यादा गहरी लोक स्मृति
कत्युरी इतिहास केवल राजाओं और युद्धों की कथा नहीं है। जोशीमठ, बैजनाथ, लखनपुर, वैराठ, पाली पछाऊ, अस्कोट और मानिला जैसे स्थान आज भी इस इतिहास की स्मृतियां अपने भीतर समेटे हुए हैं। शिलालेख, ताम्रपत्र, पुरातात्विक अवशेष और लोकगीत—इन सभी को साथ रखकर ही कत्युरी काल की वास्तविक तस्वीर सामने लाई जा सकती है।
कत्युरियों की उत्पत्ति अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं से हुई या स्थानीय हिमालयी सत्ता के साथ उनका क्रमिक राजनीतिक विकास हुआ—यह प्रश्न आज भी इतिहास के शोध का विषय है। लेकिन इतना निर्विवाद है कि कत्युरी सत्ता ने मध्यकालीन उत्तराखंड की राजनीतिक और सांस्कृतिक संरचना पर गहरा प्रभाव छोड़ा।
चंदन सिंह मनराल (कत्युरी), टिटिरी, देघाट और पाली पछाऊ की परंपराएं आज भी इस विरासत को जीवित रखे हुए हैं। कत्युरी इतिहास का सबसे बड़ा रहस्य शायद यही है कि शिलालेख जहां सीमित जानकारी देते हैं, वहीं लोक स्मृति इस राजवंश की कहानी को कई सदियों पीछे तक ले जाती है।
