प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार के 12 वर्ष पूरे होना भारतीय लोकतंत्र की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि है। लगातार तीन कार्यकालों तक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में बने रहना, देशव्यापी जनसमर्थन प्राप्त करना और शासन के अनेक क्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ना किसी भी नेता के लिए साधारण बात नहीं है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को बधाई दी जानी चाहिए।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
पिछले 12 वर्षों में देश ने आधारभूत संरचना, डिजिटल सेवाओं, राजमार्गों, रेलवे, रक्षा, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, वित्तीय समावेशन और वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती उपस्थिति जैसे अनेक क्षेत्रों में बदलाव देखे हैं। उत्तराखंड भी इससे अछूता नहीं रहा। चारधाम ऑल वेदर रोड, रेल परियोजनाएं, धार्मिक पर्यटन का विस्तार, हवाई संपर्क में वृद्धि और निवेश संबंधी पहलों को सरकार अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत करती है।
लेकिन लोकतंत्र केवल उपलब्धियों का उत्सव मनाने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ सवाल पूछना भी है। और उत्तराखंड की जनता आज एक ऐसा ही सवाल पूछ रही है—क्या राज्य निर्माण के समय जो सपने दिखाए गए थे, वे पूरे हुए?
यह प्रश्न किसी एक सरकार से नहीं, बल्कि पिछले 25 वर्षों की पूरी राजनीतिक व्यवस्था से है। लेकिन चूंकि आज सत्ता में भाजपा है और केंद्र तथा राज्य दोनों जगह उसकी सरकारें हैं, इसलिए सबसे अधिक जवाबदेही भी उसी की बनती है।
उत्तराखंड केवल एक प्रशासनिक इकाई बनाने के लिए नहीं बना था। यह राज्य आंदोलन हजारों लोगों के संघर्ष, बलिदान और जनभावनाओं का परिणाम था। राज्य की मूल अवधारणा स्पष्ट थी—पलायन रोकना, स्थानीय युवाओं को रोजगार देना, पर्वतीय क्षेत्रों का संतुलित विकास करना, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को गांवों तक पहुंचाना तथा स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों का अधिकार सुनिश्चित करना।
आज लगभग ढाई दशक बाद यदि हम ईमानदारी से स्थिति का मूल्यांकन करें तो तस्वीर उतनी उत्साहजनक नहीं दिखाई देती जितनी सरकारी विज्ञापनों और राजनीतिक भाषणों में प्रस्तुत की जाती है।
उत्तराखंड के हजारों गांव खाली हो चुके हैं या खाली होने की कगार पर हैं। जिन गांवों में कभी बच्चों की आवाजें गूंजती थीं, वहां आज ताले लटके हैं। जिन खेतों में कभी फसलें लहलहाती थीं, वहां झाड़ियां उग रही हैं। जिन घरों में पीढ़ियां रहती थीं, वहां अब केवल यादें बची हैं।
राज्य बनने का सबसे बड़ा उद्देश्य था कि पहाड़ का युवा रोजगार के लिए दिल्ली, चंडीगढ़, मुंबई और दूसरे महानगरों की ओर पलायन करने को मजबूर न हो। लेकिन आज भी स्थिति यही है कि बड़ी संख्या में युवा बेहतर अवसरों की तलाश में राज्य से बाहर जा रहे हैं।
सरकारें निवेश सम्मेलन आयोजित करती हैं। निवेश के बड़े-बड़े आंकड़े प्रस्तुत किए जाते हैं। हजारों करोड़ रुपये के एमओयू की घोषणाएं होती हैं। लेकिन आम युवा का प्रश्न सरल है—इन निवेशों से स्थानीय लोगों को स्थायी रोजगार कितना मिला?
यदि रोजगार की स्थिति वास्तव में संतोषजनक होती, तो गांव खाली क्यों होते?
यदि अवसर पर्याप्त होते, तो परिवार बिखर क्यों रहे होते?
यदि विकास संतुलित होता, तो पहाड़ और मैदान के बीच असमानता लगातार क्यों बढ़ रही होती?
उत्तराखंड की राजनीति में एक और दिलचस्प प्रवृत्ति दिखाई देती है। यहां रिकॉर्ड बनाने और रिकॉर्ड तोड़ने की चर्चा खूब होती है। मुख्यमंत्री कितने समय तक पद पर रहे, कौन नेता कितने वर्षों तक किसी पद पर बना रहा, किसने कौन सा राजनीतिक कीर्तिमान स्थापित किया—इन विषयों पर विस्तृत बहस होती है।
लेकिन जनता पूछती है कि रिकॉर्ड किसलिए?
यदि गांव खाली हो रहे हैं, तो रिकॉर्ड किस काम का?
यदि किसान खेती छोड़ रहा है, तो रिकॉर्ड किस काम का?
यदि युवा बेरोजगार है, तो रिकॉर्ड किस काम का?
यदि पहाड़ की महिलाएं आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही हैं, तो रिकॉर्ड किस काम का?
