रामलीला के मंच पर बदलती नारी की पहचान, पर्वतीय संस्कृति और सोशल मीडिया के दौर का नया विमर्श संपादकीय: आज की नारी, शूर्पणखा पर भारी!

रामलीला केवल भगवान श्रीराम की जीवनगाथा का मंचन नहीं है, यह भारतीय संस्कृति, पारिवारिक संस्कारों, सामाजिक मूल्यों और लोक परंपराओं का जीवंत दस्तावेज भी है। समय बदलता है, समाज बदलता है और समाज के साथ कला के स्वरूप में भी बदलाव आता है। कभी रामलीला के मंच पर भगवान श्रीराम का वनवास, सीता स्वयंवर, लक्ष्मण की वीरता, केवट की भक्ति, भरत का त्याग, हनुमान की निष्ठा, सुग्रीव से मित्रता, लंका दहन और रावण वध जैसे प्रसंग दर्शकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र हुआ करते थे। आज भी इन प्रसंगों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व कम नहीं हुआ है, लेकिन मंच पर बदलते किरदारों और सोशल मीडिया की लोकप्रियता ने रामलीला को एक नए विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है।

अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर

आज सवाल यह है कि क्या रामलीला केवल धार्मिक आस्था का मंच रह गई है, या वह बदलते समाज, महिलाओं की भागीदारी, अभिनय की स्वतंत्रता और डिजिटल लोकप्रियता का नया माध्यम भी बन रही है?

जब अभिनय से पहचाने जाते थे किरदार

एक दौर था, जब रामलीला में पुरुष ही अधिकांश भूमिकाएं निभाया करते थे। माता सीता से लेकर कौशल्या, कैकेयी और मंथरा तक के महिला पात्रों को भी पुरुष कलाकार अपने अभिनय से जीवंत बनाते थे। राम, लक्ष्मण, भरत, रावण, हनुमान, सुग्रीव, केवट और विभीषण जैसे पात्रों की प्रस्तुति के लिए कलाकार महीनों तक अभ्यास करते थे। संवादों की शुद्धता, चौपाइयों का गायन, भाव-भंगिमा, वेशभूषा और मंच पर चरित्र के अनुरूप व्यवहार कलाकार की पहचान बनते थे।

उस समय किसी कलाकार की प्रशंसा उसके अभिनय, संवाद अदायगी और धार्मिक प्रसंग को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के आधार पर होती थी। हनुमान का किरदार निभाने वाला कलाकार जब अपनी भक्ति, वीरता और समर्पण से दर्शकों को भावविभोर करता था, तो पूरा पंडाल जय श्रीराम और जय बजरंगबली के जयकारों से गूंज उठता था। रावण की गर्जना, राम का मर्यादित व्यक्तित्व, सीता का धैर्य और केवट की भक्ति दर्शकों के मन में गहरी छाप छोड़ते थे।

लेकिन वक्त एक जगह ठहरता नहीं है। समाज में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी, मंचीय परंपराएं बदलीं और रामलीला के आयोजन भी नए प्रयोगों से गुजरने लगे।

जब मंच पर आई नारी, बदली रामलीला की तस्वीर

आज अनेक रामलीला समितियों में महिलाएं और युवतियां विभिन्न भूमिकाओं में सक्रिय दिखाई देती हैं। वे केवल महिला पात्रों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अभिनय, गायन, निर्देशन, मंच संचालन और आयोजन प्रबंधन में भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही हैं। यह बदलाव महिला सशक्तीकरण और सांस्कृतिक भागीदारी की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

इसी बदलते परिवेश में पर्वतीय क्षेत्रों की कुछ रामलीलाओं में शूर्पणखा का किरदार विशेष चर्चा का विषय बनकर उभरा है। उत्तराखंड के पर्वतीय समाज से जुड़ी रामलीलाओं के वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित होते हैं, तो कई बार शूर्पणखा का अभिनय दर्शकों का विशेष ध्यान खींच लेता है। कलाकार की भाव-भंगिमा, संवाद, हास्य, नाटकीय अंदाज और मंच पर उसकी उपस्थिति चर्चा का केंद्र बन जाते हैं।

