खुरपिया फार्म से रुद्रपुर तक: सरकारी जमीन पर उठते सवाल, 90 साल की लीज ने बढ़ाया सियासी बवालसरकारी जमीन किसकी, फायदा किसका? खुरपिया फार्म से रुद्रपुर तक उठे बड़े सवालउत्तराखंड में जमीन पर सियासत: 7 हजार बीघा, नजूल और प्लाटिंग के आरोपों ने बढ़ाई हलचल

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7,000 बीघा, 90 साल की लीज और जमीन का खेल: उत्तराखंड में क्यों मचा है सियासी बवाल?

7 हजार बीघा सरकारी जमीन से नजूल तक: उत्तराखंड में जमीन का खेल या विकास का मॉडल?
खुरपिया फार्म से रुद्रपुर तक: सरकारी जमीन पर उठते सवाल, 90 साल की लीज ने बढ़ाया सियासी बवाल
सरकारी जमीन किसकी, फायदा किसका? खुरपिया फार्म से रुद्रपुर तक उठे बड़े सवाल
उत्तराखंड में जमीन पर सियासत: 7 हजार बीघा, नजूल और प्लाटिंग के आरोपों ने बढ़ाई हलचल
रुद्रपुर से खुरपिया फार्म तक जमीन का सवाल: विकास, निवेश या सरकारी संपत्ति का संकट?
90 साल की लीज से नजूल फ्रीहोल्ड तक: उत्तराखंड की जमीन पर क्यों आमने-सामने सरकार और विपक्ष?
जमीन जनता की, फैसले किसके? खुरपिया फार्म से रुद्रपुर तक उठते सवालों का संपादकीय विश्लेषण


रुद्रपुर/देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों सबसे बड़ा सवाल सिर्फ सरकार और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, बल्कि जमीन के इस्तेमाल, सरकारी संपत्तियों की सुरक्षा और भविष्य की पीढ़ियों के अधिकार का बनता जा रहा है। किच्छा के खुरपिया फार्म से उठे 7,000 बीघा सरकारी जमीन को 90 साल की लीज पर देने के आरोप ने इस बहस को और तेज कर दिया है।
कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार बेशकीमती सरकारी जमीन निजी निवेशकों को लंबी अवधि के पट्टे पर देने की तैयारी कर रही है। उनका सवाल है कि जब आम नागरिकों के लिए जमीन खरीदने की सीमाएं हैं तो इतनी बड़ी सरकारी जमीन का व्यावसायिक इस्तेमाल किस प्रक्रिया और किन शर्तों पर होगा?

पार्ट 2,हिमांशु गाबा और राजकुमार ठुकराल ने रुद्रपुर, किच्छा (ऊधमसिंह नगर) सहित पूरे उत्तराखंड के प्रमुख भूमि घोटालों और विवादित फैसलों को लेकर सरकार पर बोला तीखा हमला।।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

