बबलू श्रीवास्तव: अंडरवर्ल्ड का वह डॉन, जिसकी 90 के दशक में बोलती थी तूती; दाऊद से दोस्ती, फिर दुश्मनी, सिंगापुर में गिरफ्तारी और उम्रकैद तक पहुंची कहानी20 साल पुराने अपहरण मामले में लखनऊ की सीबीआई अदालत……..


बबलू श्रीवास्तव: अंडरवर्ल्ड का वह डॉन, जिसकी 90 के दशक में बोलती थी तूती; दाऊद से दोस्ती, फिर दुश्मनी, सिंगापुर में गिरफ्तारी और उम्रकैद तक पहुंची कहानी
20 साल पुराने अपहरण मामले में लखनऊ की सीबीआई अदालत से बड़ी राहत, लेकिन उम्रकैद की सजा और दूसरे मुकदमे अब भी अलग कानूनी चुनौती
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | विशेष क्राइम स्टोरी,अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर
लखनऊ, 6 नवंबर 2026।
उत्तर प्रदेश के चर्चित अंडरवर्ल्ड डॉन ओम प्रकाश श्रीवास्तव उर्फ बबलू श्रीवास्तव एक बार फिर सुर्खियों में हैं। करीब दो दशक पुराने कोलकाता के होटल लिंगटन के मालिक के अपहरण मामले में लखनऊ की सीबीआई अदालत ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया है। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि बबलू श्रीवास्तव प्रयागराज की नैनी जेल में बंद होने के बावजूद अपने गिरोह के माध्यम से अपहरण की साजिश रच रहे थे। हालांकि, अदालत में यह साबित नहीं हो सका कि वह जेल के भीतर से अपने गिरोह का संचालन कर रहे थे या अपहरण की साजिश में उनकी भूमिका थी।
बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता जिशान अल्वी ने अदालत में पैरवी की। दलीलों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने उन्हें इस विशेष मामले में दोषमुक्त कर दिया। लेकिन यह फैसला उनके पूरे आपराधिक इतिहास को समाप्त नहीं करता। दूसरे मुकदमों में हुई कार्रवाई और उम्रकैद की सजा अपनी जगह कायम हैं।
बबलू श्रीवास्तव की कहानी केवल एक गैंगस्टर की कहानी नहीं है। यह उत्तर भारत से मुंबई और अंतरराष्ट्रीय अपराध नेटवर्क तक फैले उस दौर का अध्याय है, जब अंडरवर्ल्ड के नाम से कारोबारियों, बिल्डरों और बड़े व्यापारिक घरानों में खौफ का माहौल पैदा होता था।
लखनऊ से शुरू हुआ अपराध का सफर
बबलू श्रीवास्तव का वास्तविक नाम ओम प्रकाश श्रीवास्तव बताया जाता है। उनका जन्म 1960 में लखनऊ में हुआ। शुरुआती दौर में उनका नाम स्थानीय आपराधिक गतिविधियों से जुड़ा। बताया जाता है कि वह राजू भटनागर गिरोह से जुड़े और बाद में इस गिरोह में उनकी स्थिति मजबूत होती चली गई।
1988 में लखनऊ के चर्चित अपराधी सुभाष भंडारी की हत्या के बाद बबलू श्रीवास्तव का नाम अपराध जगत में तेजी से उभरा। उत्तर प्रदेश में उस समय गैंगवार, रंगदारी, अपहरण और सुपारी लेकर हत्या जैसी घटनाएं संगठित अपराध का हिस्सा बन रही थीं। इसी माहौल में बबलू ने अपना प्रभाव बढ़ाया।
90 का दशक: जब अंडरवर्ल्ड में गूंजता था नाम
1980 के दशक के अंतिम वर्षों और 1990 के दशक में बबलू श्रीवास्तव का नाम उत्तर प्रदेश की सीमाओं से बाहर निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया। यह वह दौर था जब मुंबई में दाऊद इब्राहिम का डी-कंपनी नेटवर्क तेजी से विस्तार कर रहा था।