कभी जिस रामलीला में दर्शक राम के वनवास, सीता स्वयंवर और हनुमान की वीरता को देखने के लिए उत्सुक रहते थे, आज उसी रामलीला के कुछ वीडियो में शूर्पणखा का किरदार सोशल मीडिया पर अधिक लोकप्रिय दिखाई देता है। यह परिवर्तन केवल अभिनय की पसंद का विषय नहीं, बल्कि दर्शकों के बदलते व्यवहार और डिजिटल युग की नई संस्कृति का संकेत भी है।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि हर पर्वतीय रामलीला में ऐसा ही हो या शूर्पणखा ही सबसे अधिक लोकप्रिय हो, ऐसा कोई सार्वभौमिक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसी तरह मैदानी क्षेत्रों की रामलीलाओं में भी महिला कलाकारों की भूमिका को एक समान मानना उचित नहीं होगा। अलग-अलग स्थानों पर मंचन की परंपराएं और दर्शकों की रुचियां अलग हो सकती हैं।

आखिर शूर्पणखा के किरदार में ऐसा क्या है?

रामायण की कथा में शूर्पणखा एक ऐसा पात्र है, जिसके माध्यम से आकर्षण, इच्छा, अस्वीकार, अपमान, क्रोध और उसके बाद उत्पन्न होने वाली घटनाओं की एक महत्वपूर्ण कड़ी सामने आती है। पंचवटी में राम और लक्ष्मण से उसका सामना, विवाह का प्रस्ताव और लक्ष्मण द्वारा उसकी नाक काटे जाने का प्रसंग आगे चलकर सीता हरण और राम-रावण संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार करता है।

नाटकीय दृष्टि से देखें तो शूर्पणखा का किरदार कलाकार को भावों की अनेक परतें प्रस्तुत करने का अवसर देता है। उसमें हास्य भी है, नाटकीयता भी, संवादों में उतार-चढ़ाव भी और दर्शकों को बांधे रखने की क्षमता भी। यही कारण है कि कुशल कलाकार इस भूमिका को प्रभावशाली बना सकता है।

आज यदि कोई युवती शूर्पणखा का किरदार निभाकर लोकप्रिय हो रही है, तो उसे केवल इस आधार पर नहीं परखा जाना चाहिए कि उसने रामलीला में कौन-सी भूमिका चुनी। उसके अभिनय, मेहनत, संवादों की समझ और मंचीय प्रतिभा का मूल्यांकन होना चाहिए। किसी पात्र का चयन अपने आप में कलाकार के चरित्र या सामाजिक सोच का प्रमाण नहीं है।

यहीं से एक नया सवाल पैदा होता है—क्या आज शूर्पणखा की लोकप्रियता उसके अभिनय की वजह से बढ़ रही है, या उसके किरदार में मौजूद नाटकीयता को सोशल मीडिया अधिक तेजी से लोगों तक पहुंचा रहा है?

सोशल मीडिया ने बदल दिया लोकप्रियता का पैमाना

पहले रामलीला का प्रभाव मुख्य रूप से उसी मैदान, कस्बे या गांव तक सीमित रहता था, जहां उसका मंचन होता था। दर्शक रातभर बैठकर पूरा प्रसंग देखते थे। कलाकार की लोकप्रियता उसके अभिनय और लोगों के बीच उसकी प्रतिष्ठा से बनती थी।

