दिल्ली होटल अग्निकांड: क्या उत्तराखंड के युवाओं को आसान निशाना बनाया जा रहा है?

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दिल्ली के मालवीय नगर स्थित होटल में लगी भीषण आग ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस दर्दनाक हादसे में 21 लोगों की मौत हुई, जिनमें विदेशी नागरिक भी शामिल थे। प्रथम दृष्टया सामने आए तथ्यों ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। बताया जा रहा है कि होटल के पास अग्निशमन विभाग की अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) नहीं थी, इमारत में प्रवेश और निकास का केवल एक रास्ता था, खिड़कियां स्थायी रूप से बंद थीं और सुरक्षा मानकों की घोर अनदेखी की गई थी। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस होटल को संचालित करने की अनुमति किसने दी?
हादसे के बाद उत्तराखंड निवासी शेफ केशव नेगी की गिरफ्तारी ने एक नई बहस को जन्म दिया है। यदि कोई व्यक्ति वास्तव में दोषी है तो कानून अपना काम करे, लेकिन यदि जांच केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित रह जाती है और होटल मालिकों, लाइसेंस जारी करने वाले अधिकारियों तथा सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी करने वाली एजेंसियों की जिम्मेदारी तय नहीं होती, तो यह न्याय की भावना के विपरीत होगा।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड


गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी द्वारा दिल्ली पुलिस आयुक्त से पूरी रिपोर्ट तलब करना इस मामले की गंभीरता को दर्शाता है। उत्तराखंड के लाखों युवा देशभर के होटल, पर्यटन, सुरक्षा, सेना, शिक्षा और सेवा क्षेत्रों में अपनी मेहनत और ईमानदारी के लिए पहचाने जाते हैं। ऐसे में किसी भी उत्तराखंडी युवक के खिलाफ कार्रवाई तथ्यों और ठोस साक्ष्यों पर आधारित होनी चाहिए, न कि केवल प्रशासनिक दबाव में की गई जल्दबाजी पर।
यह घटना तथाकथित “डबल इंजन सरकार” की जवाबदेही पर भी प्रश्न खड़े करती है। जब केंद्र और राज्य में एक ही राजनीतिक दल की सरकार हो तो जनता को बेहतर समन्वय, कड़ी निगरानी और मजबूत प्रशासन की अपेक्षा रहती है। यदि राजधानी दिल्ली में बिना आवश्यक अग्नि सुरक्षा मानकों के कोई होटल वर्षों तक संचालित होता रहा, तो यह केवल एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था की विफलता प्रतीत होती है।
दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि अक्सर बड़े हादसों के बाद छोटे कर्मचारियों या निचले स्तर के कर्मियों पर कार्रवाई दिखाई देती है, जबकि वास्तविक जिम्मेदार लोग कानूनी प्रक्रिया की जटिलताओं में बच निकलते हैं। जनता जानना चाहती है कि होटल का मालिक कौन था, सुरक्षा निरीक्षण कब हुआ, एनओसी क्यों नहीं थी, और प्रशासन ने पहले कार्रवाई क्यों नहीं की।
उत्तराखंड के लोगों का इतिहास संघर्ष, ईमानदारी और राष्ट्रसेवा का रहा है। सेना से लेकर शिक्षा, पर्यटन और प्रशासन तक, पहाड़ के लोगों ने देश निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसलिए किसी भी उत्तराखंडी युवक के साथ न्यायिक प्रक्रिया पूरी निष्पक्षता और पारदर्शिता से होनी चाहिए। दोष सिद्ध होने से पहले किसी को अपराधी घोषित करना न्याय के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है।
दिल्ली होटल अग्निकांड केवल एक आपराधिक जांच का विषय नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही, सुरक्षा मानकों की विफलता और व्यवस्था की कमजोरियों का आईना भी है। इस मामले में निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, सभी जिम्मेदार पक्षों की भूमिका सामने आनी चाहिए और पीड़ित परिवारों को न्याय मिलना चाहिए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी राज्य, क्षेत्र या समुदाय के लोगों का मनोबल बिना ठोस आधार के कार्रवाई से प्रभावित न हो।
आज जरूरत राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि सत्य को सामने लाने की है। यदि व्यवस्था दोषी है तो व्यवस्था जवाब दे, यदि अधिकारी दोषी हैं तो अधिकारी जवाब दें, और यदि कोई व्यक्ति दोषी है तो उसे कानून के अनुसार दंड मिले। न्याय का यही सिद्धांत लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।


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