

उत्तराखंड सबको पता है, बस सरकार और पुलिस को नहीं

भारत को विश्व गुरु बनाने के दावे ज़ोर-शोर से किए जा रहे हैं, लेकिन अगर इस सपने की कसौटी पर उत्तराखंड को रखकर देखा जाए, तो तस्वीर बेहद परेशान करने वाली दिखाई देती है। देवभूमि कहलाने वाला यह प्रदेश आज अपनी बेटियों के लिए न्याय की गुहार लगाता नज़र आ रहा है।
✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड)
अंकिता भंडारी हत्याकांड उत्तराखंड की आत्मा पर लगा वह घाव है, जो आज भी रिस रहा है। एक साधारण परिवार की बेटी, जो रोज़गार की तलाश में निकली थी, वह सिस्टम की क्रूरता की शिकार बन गई। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो, परिस्थितिजन्य तथ्य और जनभावना—पूरे प्रदेश को सब कुछ दिखाई दे गया, लेकिन उत्तराखंड पुलिस आज भी “सबूत नहीं मिले” की दुहाई देती नज़र आती है। सवाल यह नहीं कि सबूत थे या नहीं, सवाल यह है कि क्या सच तक पहुँचने की नीयत थी?
कशिश हत्याकांड में भी यही कहानी दोहराई गई। शोर हुआ, जांच के वादे किए गए और अंततः आरोपी बेगुनाह घोषित कर दिए गए। हत्या हुई, मगर न्याय नहीं मिला। क्या उत्तराखंड में हत्याएँ होती हैं या सिर्फ फाइलें तैयार की जाती हैं?
डंपरों से कुचलकर हो रही मौतें, खनन और परिवहन माफिया का आतंक, और हर बार मुआवज़े से मामला दबा देना—यह सब अब दुर्घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक संरक्षण में पनप रही व्यवस्था का प्रमाण बन चुका है।
सरकार नशा मुक्त उत्तराखंड का सपना दिखाती है, जबकि गांव-गांव कच्ची शराब का धंधा पुलिस की नाक के नीचे फल-फूल रहा है। पूरी जनता जानती है कि कहाँ क्या चल रहा है, लेकिन पुलिस की जानकारी हर बार शून्य रहती है।
सबको पता है, बस सरकार और पुलिस को नहीं
अंकिता भंडारी हत्याकांड में उत्तराखंड की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि पूरा प्रदेश सच जानता है, लेकिन उत्तराखंड सरकार और पुलिस आज भी अंधेरे में होने का नाटक कर रही है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो, घटनाक्रम की कड़ियाँ और जनभावना—सब कुछ खुली किताब की तरह सामने है, फिर भी पुलिस की फाइलों में हर बार एक ही पंक्ति दर्ज होती है—“सबूत नहीं मिले।”
यह वही प्रदेश है जहाँ आम आदमी की गलती पर कानून फौरन जाग जाता है, लेकिन जैसे ही मामला वीआईपी गुनहगारों, रसूखदार नामों और करोड़ों की संपत्ति से जुड़ता है, कानून की आँखों पर पट्टी बंध जाती है। अंकिता की हत्या केवल एक अपराध नहीं थी, वह उस सिस्टम की परतें खोलने वाली घटना थी, जहाँ सत्ता, संपत्ति और संरक्षण मिलकर सच को दफना देते हैं।
जनता ने देखा—वीडियो वायरल हुए, सवाल उठे, सड़कें गरमाईं। लेकिन सरकार ने जांच से ज़्यादा इमारतों पर बुलडोज़र चलाकर यह जताने की कोशिश की कि न्याय हो गया। असल सवाल आज भी खड़ा है—क्या बुलडोज़र से सच कुचला गया?
देवभूमि उत्तराखंड पूछ रहा है—अगर सब कुछ सबको दिख रहा है, तो फिर सरकार और पुलिस को क्या दिखाई नहीं दे रहा?
या फिर सच दिखना ही नहीं है, क्योंकि गुनहगार वीआईपी हैं।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के समय जिन सपनों के लिए जनता ने बलिदान दिए थे, आज वही जनता सड़कों पर खड़ी होकर सवाल पूछ रही है। नौकरियाँ बाहर चली गईं, ज़मीन बिक गई, और बदले में प्रदेश को असुरक्षित स्पा संस्कृति सौंप दी गई।
“बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ” जैसे नारे तब खोखले लगते हैं, जब बेटियाँ ही सुरक्षित नहीं। विश्व गुरु बनने से पहले ज़रूरी है कि सरकार और सिस्टम अपने घर की सफाई करें। न्याय के बिना कोई भी प्रदेश, कोई भी देश विश्व गुरु नहीं बन सकता।
उत्तराखंड आज चेतावनी दे रहा है—अब सिर्फ वादे नहीं, जवाब चाहिए।