लोकतंत्र में किसी पद पर लंबे समय तक बने रहना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन जनता अंततः परिणाम देखती है।
उत्तराखंड की कृषि स्थिति भी गंभीर चिंतन का विषय है। राज्य में “खेत बचाओ” जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं। कृषि के संरक्षण की बातें की जा रही हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि खेती लगातार संकट में है।
पर्वतीय क्षेत्रों में खेती छोड़ने वालों की संख्या बढ़ रही है। जंगली जानवरों का आतंक किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। बंदर, सूअर और अन्य वन्यजीव फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। सिंचाई की समस्या अलग है। बाजार तक पहुंच सीमित है। लागत बढ़ रही है और लाभ घट रहा है।
ऐसे में केवल नारे खेती को नहीं बचा सकते।
यदि किसान आर्थिक रूप से सुरक्षित नहीं होगा तो खेती भी सुरक्षित नहीं होगी।
आज उत्तराखंड के सामने सबसे बड़ा प्रश्न खेत बचाने का नहीं, किसान बचाने का है।
उत्तराखंड का भू-कानून और मूल निवास का प्रश्न भी लंबे समय से जनभावनाओं के केंद्र में रहा है। राज्य आंदोलन के दौरान स्थानीय पहचान, संसाधनों की सुरक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण महत्वपूर्ण मुद्दे थे। आज भी बड़ी संख्या में लोग महसूस करते हैं कि इन विषयों पर अपेक्षित स्पष्टता और प्रभावी समाधान सामने नहीं आया है।
यही कारण है कि समय-समय पर इन मुद्दों को लेकर आंदोलन खड़े होते हैं और राजनीतिक दलों को जवाब देना पड़ता है।
शिक्षा के क्षेत्र में भी कई प्रश्न हैं।
सरकारी विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या लगातार घटने की खबरें आती रहती हैं। अनेक विद्यालयों में शिक्षक नहीं हैं या पर्याप्त संख्या में नहीं हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं के सामने रोजगार की अनिश्चितता बनी रहती है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में भी स्थिति मिश्रित है।
शहरी क्षेत्रों में सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में आज भी विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी महसूस की जाती है। गंभीर बीमारी की स्थिति में लोगों को बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है।
यदि राज्य निर्माण का उद्देश्य अंतिम व्यक्ति तक सुविधाएं पहुंचाना था, तो यह स्वीकार करना होगा कि अभी बहुत लंबा रास्ता तय किया जाना बाकी है।
उत्तराखंड में पर्यटन को विकास का प्रमुख आधार बनाया गया है। पर्यटन महत्वपूर्ण है और राज्य की अर्थव्यवस्था में उसका योगदान भी है। लेकिन क्या केवल पर्यटन ही विकास का मॉडल हो सकता है?
यह एक गंभीर प्रश्न है।
यदि पूरा आर्थिक ढांचा पर्यटन पर अत्यधिक निर्भर हो जाए तो स्थानीय अर्थव्यवस्था असंतुलित हो सकती है। उत्तराखंड को पर्यटन के साथ कृषि, बागवानी, औषधीय पौधों, लघु उद्योगों, जल संसाधनों, स्थानीय उत्पादों और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करना होगा।
अन्यथा राज्य सेवा प्रदाता तो बन जाएगा, लेकिन आत्मनिर्भर नहीं।
उत्तराखंड की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है। लेकिन यही युवा यदि अवसरों के अभाव में राज्य छोड़ रहा हो तो यह केवल आर्थिक समस्या नहीं बल्कि सामाजिक संकट भी है।
पलायन केवल जनसंख्या का स्थानांतरण नहीं होता। इसके साथ संस्कृति, परंपराएं, स्थानीय ज्ञान और सामाजिक संरचनाएं भी कमजोर होती हैं।
खाली गांव केवल प्रशासनिक आंकड़ा नहीं होते। वे विकास मॉडल की विफलता का संकेत भी होते हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि उत्तराखंड के विकास को केवल सड़क, भवन और पर्यटन परियोजनाओं के आधार पर न मापा जाए।
विकास का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि—
कितने गांव आबाद हुए?
कितने युवाओं को स्थानीय रोजगार मिला?
कितनी कृषि भूमि बची?
कितने किसान खेती में टिके रहे?
कितने विद्यालय मजबूत हुए?
कितने अस्पताल प्रभावी बने?
कितनी महिलाओं का श्रम कम हुआ?
कितने परिवारों को अपने गांव छोड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ी?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर संतोषजनक नहीं हैं, तो आत्ममंथन आवश्यक है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 वर्षों पर बधाई देना लोकतांत्रिक शिष्टाचार है। लेकिन बधाई के साथ यह अपेक्षा भी जुड़ी हुई है कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों की विशिष्ट समस्याओं पर अधिक गंभीरता से ध्यान दिया जाए।
उत्तराखंड कोई सामान्य राज्य नहीं है। इसकी भौगोलिक परिस्थितियां अलग हैं, सामाजिक संरचना अलग है और विकास की चुनौतियां भी अलग हैं।
यहां विकास का अर्थ केवल निवेश आकर्षित करना नहीं है।
यहां विकास का अर्थ है गांव बचाना।
यहां विकास का अर्थ है खेत बचाना।
यहां विकास का अर्थ है स्थानीय युवाओं को सम्मानजनक रोजगार देना।
यहां विकास का अर्थ है पलायन रोकना।
यहां विकास का अर्थ है राज्य आंदोलन के मूल सपनों को सम्मान देना।
आज जब राजनीतिक रिकॉर्डों की चर्चा हो रही है, तब उत्तराखंड की जनता एक और रिकॉर्ड देखना चाहती है—ऐसा रिकॉर्ड जिसमें सबसे अधिक गांव पुनर्जीवित हों, सबसे अधिक युवाओं को स्थानीय रोजगार मिले, सबसे अधिक कृषि भूमि संरक्षित हो और सबसे अधिक पलायन रुके।
यदि आने वाले वर्षों में यह रिकॉर्ड बनता है, तभी उत्तराखंड राज्य निर्माण का सपना वास्तव में सार्थक कहा जाएगा।
अन्यथा इतिहास यह अवश्य पूछेगा कि राजनीतिक उपलब्धियों के उत्सव के बीच उत्तराखंड के मूल सपनों का क्या हुआ। :::
