वन ग्राम पुछड़ी से रुद्रपुर तक सरकारी जमीनों का सवाल: छोटे कब्जाधारियों पर कार्रवाई, हजारों करोड़ की संपत्तियों पर खामोशी क्यों?
सरकार का दोहरा मापदंड, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और नौकरशाही की भूमिका पर उठते सवाल; धार्मिक आस्था की आड़ से लेकर रिजॉर्ट और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स तक सरकारी जमीनों के उपयोग की निष्पक्ष जांच की मांग
अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर
रुद्रपुर/रामनगर।उत्तराखंड में सरकारी और वन भूमि पर अतिक्रमण का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। रामनगर के वन ग्राम पुछड़ी में वन भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर जंगल की जमीन पर बस्तियां बसने तक वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी क्या कर रहे थे? यदि वर्षों तक वन भूमि पर खेती के नाम पर कब्जे होते रहे और बाद में उन्हीं जमीनों पर पक्के मकान खड़े हो गए, तो उस समय जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?
पुछड़ी की कहानी केवल अतिक्रमण हटाने तक सीमित नहीं है। यह सरकारी जमीनों की निगरानी, प्रशासनिक जवाबदेही और भू-माफिया के कथित प्रभाव का भी सवाल है। उपलब्ध स्थानीय विवरणों के अनुसार वर्ष 2011 के बाद पुछड़ी में अतिक्रमण का स्वरूप तेजी से बदला। पहले वन भूमि पर खेती के रूप में कब्जे बताए जाते थे, लेकिन धीरे-धीरे वहां पक्के भवन बनने लगे। आरोप हैं कि स्टांप और सादे कागजों पर जमीन के सौदे होते रहे। बाहरी क्षेत्रों से भी लोग आकर बसते गए। इस पूरी प्रक्रिया में वन विभाग की तत्कालीन कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठते हैं।
सबसे बड़ा सवाल उन गरीब परिवारों का है जिन्होंने अपनी जीवनभर की कमाई लगाकर इन जमीनों पर मकान बनाए या खरीदे। आज जब कार्रवाई हो रही है तो उन्हें बेघर होने का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी ओर, जिन लोगों ने कथित तौर पर सरकारी जमीन के अवैध सौदों से पैसा कमाया, उनकी भूमिका और संपत्ति की जांच भी उतनी ही जरूरी है। प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जमीन बेचने वाले कथित बिचौलियों और भू-माफिया के विरुद्ध क्या कार्रवाई हुई?
लेकिन उत्तराखंड में सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण की बहस केवल पुछड़ी तक सीमित रखना भी अधूरा नजरिया होगा। उधम सिंह नगर के जिला मुख्यालय रुद्रपुर में भी नजूल, तालाब, जल निकायों, सरकारी और अन्य सार्वजनिक उपयोग की जमीनों को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।
रुद्रपुर में आरोप लगते रहे हैं कि सरकारी और सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर आलीशान भवन, रिजॉर्ट, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और व्यावसायिक प्रतिष्ठान खड़े हो गए। कुछ स्थानों पर धार्मिक स्थल के नाम पर जमीन के उपयोग और कब्जे को लेकर भी सवाल उठाए जाते रहे हैं। धार्मिक आस्था का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन सार्वजनिक भूमि की वैधानिक स्थिति और उसके उपयोग के नियम सभी के लिए समान होने चाहिए। किसी भी धार्मिक, सामाजिक या व्यावसायिक गतिविधि को सरकारी जमीन पर अधिकार का स्वतः प्रमाण नहीं माना जा सकता।
शिवनगर मोड़ के पास तालाब की भूमि से संबंधित एक कथित बड़े भूमि प्रकरण में लगभग 500 करोड़ रुपये की संपत्ति और रजिस्ट्री को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी तरह रुद्रपुर में सरकारी, नजूल और अन्य सार्वजनिक भूमि पर कथित कब्जों का कुल मूल्य लगभग एक हजार करोड़ रुपये तक होने के दावे भी सामने रखे जाते रहे हैं। धार्मिक स्थलों के नाम पर इस्तेमाल हो रही कुछ जमीनों का मूल्य भी सैकड़ों करोड़ रुपये बताए जाने के दावे हैं। हालांकि इन आंकड़ों और आरोपों की स्वतंत्र राजस्व अभिलेखों, रजिस्ट्री दस्तावेजों तथा न्यायिक या प्रशासनिक जांच से पुष्टि होना आवश्यक है।
सवाल केवल कब्जे का नहीं, संरक्षण देने वालों का भी है
यदि किसी गरीब व्यक्ति ने सरकारी भूमि पर झोपड़ी या छोटा मकान बनाया है तो प्रशासन बुलडोजर लेकर पहुंच जाता है। यह कार्रवाई कानून के अनुसार उचित हो सकती है, लेकिन फिर वही कानून उन प्रभावशाली लोगों पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए जिन पर करोड़ों रुपये की सरकारी जमीन पर कब्जा करने, प्लॉटिंग कराने, व्यावसायिक निर्माण करने या अवैध रजिस्ट्री कराने के आरोप हैं।
क्या प्रशासन ने कभी यह सार्वजनिक किया कि रुद्रपुर में सरकारी जमीनों पर हुए कथित बड़े कब्जों में किन लोगों को नोटिस दिए गए? कितनी जमीन वापस ली गई? कितने मामलों में प्राथमिकी दर्ज हुई? कितने अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय हुई? यदि किसी पूर्व जनप्रतिनिधि, प्रभावशाली कारोबारी या अधिकारी का नाम किसी प्रकरण में सामने आता है तो क्या उसकी भी उसी निष्पक्षता से जांच होगी, जिस तरह सामान्य नागरिक के मामले में कार्रवाई की जाती है?