अब मोबाइल फोन ने मंच और दर्शक के बीच की दूरी समाप्त कर दी है। कुछ मिनट का वीडियो हजारों लोगों तक पहुंच सकता है, जबकि घंटों की उत्कृष्ट प्रस्तुति भी संभव है कि उतनी चर्चा न पा सके। वीडियो के छोटे अंश, आकर्षक संवाद, हास्यपूर्ण दृश्य और नाटकीय अभिव्यक्तियां तेजी से साझा की जाती हैं। कई बार किसी कलाकार की पहचान उसके पूरे अभिनय से नहीं, बल्कि कुछ सेकंड के वायरल दृश्य से बनने लगती है।

यही डिजिटल दौर का विरोधाभास है। राम के आदर्शों पर आधारित लंबा प्रसंग देखने के लिए दर्शक को समय देना पड़ता है, जबकि शूर्पणखा के किसी नाटकीय संवाद का छोटा वीडियो तुरंत मनोरंजन उपलब्ध करा देता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि दर्शकों की धार्मिक आस्था समाप्त हो गई है। संभव है कि वही दर्शक रामलीला में राम के वनवास और हनुमान की भक्ति से भावनात्मक रूप से जुड़ते हों, लेकिन मोबाइल पर मनोरंजक दृश्य अधिक साझा करते हों। किसी वीडियो की लोकप्रियता और किसी प्रसंग के धार्मिक महत्व को एक ही तराजू पर तौलना उचित नहीं होगा।

आज की नारी, शूर्पणखा पर भारी!

इस शीर्षक का आशय केवल इतना नहीं कि आज महिलाएं शूर्पणखा का किरदार निभाकर सुर्खियां बटोर रही हैं। इसके पीछे बदलते समाज की एक बड़ी तस्वीर भी दिखाई देती है। पहले महिलाओं की सार्वजनिक मंचों पर भागीदारी अनेक स्थानों पर सीमित थी। अब वे अपनी पसंद से भूमिका चुन रही हैं, मंच पर अपनी प्रतिभा दिखा रही हैं और दर्शकों की प्रशंसा प्राप्त कर रही हैं।

यह बदलाव महिला स्वतंत्रता और आत्मविश्वास की दिशा में सकारात्मक संकेत हो सकता है। नारी को केवल सीता, कौशल्या या मंदोदरी जैसे पात्रों तक सीमित रखना भी उचित नहीं। वह शूर्पणखा की जटिल भूमिका निभा सकती है, कैकेयी के मनोविज्ञान को समझ सकती है और आवश्यकता हो तो राम या लक्ष्मण जैसे पुरुष पात्रों का अभिनय भी कर सकती है।

अभिनय में पात्र निभाना और वास्तविक जीवन में उस पात्र के विचारों का समर्थन करना दो अलग बातें हैं। किसी महिला कलाकार को शूर्पणखा की भूमिका निभाने के कारण कमतर आंकना उसी स्वतंत्रता के विरुद्ध होगा, जिसका स्वागत हम मंच पर महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के रूप में करते हैं।

लेकिन इस बदलाव के साथ एक जिम्मेदारी भी जुड़ी है। महिलाओं की लोकप्रियता को केवल उनके पहनावे, हाव-भाव या किसी वायरल दृश्य तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उनके अभ्यास, अभिनय कौशल और सांस्कृतिक योगदान को भी उतनी ही जगह मिलनी चाहिए।

पर्वतीय रामलीला की अपनी पहचान

उत्तराखंड की पर्वतीय रामलीलाओं की अपनी सांस्कृतिक विशेषताएं हैं। स्थानीय बोली, लोकसंगीत, गायन शैली, संवादों की प्रस्तुति और सामुदायिक सहभागिता इन्हें विशिष्ट पहचान देते हैं। यहां रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप और सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है।

यदि पर्वतीय क्षेत्रों में शूर्पणखा की भूमिकाएं चर्चा में आ रही हैं, तो इसे स्थानीय मंचीय प्रयोगों और बदलती दर्शक रुचि के संदर्भ में भी समझना चाहिए। यह आवश्यक नहीं कि इसका कारण केवल महिलाओं को प्राथमिकता देना हो। निर्देशक की कल्पना, कलाकार की लोकप्रियता, मंचन की शैली, स्थानीय हास्य और सोशल मीडिया पर वीडियो के प्रसार जैसे कई कारण इसमें भूमिका निभा सकते हैं।