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लेकिन इस पूरे विवाद का दूसरा पक्ष भी सामने आया है। उत्तराखंड सरकार ने 7,000 बीघा जमीन निजी निवेशकों को दिए जाने की बात को तथ्यात्मक रूप से गलत बताया है। सरकार के अनुसार यूआईआईडीबी के पास केवल 45 एकड़ जमीन उपलब्ध है। इसलिए असली सवाल आरोप लगाने या खारिज करने से आगे जाकर यह है कि कितनी जमीन, किस विभाग के पास, किस प्रयोजन के लिए और किस शर्त पर उपलब्ध है?
यही वह सवाल है जिसका जवाब दस्तावेजों के साथ सार्वजनिक होना चाहिए।
खुरपिया फार्म से शुरू हुआ सवाल
किच्छा का खुरपिया फार्म कोई साधारण जमीन नहीं है। वर्ष 2012 में सीलिंग कानून के तहत अतिरिक्त घोषित जमीन का बड़ा हिस्सा सरकार ने वापस लिया था। वर्ष 2016 में 1002.15 एकड़ भूमि सिडकुल को देने का शासनादेश भी सामने आया था, जिसके लिए 158.33 करोड़ रुपये देने और तीन वर्ष के भीतर औद्योगिक इकाइयां स्थापित करने जैसी शर्तें बताई गई थीं।
अब इसी क्षेत्र को लेकर औद्योगिक निवेश, संस्थान और दूसरे उपयोगों की चर्चाएं सामने आ रही हैं। अगस्त 2026 में खुरपिया फार्म में अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान स्थापित करने की संभावना को लेकर भी पहल की खबर सामने आई थी।
ऐसे में जनता का अधिकार है कि सरकार साफ करे—खुरपिया फार्म की कुल सरकारी भूमि कितनी है, कितनी भूमि किस संस्था को दी गई, कितनी उपलब्ध है और भविष्य में उसका उपयोग क्या होगा?
रुद्रपुर: नजूल जमीन पर सबसे बड़ा सवाल
ऊधम सिंह नगर में जमीन का सवाल नया नहीं है। रुद्रपुर में नजूल भूमि के कथित हस्तांतरण और फ्रीहोल्ड से जुड़ा मामला हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है। लगभग 4.07 एकड़ जमीन से संबंधित जनहित याचिका में कथित तौर पर सरकारी भूमि के नियम विरुद्ध हस्तांतरण और फ्रीहोल्ड का मुद्दा उठाया गया। हाईकोर्ट ने विवादित भूमि पर निर्माण और विकास गतिविधियों पर अंतरिम रोक लगाई थी।
इसी प्रकरण से जुड़े समाचारों में करीब 500 करोड़ रुपये की व्यावसायिक परियोजना की तैयारी का उल्लेख हुआ। आरोप यह भी रहे कि जमीन को पुराने मूल्यांकन के आधार पर फ्रीहोल्ड कराने की प्रक्रिया अपनाई गई। ये आरोप अदालत में विचाराधीन विषय हैं, इसलिए अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही निकलेगा।
लेकिन इस मामले ने एक बुनियादी प्रश्न जरूर खड़ा किया है—नजूल जमीन जनता की संपत्ति है तो उसके स्वरूप में बदलाव की अनुमति किस आधार पर दी जाती है?
आईएसबीटी और आसपास की जमीन का सवाल
रुद्रपुर में प्रस्तावित आईएसबीटी क्षेत्र और उससे जुड़ी जमीन को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज है। विपक्षी नेताओं और स्थानीय राजनीतिक चेहरों की ओर से निर्माण, भूमि हस्तांतरण और आसपास की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए हैं।
यहां भी राजनीति से ऊपर एक पारदर्शी व्यवस्था की जरूरत है। जिस जमीन पर सार्वजनिक परियोजना प्रस्तावित हो, वहां परियोजना का नाम, स्वीकृति, लागत, कार्यदायी संस्था, नक्शा और समयसीमा सार्वजनिक होनी चाहिए। यदि आसपास की जमीन पर लोगों के निर्माण हटाए जा रहे हैं तो प्रशासन को यह भी बताना चाहिए कि कार्रवाई किस अधिनियम और किस स्वीकृत योजना के तहत की जा रही है।
जनता को बुलडोजर दिखाई देता है, लेकिन फाइल में क्या लिखा है—यह भी जनता को दिखाई देना चाहिए।
पंतनगर और कृषि भूमि की प्लाटिंग
पंतनगर क्षेत्र में कृषि भूमि के व्यावसायिक उपयोग, दुकानों और प्लाटिंग को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। यदि कृषि भूमि का उपयोग बदलकर व्यावसायिक अथवा आवासीय गतिविधि की अनुमति दी जा रही है तो उसकी वैधानिक प्रक्रिया सार्वजनिक होनी चाहिए।
