लद्दाख की 18,500 फीट ऊंची चुनौती में चिराग उप्रेती ने जीता कांस्य पदक
42 किलोमीटर लद्दाख माउंटेन मैराथन में 40-50 आयु वर्ग में शानदार प्रदर्शन, न्यूयॉर्क से खास पहुंचे थे चिराग
अल्मोड़ा/लेह। उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के धौलादेवी क्षेत्र के ग्राम खेती निवासी चिराग उप्रेती ने लद्दाख की दुर्गम पहाड़ियों में आयोजित 42 किलोमीटर लद्दाख माउंटेन मैराथन में कांस्य पदक जीतकर प्रदेश और परिवार का नाम रोशन किया है। न्यूयॉर्क में कार्यरत चिराग इस प्रतिष्ठित दौड़ में हिस्सा लेने के लिए विशेष रूप से लद्दाख पहुंचे थे। पहली बार प्रतियोगिता में भाग लेते हुए उन्होंने 40 से 50 वर्ष आयु वर्ग में कांस्य पदक हासिल किया।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
लद्दाख माउंटेन मैराथन देश की कठिन ऊंचाई वाली मैराथन में शामिल है। लेह से शुरू होने वाली इस चुनौतीपूर्ण दौड़ का मार्ग दुनिया के सबसे ऊंचे मोटरेबल दर्रों में शामिल खारदुंगला पास की ओर जाता है। मार्ग की ऊंचाई करीब 18,500 फीट तक पहुंचती है। 42 किलोमीटर के सफर में प्रतिभागियों को करीब 6000 फीट की चढ़ाई का सामना करना पड़ता है। अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र में ऑक्सीजन की मात्रा कम होने के कारण धावकों के लिए यह दौड़ शारीरिक क्षमता के साथ मानसिक दृढ़ता की भी परीक्षा लेती है।
इस वर्ष लद्दाख माउंटेन मैराथन अपने 13वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। प्रतियोगिता में देश के विभिन्न राज्यों के धावकों के साथ दुनिया के कई देशों से प्रतिभागी पहुंचते हैं। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, ऊंचाई, ठंड और ऑक्सीजन की कमी के बीच 42 किलोमीटर की दूरी पूरी करना अपने आप में बड़ी उपलब्धि माना जाता है।
न्यूयॉर्क से लद्दाख पहुंचे चिराग
चिराग उप्रेती वर्तमान में न्यूयॉर्क मेडिकल कॉलेज में सेवारत हैं। पेशेवर जीवन के साथ उन्हें फोटोग्राफी और रेस में भाग लेने का विशेष शौक है। इसी रुचि के चलते उन्होंने लद्दाख माउंटेन मैराथन में हिस्सा लेने का निर्णय लिया। न्यूयॉर्क से भारत पहुंचकर सीधे इस चुनौतीपूर्ण प्रतियोगिता में भाग लेना उनके लिए खास अनुभव रहा।
पहली ही भागीदारी में अपने आयु वर्ग में कांस्य पदक जीतकर चिराग ने अपनी फिटनेस, तैयारी और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया। उनकी इस सफलता से अल्मोड़ा के धौलादेवी क्षेत्र के साथ पूरा परिवार उत्साहित है।
तारा चंद्र उप्रेती ने भी बनाई अपनी पहचान
चिराग के पिता तारा चंद्र उप्रेती अल्मोड़ा जीआईसी के छात्र रहे हैं। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने नैनीताल बैंक में सेवाएं दीं और एजीएम पद तक पहुंचे। इसके बाद उन्होंने कॉरपोरेट क्षेत्र में भी कार्य किया।
सेवानिवृत्ति के बाद तारा चंद्र उप्रेती उत्तराखंड में जैविक उत्पादों के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। ‘दीर्घायु ऑर्गेनिक’ के माध्यम से वह जैविक उत्पादों को बढ़ावा देने के कार्य में सक्रिय हैं। परिवार की मेहनत, अनुशासन और सामाजिक जुड़ाव की परंपरा के बीच चिराग ने खेल के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है।
डॉ. ललित मोहन उप्रेती ने दी बधाई
चिराग की उपलब्धि पर परिवार, मित्रों और शुभचिंतकों ने खुशी जताई है। डॉ. ललित मोहन उप्रेती, पूर्व निदेशक स्वास्थ्य, ने चिराग को इस सफलता पर हार्दिक बधाई दी। उन्होंने कहा कि इतनी ऊंचाई और कठिन परिस्थितियों में 42 किलोमीटर की मैराथन पूरी कर अपने आयु वर्ग में पदक हासिल करना परिवार और उत्तराखंड के लिए गर्व का विषय है।
परिवार की ओर से चिराग को शुभकामनाएं देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की गई है। क्षेत्रवासियों ने भी उनकी उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए इसे उत्तराखंड के लिए गौरव की उपलब्धि बताया है।
पहाड़ से निकली प्रतिभा ने विदेश में भी बनाई पहचान
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों से निकलकर देश-विदेश में अपनी पहचान बनाने वाली प्रतिभाओं की लंबी परंपरा रही है। चिराग उप्रेती ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए न्यूयॉर्क में अपनी पेशेवर जिम्मेदारियों के साथ खेल के क्षेत्र में उपलब्धि हासिल की है।
लद्दाख की 18,500 फीट तक पहुंचने वाली ऊंचाई, 42 किलोमीटर की दूरी और करीब 6000 फीट की चढ़ाई वाली इस कठिन मैराथन में कांस्य पदक हासिल करना चिराग की मेहनत और जुनून का परिणाम है। खास बात यह है कि उन्होंने पहली बार इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और अपने आयु वर्ग में पदक अपने नाम किया।
चिराग उप्रेती की सफलता पर परिवारजनों, मित्रों और अल्मोड़ा के धौलादेवी क्षेत्र के लोगों ने उन्हें हार्दिक बधाई दी है। परिवार का कहना है कि उनकी इस उपलब्धि से उत्तराखंड की खेल प्रतिभाओं को भी प्रेरणा मिलेगी।