मैदानी क्षेत्रों की रामलीलाओं और पर्वतीय रामलीलाओं के बीच तुलना करते समय भी सावधानी जरूरी है। कहीं पारंपरिक शैली अधिक प्रभावी है, तो कहीं आधुनिक मंच तकनीक और नए अभिनय प्रयोग लोकप्रिय हैं। भारतीय रामलीला की विविधता ही उसकी शक्ति है।

परंपरा और परिवर्तन के बीच संतुलन जरूरी

समाज में परिवर्तन स्वाभाविक है। हर नई पीढ़ी अपनी अभिव्यक्ति के नए रास्ते खोजती है। यदि रामलीला में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है, तो इसका स्वागत होना चाहिए। यदि कोई कलाकार शूर्पणखा के किरदार से दर्शकों को आकर्षित कर रहा है, तो उसके अभिनय की प्रशंसा की जानी चाहिए। लेकिन रामलीला की सफलता को केवल वायरल वीडियो, भीड़ या सोशल मीडिया की प्रतिक्रियाओं से तय करना सांस्कृतिक परंपरा के साथ न्याय नहीं होगा।

रामलीला का वास्तविक उद्देश्य राम के आदर्शों, सत्य, मर्यादा, त्याग, सेवा, भाईचारे और अधर्म पर धर्म की विजय के संदेश को जीवंत रखना है। शूर्पणखा का प्रसंग भी इसी कथा का हिस्सा है और उसकी नाटकीय भूमिका का अपना महत्व है। लेकिन दर्शकों और आयोजकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि मनोरंजन की चमक में कथा का मूल संदेश पीछे न छूट जाए।

राम का वनवास, भरत का त्याग, केवट की भक्ति, हनुमान का समर्पण, सीता का धैर्य और रावण के अहंकार का अंत—ये सभी प्रसंग आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। आधुनिक तकनीक का उपयोग इन प्रसंगों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए किया जा सकता है।

नारी को मंच मिले, संस्कृति को सम्मान

आज की रामलीला हमें बता रही है कि समाज बदल रहा है और उसके साथ कला की अभिव्यक्ति भी बदल रही है। महिलाओं का मंच पर आना, अपनी पसंद की भूमिकाएं निभाना और दर्शकों के बीच पहचान बनाना एक महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव है। शूर्पणखा का किरदार यदि आज चर्चा में है, तो इसके पीछे अभिनय की क्षमता, नाटकीय आकर्षण और सोशल मीडिया की भूमिका को समझना होगा।

आज की नारी शूर्पणखा बनकर भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकती है और सीता बनकर भी मर्यादा का संदेश दे सकती है। उसकी पहचान किसी एक किरदार से नहीं, बल्कि उसकी कला, आत्मविश्वास और स्वतंत्र अभिव्यक्ति से होनी चाहिए।

रामलीला के मंच पर शूर्पणखा की लोकप्रियता एक बदलते समय की तस्वीर हो सकती है, लेकिन रामलीला की आत्मा आज भी वही है—अच्छाई की विजय, अहंकार का अंत और मानवीय मूल्यों की स्थापना।

समय की मांग है कि परंपरा को संजोया जाए, महिलाओं की प्रतिभा को प्रोत्साहन मिले और सोशल मीडिया की लोकप्रियता के बीच रामलीला का सांस्कृतिक उद्देश्य भी जीवित रहे। क्योंकि किसी भी समाज की असली पहचान केवल इस बात से नहीं बनती कि उसके मंच पर कौन-सा किरदार सबसे अधिक लोकप्रिय हुआ, बल्कि इस बात से बनती है कि उस मंच से समाज ने क्या सीखा।

अवतार सिंह बिष्ट
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर