देहरादून। उत्तराखंड में मदरसा शिक्षा व्यवस्था को मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने की दिशा में राज्य सरकार की पहल अब तेजी से आगे बढ़ रही है। मदरसा बोर्ड को समाप्त कर उसके स्थान पर उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के गठन के बाद प्रदेश में अल्पसंख्यक विद्यालयों की मान्यता की प्रक्रिया शुरू की गई है। सरकार और शिक्षा विभाग की इस पहल का उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों को व्यवस्थित, मान्यता प्राप्त और व्यापक शैक्षिक व्यवस्था से जोड़ना बताया जा रहा है।
एक जुलाई 2026 को मदरसा बोर्ड भंग किए जाने के बाद अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के गठन को लगभग तीन महीने हो चुके हैं। इस अवधि में शिक्षा विभाग के पोर्टल पर मान्यता के लिए कुल 198 संस्थानों ने आवेदन किया, जिनमें से 60 संस्थानों को शिक्षा विभाग की ओर से मान्यता मिल चुकी है। इनमें 35 संस्थानों को अल्पसंख्यक विद्यालय का मान्यता प्रमाण पत्र प्रदान किया जा चुका है, जबकि 25 अन्य संस्थानों के प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया चल रही है।
प्राधिकरण के चेयरमैन प्रो. सुरजीत सिंह गांधी ने बुधवार को शासन को सौंपी रिपोर्ट में मान्यता प्रक्रिया में तेजी लाने की जरूरत बताई है। रिपोर्ट में अक्टूबर तक कम से कम 100 अल्पसंख्यक विद्यालयों को मान्यता प्रमाण पत्र दिए जाने का लक्ष्य रखा गया है।
हरिद्वार में सबसे अधिक संस्थान
अब तक मान्यता प्राप्त 35 संस्थानों में सर्वाधिक 26 हरिद्वार जिले के हैं। इनमें 22 मदरसे और सिख समुदाय से जुड़े दो संस्थान सहित अन्य अल्पसंख्यक संस्थान शामिल हैं। इसके अलावा सात संस्थान देहरादून और दो ऊधम सिंह नगर के हैं।
प्राधिकरण की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड में कुल 452 मदरसे संचालित थे। इनमें 400 सीनियर और 52 जूनियर स्तर के मदरसे शामिल थे। कार्रवाई और सत्यापन की प्रक्रिया के दौरान 227 मदरसे बंद पाए गए या बंद हुए। इनमें 107 पहले से बंद थे, जबकि 120 ने हाल में संचालन बंद किया।
शिक्षा विभाग के पोर्टल पर 198 मदरसों ने मान्यता के लिए आवेदन किया है। इनमें 60 को शिक्षा विभाग से मान्यता मिल चुकी है, जबकि 138 आवेदन अभी लंबित हैं। वहीं, नियमों के विपरीत संचालित पाए गए 19 मदरसों को शासन की ओर से सील किया गया है।
तीन मदरसों ने न तो मान्यता के लिए आवेदन किया और न ही अपने बंद होने की जानकारी विभाग को दी। रिपोर्ट के अनुसार 452 मदरसे प्रदेश के सात जिलों में संचालित थे। इनमें हरिद्वार में सबसे अधिक 270 मदरसे थे, जबकि अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ में एक-एक मदरसा संचालित था।
शिक्षा व्यवस्था को मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश
सरकार की इस पूरी कवायद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मदरसों को केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित रखने के बजाय उन्हें एक औपचारिक अल्पसंख्यक विद्यालय व्यवस्था के तहत लाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। मान्यता के लिए निर्धारित नियमों और विभागीय प्रक्रिया का पालन करने वाले संस्थानों को मान्यता दिए जाने से विद्यार्थियों की शिक्षा को अधिक संस्थागत स्वरूप मिलने की संभावना है।
इसका प्रभाव केवल मैदानी जिलों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि मान्यता की प्रक्रिया आगे बढ़ती है और अल्पसंख्यक विद्यालयों का नेटवर्क प्रदेश के अन्य क्षेत्रों तक पहुंचता है, तो आने वाले समय में पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चे भी ऐसे मान्यता प्राप्त विद्यालयों में शिक्षा हासिल कर सकते हैं। इससे उन परिवारों के लिए विकल्प बढ़ सकते हैं जो अपने बच्चों को स्थानीय स्तर पर औपचारिक शिक्षा उपलब्ध कराना चाहते हैं।
मध्याह्न भोजन पर अभी शासन के निर्णय का इंतजार
मान्यता प्राप्त 35 अल्पसंख्यक विद्यालयों को मध्याह्न भोजन योजना से जोड़ने को लेकर फिलहाल स्थिति स्पष्ट होने की प्रक्रिया में है। प्राधिकरण का कहना है कि ये संस्थान योजना का लाभ पाने के पात्र हैं और इस संबंध में केंद्र सरकार की ओर से जारी पत्र शिक्षा सचिव को उपलब्ध कराया गया है।
वहीं प्रारंभिक शिक्षा निदेशक केएस रावत का कहना है कि पहले मदरसा बोर्ड से संबद्ध विद्यालयों को मध्याह्न भोजन योजना का लाभ दिया जाता था। अब मदरसा बोर्ड समाप्त हो चुका है। इसलिए अल्पसंख्यक विद्यालयों को योजना से जोड़ने के संबंध में शासन से राय मांगी गई है। शासन के निर्णय के बाद आगे की कार्रवाई होगी।
धामी सरकार के लिए शिक्षा सुधार का महत्वपूर्ण अध्याय
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा मदरसा बोर्ड की जगह अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की व्यवस्था लागू करना उत्तराखंड की शिक्षा नीति में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक बदलाव है। इसके साथ ही अब मान्यता की प्रक्रिया को पोर्टल आधारित करने, संस्थानों का सत्यापन करने और नियमों के अनुरूप संचालित संस्थानों को औपचारिक मान्यता देने की कवायद चल रही है।
सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती लंबित 138 आवेदनों का समयबद्ध निस्तारण, मान्यता प्राप्त संस्थानों में शैक्षिक गुणवत्ता सुनिश्चित करना और विद्यार्थियों को उपलब्ध सुविधाओं को स्पष्ट करना है।
अक्टूबर तक 100 अल्पसंख्यक विद्यालयों को मान्यता देने का लक्ष्य पूरा होता है तो यह प्रक्रिया अगले चरण में प्रवेश करेगी। इसके बाद चुनौती यह होगी कि मान्यता केवल प्रमाण पत्र तक सीमित न रहे, बल्कि इन विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आवश्यक शैक्षिक सुविधाएं और आगे की पढ़ाई के पर्याप्त अवसर भी मिलें।
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“मदरसा बोर्ड खत्म, शिक्षा व्यवस्था में नया अध्याय: धामी सरकार की पहल से अल्पसंख्यक विद्यालयों को मान्यता, अक्टूबर तक 100 का लक्ष्य”
उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा व्यवस्था में चल रहा यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका सीधा संबंध बच्चों के भविष्य से है। सरकार की पहल का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होगा कि इससे कितने बच्चों को बेहतर, मान्यता प्राप्त और व्यवस्थित शिक्षा का अवसर मिलता है।