सरकारी जमीन पर कब्जा करने वाला व्यक्ति किसी भी वर्ग, समुदाय, राजनीतिक दल या आर्थिक हैसियत का हो, कानून की नजर में उसके साथ समान व्यवहार होना चाहिए। न गरीब को संरक्षण के नाम पर अवैध कब्जे का अधिकार मिल सकता है और न रसूखदार को राजनीतिक या प्रशासनिक पहुंच के कारण सरकारी जमीन पर मालिकाना हक।
जनप्रतिनिधि, नौकरशाह और भू-माफिया के कथित गठजोड़ की जांच जरूरी
रुद्रपुर सहित उधम सिंह नगर में भूमि संबंधी विवादों के बीच एक गंभीर आशंका यह भी व्यक्त की जाती रही है कि कुछ मामलों में भू-माफिया को स्थानीय स्तर पर राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक सहयोग मिला होगा। यदि ऐसा हुआ है तो यह केवल जमीन पर अवैध कब्जे का मामला नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही का विषय है।
पूर्व और वर्तमान जनप्रतिनिधियों की भूमिका, संबंधित विभागों के अधिकारियों के निर्णय, भूमि की रजिस्ट्री, दाखिल-खारिज, नक्शे, भूमि उपयोग परिवर्तन और निर्माण की स्वीकृतियों की जांच एक स्वतंत्र एजेंसी से कराई जानी चाहिए। जिन अधिकारियों ने वर्षों तक कथित अवैध निर्माणों को नहीं रोका, उनकी भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।
यह भी जांच होनी चाहिए कि जिन जमीनों को तालाब, नजूल, वन भूमि, सरकारी रास्ते या अन्य सार्वजनिक उपयोग के लिए दर्ज किया गया था, उनका स्वरूप किस प्रक्रिया के तहत बदला गया। यदि कहीं नियमों के विरुद्ध रजिस्ट्री या निर्माण हुआ है तो उसे केवल वर्तमान कब्जाधारी तक सीमित न रखकर पूरी प्रक्रिया और उससे लाभ उठाने वाले सभी पक्षों की पड़ताल होनी चाहिए।
सरकार से पांच बड़े सवाल
पुछड़ी में कार्रवाई के साथ रुद्रपुर और पूरे उधम सिंह नगर की सरकारी भूमि का निष्पक्ष सर्वेक्षण क्यों नहीं कराया जाता? जिन लोगों ने सरकारी जमीन के कथित अवैध सौदों से करोड़ों रुपये कमाए, उनकी संपत्तियों की जांच कब होगी? तालाब और जल निकायों की जमीन पर हुए कथित कब्जों को चिह्नित कर उन्हें पुनर्जीवित करने की योजना क्या है? सरकारी जमीन की रजिस्ट्री या दाखिल-खारिज में संलिप्त पाए जाने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों पर क्या कार्रवाई होगी? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या सरकार बड़े कब्जाधारियों तथा प्रभावशाली लोगों के विरुद्ध भी उसी दृढ़ता से कार्रवाई करेगी, जैसी कार्रवाई छोटे कब्जाधारियों के विरुद्ध दिखाई देती है?
कार्रवाई का पैमाना रसूख नहीं, कानून होना चाहिए
उत्तराखंड की जनता को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें सरकारी जमीन की रक्षा केवल गरीब की झोपड़ी हटाकर पूरी न मानी जाए। वन भूमि हो, नजूल भूमि हो, तालाब हो, नदी-नाले हों या धार्मिक और सार्वजनिक उपयोग की जमीन, सभी की कानूनी स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।
पुछड़ी में यदि वन विभाग की पुरानी लापरवाही सामने आती है तो तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों की जांच होनी चाहिए। इसी तरह रुद्रपुर में यदि बड़े पैमाने पर सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे, गलत रजिस्ट्री या नियम विरुद्ध निर्माण के प्रमाण मिलते हैं तो उन मामलों में भी कार्रवाई होनी चाहिए।
सरकार को एक ऐसी उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच समिति गठित करनी चाहिए जो पिछले 15 से 20 वर्षों में सरकारी भूमि के हस्तांतरण, रजिस्ट्री, कब्जे और निर्माण की पड़ताल करे। जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हो और दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई हो।
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता की संपत्ति के संरक्षक होते हैं, मालिक नहीं। नौकरशाही का दायित्व कानून लागू करना है, किसी प्रभावशाली व्यक्ति के हितों की रक्षा करना नहीं। यदि सरकारी जमीनों पर कब्जे के मामलों में प्रभावशाली लोगों को संरक्षण मिलने के आरोप हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच ही जनता का भरोसा बहाल कर सकती है।
आखिर सवाल सीधा है—पुछड़ी में गरीब की छत गिराने के लिए प्रशासन की पूरी ताकत लग सकती है, तो रुद्रपुर में करोड़ों की सरकारी जमीनों पर कथित कब्जों की जांच और कार्रवाई के लिए वही ताकत कब दिखाई देगी? कानून का बुलडोजर सबके लिए एक समान चलेगा या उसकी दिशा रसूख देखकर तय होगी?