इसी तरह किच्छा क्षेत्र में कृषि और सरकारी भूमि पर प्रस्तावित प्लाटिंग से जुड़े दावों की भी राजस्व रिकॉर्ड, नक्शे और स्वीकृतियों के आधार पर जांच आवश्यक है।
किसी भी जमीन को लेकर केवल राजनीतिक बयान पर्याप्त नहीं हैं। खसरा नंबर, खतौनी, भूमि की श्रेणी, स्वामित्व, भू-उपयोग परिवर्तन और स्वीकृति आदेश—यही असली दस्तावेज हैं।
हरिद्वार ने भी दिखाया कि जमीन का सवाल कितना गंभीर है
हरिद्वार नगर निगम की लगभग 33-35 बीघा जमीन खरीद से जुड़ा मामला इसका बड़ा उदाहरण है। जांच में लगभग 54 करोड़ रुपये की खरीद को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए। मामले में विजिलेंस जांच के बाद कई अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ी तथा मुकदमे की कार्रवाई भी सामने आई।
रिपोर्टों के अनुसार कृषि भूमि के भू-उपयोग में बदलाव के बाद उसकी कीमत बढ़ने और नगर निगम द्वारा जमीन खरीदने की प्रक्रिया पर सवाल उठे।
यह मामला बताता है कि जमीन से जुड़ा भ्रष्टाचार केवल कब्जे या फर्जी दस्तावेज तक सीमित नहीं होता। भूमि की श्रेणी बदलना, बाजार मूल्य निर्धारित करना, सरकारी खरीद और प्रशासनिक स्वीकृति—हर चरण में पारदर्शिता जरूरी है।
देहरादून से विकासनगर तक रजिस्ट्री पर सवाल
2026 में देहरादून, ऋषिकेश और विकासनगर की रजिस्ट्री व्यवस्था को लेकर भी अनियमितताओं की खबरें सामने आईं। इनमें स्टांप शुल्क से जुड़े मामलों और प्रतिबंधित भूमि की रजिस्ट्री जैसे मुद्दे शामिल बताए गए।
इससे यह सवाल फिर सामने आया कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी और सीमित भू-संसाधन वाले राज्य में भूमि रिकॉर्ड व्यवस्था कितनी सुरक्षित है?
सरकार बनाम विपक्ष से आगे की बहस जरूरी
रुद्रपुर में पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल और हिमांशु गाबा जैसे राजनीतिक चेहरों की ओर से भूमि संबंधी मामलों को लेकर सरकार पर सवाल उठाए गए हैं। दूसरी ओर सरकार कई आरोपों को राजनीतिक और तथ्यहीन बताती रही है।
लोकतंत्र में दोनों पक्षों की बात सामने आना जरूरी है। लेकिन उससे भी जरूरी है कि जमीन के मामलों में अंतिम फैसला राजनीतिक बयान से नहीं, दस्तावेज और कानून से हो।
सरकारी जमीन किसी सरकार की निजी संपत्ति नहीं होती। सरकार बदलती रहती है, लेकिन जमीन जनता की रहती है। इसलिए 90 साल की लीज हो या 30 साल की, औद्योगिक आवंटन हो या फ्रीहोल्ड, कृषि भूमि का भू-उपयोग परिवर्तन हो या नजूल जमीन का हस्तांतरण—हर निर्णय का सार्वजनिक रिकॉर्ड होना चाहिए।
आज उत्तराखंड के सामने असली सवाल यह नहीं है कि आरोप कौन लगा रहा है। सवाल यह है कि सरकारी जमीन का वास्तविक मालिक कौन है, उसका लाभ किसे मिल रहा है और आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या बचाया जा रहा है?
रुद्रपुर से किच्छा, पंतनगर से हरिद्वार और देहरादून से ऋषिकेश तक उठ रहे जमीन संबंधी विवादों को एक-दूसरे से जोड़कर देखने के बजाय सरकार को प्रत्येक मामले की अलग-अलग तथ्यात्मक स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए।
खुरपिया फार्म की जमीन हो, रुद्रपुर की नजूल भूमि हो, पंतनगर की कृषि भूमि हो या हरिद्वार की नगर निगम भूमि—एक ही कसौटी होनी चाहिए: जमीन जनता की है तो उसका हिसाब भी जनता के सामने होना चाहिए।
यही पारदर्शिता जमीन के विवाद को राजनीति से निकालकर प्रशासनिक जवाबदेही के दायरे में ला सकती है।


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