SIR पर देशव्यापी सियासी संग्राम: 200 से अधिक संगठनों का विरोध, जवाब में BJP की पदयात्रा; उत्तराखंड में भी मतदाता सूची पर बढ़ सकती है बहस


23 अक्टूबर को ‘पीपल अगेंस्ट SIR’ के आंदोलन का आह्वान, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग; भाजपा 31 अक्टूबर तक चलाएगी जनसंपर्क अभियान
नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर देश की राजनीति में टकराव तेज हो गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका और SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए ‘पीपल अगेंस्ट SIR’ गठबंधन ने 23 अक्टूबर को देशव्यापी विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है।

अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर

आयोजकों का दावा है कि इस आंदोलन में 200 से अधिक संगठन हिस्सा लेंगे। उनकी प्रमुख मांग है कि SIR प्रक्रिया को तत्काल रद्द किया जाए और मुख्य चुनाव आयुक्त इस्तीफा दें। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने विपक्ष के आरोपों का जवाब देने के लिए ‘लोकतंत्र बचाओ, भीड़तंत्र हटाओ’ अभियान के तहत 23 से 31 अक्टूबर तक देशभर में पदयात्राएं और जनसंपर्क कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई है।
इस घटनाक्रम ने मतदाता सूची की शुद्धता, मतदाताओं के अधिकार, निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता और चुनाव आयोग की जवाबदेही को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। एक तरफ आंदोलनकारी संगठन SIR की प्रक्रिया को लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए चुनौती बता रहे हैं, वहीं भाजपा इसे लेकर उठ रहे सवालों का राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर जवाब देने की तैयारी में है।
‘हर हाथ में तिरंगा, हर गली में जंतर-मंतर’ का नारा
‘पीपल अगेंस्ट SIR’ गठबंधन ने अपने आंदोलन के लिए ‘हर हाथ में तिरंगा, हर गली में जंतर-मंतर’ का नारा दिया है। आयोजकों का उद्देश्य छात्रों, युवाओं, किसानों, मजदूरों, महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, दिव्यांगों और ट्रांसजेंडर समुदाय सहित समाज के विभिन्न वर्गों को इस अभियान से जोड़ना है।
आंदोलन की पृष्ठभूमि में 14 अक्टूबर को दिल्ली में हुई एक बैठक का उल्लेख किया जा रहा है, जिसमें विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने मिलकर साझा मंच बनाने और विरोध को देशव्यापी स्वरूप देने पर सहमति जताई थी। आयोजकों के अनुसार, यह अभियान केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विभिन्न राज्यों में भी प्रदर्शन आयोजित करने की योजना है।
इस आंदोलन का प्रमुख मुद्दा मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया और उसके संभावित प्रभाव हैं। विरोध करने वाले संगठनों का तर्क है कि पुनरीक्षण के दौरान किसी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची से नहीं हटना चाहिए और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष तथा आसानी से समझ में आने वाली होनी चाहिए। हालांकि, SIR को रद्द करने और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग आंदोलनकारी संगठनों का राजनीतिक रुख है; इसे किसी न्यायिक या संवैधानिक प्राधिकरण का स्थापित निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
पराकला प्रभाकर सहित कई चर्चित चेहरे
आंदोलन को समर्थन देने वालों में राजनीतिक अर्थशास्त्री पराकला प्रभाकर का नाम भी शामिल बताया गया है। वह केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति हैं। उपलब्ध कराए गए विवरण के अनुसार, उन्होंने सोशल मीडिया मंच X पर 23 अक्टूबर को लोकतंत्र की बहाली के लिए जनमार्च में भागीदारी का आह्वान किया।
आंदोलन के प्रचार से जुड़े पोस्टरों में अभिनेता प्रकाश राज, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, किसान नेता राकेश टिकैत, सामाजिक कार्यकर्ता तुषार गांधी, अभिजीत दीपके, नेहा बोरा और छात्र नेता आईशे घोष सहित कई चर्चित नामों का उल्लेख किया गया है। इन हस्तियों की मौजूदगी आंदोलन को सार्वजनिक चर्चा में प्रमुखता दे सकती है, हालांकि सभी की वास्तविक भागीदारी और अलग-अलग स्थानों पर कार्यक्रमों की स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
दिल्ली में किसी भी बड़े जुलूस या सार्वजनिक सभा के आयोजन के लिए प्रशासनिक अनुमति और लागू प्रतिबंधों का पालन महत्वपूर्ण होगा। इसलिए आंदोलन का वास्तविक स्वरूप इस बात पर भी निर्भर करेगा कि किन स्थानों पर कार्यक्रमों को अनुमति मिलती है और आयोजक निर्धारित नियमों के अंतर्गत किस तरह अपनी बात रखते हैं।
दिल्ली में सुरक्षा और प्रशासनिक पाबंदियां
राजधानी दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों को लेकर सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक प्रतिबंधों का मुद्दा भी चर्चा में है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, नई दिल्ली जिले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत प्रतिबंध लागू होने का उल्लेख किया गया है। इस धारा के अंतर्गत जारी आदेशों की वास्तविक शर्तों के अनुसार सार्वजनिक सभाओं, जुलूसों और अन्य गतिविधियों पर रोक या नियंत्रण लगाया जा सकता है।
ऐसी स्थिति में आयोजकों को संबंधित प्रशासन से अनुमति लेने और लागू आदेशों का पालन करने की आवश्यकता होगी। किसी भी प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है, जबकि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखना नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा विषय है। दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण कसौटी है।