मीडिया रिपोर्टों और पुलिस संबंधी विवरणों में बबलू श्रीवास्तव को एक समय दाऊद इब्राहिम के करीबी नेटवर्क से जुड़ा बताया गया। उसके बाद दोनों के बीच संबंध बिगड़ने और दुश्मनी की खबरें भी सामने आईं।
दाऊद और छोटा राजन के बीच 1993 के मुंबई बम धमाकों के बाद दुश्मनी गहराई। अंडरवर्ल्ड के समीकरण बदलने लगे। पुराने साथी अलग-अलग खेमों में बंटने लगे। बबलू श्रीवास्तव का नाम भी इस बदलते आपराधिक परिदृश्य में सामने आया। हालांकि, इन कथित संबंधों के हर पहलू को न्यायिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता।
उस दौर में अंडरवर्ल्ड का प्रभाव केवल मुंबई तक सीमित नहीं था। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, कोलकाता और दूसरे महानगरों में भी रंगदारी और अपहरण के मामलों में संगठित गिरोहों के नाम सामने आते थे।
सिंगापुर में गिरफ्तारी ने बदल दी जिंदगी
बबलू श्रीवास्तव के जीवन का बड़ा मोड़ वर्ष 1995 में आया। भारतीय जांच एजेंसियां उनकी तलाश कर रही थीं। उनके खिलाफ इंटरपोल के माध्यम से रेड कॉर्नर नोटिस जारी कराया गया। 21 अप्रैल 1995 को सिंगापुर में उन्हें गिरफ्तार किया गया और 31 अगस्त 1995 को भारत प्रत्यर्पित किया गया।
उस समय उनका नाम हत्या, अपहरण और रंगदारी सहित लगभग 42 आपराधिक मामलों से जुड़ा बताया जाता था। हालांकि, इन सभी मामलों में आरोप सिद्ध होना अलग-अलग न्यायिक प्रक्रिया का विषय था।
विदेश में गिरफ्तारी और भारत प्रत्यर्पण ने उन्हें राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में ला दिया। यह मामला उन अपराधियों के खिलाफ भारतीय एजेंसियों की कार्रवाई का उदाहरण बना, जिनके कथित संपर्क देश की सीमाओं से बाहर तक फैले हुए थे।
कारोबारी ललित सुनेजा हत्याकांड और उम्रकैद
बबलू श्रीवास्तव के आपराधिक इतिहास में दिल्ली के कारोबारी ललित सुनेजा की हत्या का मामला भी महत्वपूर्ण है। 2 अगस्त 1992 को पूर्वी दिल्ली में ललित सुनेजा की हत्या हुई थी। इस मामले में बबलू श्रीवास्तव और कारोबारी नितिन शाह पर हत्या की साजिश में शामिल होने का आरोप लगा।
वर्ष 2006 में दिल्ली की अदालत ने दोनों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। इस मुकदमे में अभियोजन पक्ष ने कई गवाह पेश किए। रिपोर्टों के अनुसार, 32 गवाहों ने अदालत में बयान दिए थे।
यह मामला बबलू के लिए एक बड़ी कानूनी चुनौती बना और उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि के सबसे चर्चित मुकदमों में शामिल हुआ।
एलडी अरोड़ा हत्याकांड: उम्रकैद की एक और बड़ी वजह
1993 में अतिरिक्त सीमा शुल्क कलेक्टर एलडी अरोड़ा की इलाहाबाद में हत्या हुई थी। इस मामले में आरोप था कि एक जब्त की गई खेप से जुड़े विवाद के बाद उनकी हत्या की साजिश रची गई।
जांच सीबीआई को सौंपी गई। लंबी सुनवाई के बाद 30 सितंबर 2008 को कानपुर की विशेष टाडा अदालत ने बबलू श्रीवास्तव को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। बाद में उनकी दोषसिद्धि के खिलाफ अपील भी सफल नहीं हुई और सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी।