हालांकि, दिल्ली में पूर्व में हुई हिरासतों या गिरफ्तारियों से संबंधित दावों की पुष्टि के लिए पुलिस और प्रशासन के आधिकारिक रिकॉर्ड देखना जरूरी है। विरोध प्रदर्शन से जुड़ी किसी भी घटना की रिपोर्टिंग में हिरासत, गिरफ्तारी और न्यायिक कार्रवाई के बीच अंतर स्पष्ट रखा जाना चाहिए।
भाजपा का जवाबी अभियान: जिलों में पदयात्राओं की तैयारी
विपक्षी संगठनों के देशव्यापी आंदोलन के बीच भाजपा ने भी अपनी रणनीति तैयार की है। पार्टी की योजना 23 से 31 अक्टूबर तक ‘लोकतंत्र बचाओ, भीड़तंत्र हटाओ’ अभियान चलाने की है। इसके तहत देश के विभिन्न जिलों में पदयात्राएं निकालने और जनता के बीच पहुंचकर मतदाता सूची पुनरीक्षण पर पार्टी का पक्ष रखने की तैयारी बताई गई है।
प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार, प्रत्येक पदयात्रा में लगभग 10 हजार लोगों की भागीदारी का लक्ष्य रखा गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से SIR के संबंध में अपनी दलीलें रखेंगे। भाजपा इस अभियान के जरिए यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि मतदाता सूची को अद्यतन करना चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
इस प्रकार SIR को लेकर विवाद अब केवल निर्वाचन प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है। यह सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक विमर्श का विषय बन चुका है। आने वाले दिनों में दोनों पक्षों के अभियानों का असर जनमत और चुनावी राजनीति पर दिखाई दे सकता है।
उत्तराखंड में भी महत्वपूर्ण है मतदाता सूची का मुद्दा
उत्तराखंड के संदर्भ में भी मतदाता सूची का पुनरीक्षण महत्वपूर्ण विषय है। राज्य में देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल और ऊधम सिंह नगर जैसे जिलों में मतदाता सूची से जुड़े सवालों का सीधा संबंध चुनावी भागीदारी, नागरिकों के दस्तावेजों और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों से है। हालांकि, देशव्यापी विरोध में उत्तराखंड के किन संगठनों ने औपचारिक भागीदारी की है और राज्य में 23 अक्टूबर को कहां-कहां प्रदर्शन हुए हैं, इसकी पुष्टि संबंधित संगठनों और प्रशासन के विवरण से की जानी चाहिए।
उत्तराखंड में मतदाता सूची को लेकर चर्चा इसलिए भी अहम है क्योंकि राज्य के मैदानी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग अलग-अलग राज्यों से आकर बसे हैं। वहीं, पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार, पलायन और स्थायी निवास से जुड़े कारणों के चलते लोगों के निवास तथा मतदान संबंधी विवरणों में बदलाव हो सकता है। ऐसे में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान वास्तविक निवासियों, स्थानांतरित मतदाताओं और पात्र नागरिकों की स्थिति का सही आकलन जरूरी है।
यह सुनिश्चित करना निर्वाचन अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से न हटे और अपात्र प्रविष्टियों को नियमों के अनुसार ठीक किया जाए। यदि किसी नागरिक का नाम सूची से हटाने का प्रस्ताव हो, तो लागू प्रक्रिया के तहत उसे सूचना, आपत्ति दर्ज करने और आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने का उचित अवसर मिलना चाहिए।
उत्तराखंड में राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के सामने भी यह जिम्मेदारी है कि वे मतदाता सूची की जांच को केवल दलगत आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित न रखें। यदि किसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने या नए नाम जोड़ने को लेकर सवाल उठते हैं, तो बूथ स्तर के आंकड़ों, संबंधित आदेशों और निर्वाचन अधिकारियों के रिकॉर्ड के आधार पर तथ्य सामने लाए जाने चाहिए।
लोकतंत्र की कसौटी: पारदर्शिता और जवाबदेही
SIR पर जारी विवाद के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि मतदाता सूची को शुद्ध बनाने की प्रक्रिया किस तरह संचालित की जा रही है और उसमें नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कैसे सुनिश्चित हो रही है। चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी निष्पक्ष चुनाव कराना है। वहीं, राजनीतिक दलों और नागरिक संगठनों को भी आरोपों के साथ प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए, ताकि जनता तथ्यों के आधार पर अपनी राय बना सके।
मतदाता सूची में गलत नामों का होना चुनावी व्यवस्था के लिए समस्या हो सकता है, लेकिन पात्र नागरिकों के नाम छूट जाना भी उतनी ही गंभीर चिंता का विषय है। इसलिए पुनरीक्षण की प्रक्रिया में पारदर्शिता, समयबद्ध सुनवाई, शिकायत निवारण और सार्वजनिक जानकारी की उपलब्धता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
23 अक्टूबर का देशव्यापी आंदोलन और भाजपा का जवाबी अभियान इस बहस को नई दिशा दे सकता है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि विरोध करने वाले संगठन अपनी मांगों को लेकर कितनी व्यापक भागीदारी जुटाते हैं, भाजपा जनता के सामने कौन से तथ्य रखती है और चुनाव आयोग विवाद से जुड़े सवालों पर क्या स्पष्टीकरण देता है।
उत्तराखंड सहित पूरे देश में लोकतंत्र की मजबूती का वास्तविक पैमाना केवल राजनीतिक रैलियों की भीड़ नहीं, बल्कि यह विश्वास है कि प्रत्येक पात्र नागरिक का वोट सुरक्षित है, उसकी आवाज सुनी जाती है और चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष ढंग से संचालित होती है। यही विश्वास लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत है।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | अवतार सिंह बिष्ट | रुद्रपुर