यही सजा उनके जेल में बने रहने का प्रमुख कानूनी कारण है। इसलिए होटल लिंगटन अपहरण मामले में मिली राहत का अर्थ जेल से रिहाई नहीं है।
नैनी जेल से बरेली सेंट्रल जेल तक
बबलू श्रीवास्तव को शुरुआत में प्रयागराज की नैनी जेल में रखा गया था। उपलब्ध समाचार विवरणों के अनुसार, वह 1997 से 1999 के बीच नैनी जेल में रहे। इसके बाद उन्हें बरेली सेंट्रल जेल स्थानांतरित कर दिया गया।
जेल में रहते हुए भी उनके गिरोह के संचालन और बाहरी संपर्कों को लेकर समय-समय पर आरोप सामने आते रहे। जेल के भीतर से मोबाइल फोन के इस्तेमाल और रंगदारी से संबंधित आरोपों की भी चर्चा हुई। हालांकि, प्रत्येक आरोप का फैसला संबंधित मुकदमे के साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही किया जा सकता है।
समयपूर्व रिहाई की कोशिश भी रही चर्चा में
लंबे समय तक जेल में रहने के बाद बबलू श्रीवास्तव ने समयपूर्व रिहाई की मांग भी की। उत्तर प्रदेश सरकार ने उनकी रिहाई की मांग स्वीकार नहीं की। नवंबर 2024 में यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से उनकी समयपूर्व रिहाई के मामले पर विचार करने को कहा।
लेकिन इसका अर्थ रिहाई का आदेश नहीं था। उनकी उम्रकैद की सजा और दूसरे मामलों की कानूनी स्थिति अलग बनी रही।
होटल लिंगटन अपहरण मामला: राहत मिली, लेकिन कहानी खत्म नहीं
अब करीब 20 साल पुराने कोलकाता के होटल लिंगटन के मालिक के अपहरण मामले में सीबीआई अदालत ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया है। आरोप था कि नैनी जेल में रहते हुए भी वह अपने गिरोह के माध्यम से अपहरण की योजना बनवा रहे थे।
बचाव पक्ष ने अभियोजन के आरोपों को चुनौती दी। अदालत में यह प्रमाणित नहीं हो सका कि बबलू श्रीवास्तव जेल से गिरोह संचालित कर रहे थे और अपहरण की साजिश में उनकी भूमिका थी। इसी आधार पर अदालत ने उन्हें इस मामले में दोषमुक्त किया।
पूर्व आईपीएस अधिकारी राजेश पांडेय की पुस्तक में भी इस अपहरण प्रकरण का उल्लेख होने की बात सामने आई है।
अंडरवर्ल्ड का इतिहास और न्यायिक प्रक्रिया का संदेश
बबलू श्रीवास्तव की अपराध यात्रा का चर्चित दौर मुख्य रूप से 1980 के दशक के अंतिम वर्षों और 1990 के दशक में रहा। लखनऊ के स्थानीय गिरोह से लेकर दाऊद इब्राहिम के कथित नेटवर्क, सिंगापुर में गिरफ्तारी, दिल्ली के हत्याकांड और उम्रकैद तक उनकी कहानी भारतीय अंडरवर्ल्ड के कई बड़े घटनाक्रमों से जुड़ी रही है।
लेकिन कानून की नजर में हर मुकदमा अलग होता है। किसी एक मामले में दोषमुक्त होने का मतलब दूसरे मामलों में निर्दोष घोषित होना नहीं है। इसी तरह किसी व्यक्ति पर लगाए गए आरोप को अदालत में दोष सिद्ध होने से पहले अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता।
बबलू श्रीवास्तव को होटल लिंगटन के मालिक के अपहरण मामले में राहत जरूर मिली है, लेकिन उनके नाम से जुड़ा अंडरवर्ल्ड का इतिहास और उम्रकैद की सजा अब भी भारतीय अपराध जगत की सबसे चर्चित कानूनी कहानियों में शामिल है।
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अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर