हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स की मुहिम रंग लाई: मालवीय नगर अग्निकांड में जागी सरकारें, निष्पक्ष जांच की उम्मीद
मालवीय नगर अग्निकांड: सिस्टम की लापरवाही, न्याय की लड़ाई और केशव नेगी प्रकरण पर बढ़ता जनदबाव
डबल इंजन सरकार ने लिया संज्ञान: अग्निकांड पीड़ितों को श्रद्धांजलि, सत्य और न्याय की मांग हुई तेज
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
दिल्ली के मालवीय नगर में घटित भीषण अग्निकांड ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस दर्दनाक हादसे में 21 लोगों की मृत्यु, जिनमें कई विदेशी नागरिक भी शामिल बताए जा रहे हैं, केवल एक दुर्घटना नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता का भयावह उदाहरण है। जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उनके दुःख की भरपाई कभी नहीं हो सकती। हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स इस त्रासदी में जान गंवाने वाले सभी मृतकों को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है तथा शोकाकुल परिवारों के प्रति अपनी गहरी संवेदनाएं व्यक्त करता है।
यह हादसा अनेक ऐसे प्रश्न छोड़ गया है जिनका उत्तर केवल जांच एजेंसियों को नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे को देना होगा। यदि होटल बिना आवश्यक अग्नि सुरक्षा मानकों और एनओसी के संचालित हो रहा था, तो वर्षों तक उसे संरक्षण किसने दिया? आखिर वह कौन सी व्यवस्था थी जिसने लोगों की जान को जोखिम में डालकर एक असुरक्षित भवन को व्यवसायिक गतिविधियों के लिए खुला रहने दिया?
इसी बीच उत्तराखंड के निवासी केशव नेगी की गिरफ्तारी का मामला भी चर्चा के केंद्र में आ गया है। उनके परिवार तथा बड़ी संख्या में प्रवासी उत्तराखंडियों ने यह आशंका व्यक्त की है कि कहीं जांच का फोकस वास्तविक जिम्मेदार लोगों से हटकर किसी एक व्यक्ति पर केंद्रित तो नहीं हो रहा। यह चिंता स्वाभाविक है, क्योंकि जब भी कोई बड़ी दुर्घटना होती है तो जनता यह देखना चाहती है कि वास्तविक दोषियों तक कानून का हाथ पहुंचे।
यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि किसी भी व्यक्ति की दोषसिद्धि केवल न्यायालय और विधिसम्मत जांच प्रक्रिया के आधार पर ही तय हो सकती है। यदि केशव नेगी दोषी हैं तो कानून अपना कार्य करे, लेकिन यदि वे निर्दोष हैं तो उन्हें बलि का बकरा बनाने का प्रयास लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था दोनों के लिए घातक होगा। निष्पक्ष जांच ही इस पूरे प्रकरण की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
इस संदर्भ में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती Rekha Gupta से वार्ता करना और निष्पक्ष जांच की अपेक्षा व्यक्त करना महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता द्वारा यह आश्वासन दिया जाना कि किसी भी निर्दोष व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं होगा, पीड़ित परिवारों और चिंतित नागरिकों के लिए एक सकारात्मक संदेश है।
यह भी उल्लेखनीय है कि केशव नेगी की पुत्री कनिष्का नेगी की व्यथा ने समाज को भावुक किया। एक बेटी का अपने पिता के लिए न्याय मांगना केवल एक परिवार की लड़ाई नहीं बल्कि उस विश्वास की परीक्षा है जो आम नागरिक कानून और शासन व्यवस्था से रखते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में एक तथ्य विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है। जब स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया, तब जाकर सरकारों और प्रशासनिक तंत्र का ध्यान इस दिशा में केंद्रित हुआ। हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स ने लगातार इस विषय को प्रमुखता से उठाया, सवाल पूछे और जनभावनाओं को मंच प्रदान किया। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य भी यही है—सत्ता को जवाबदेह बनाना और उन आवाजों को सामने लाना जिन्हें अक्सर अनसुना कर दिया जाता है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जब लाखों लोगों की चिंता, जनमत और मीडिया की सतत निगरानी एक साथ सामने आती है तो शासन व्यवस्था को भी संवेदनशीलता दिखानी पड़ती है। यदि आज मुख्यमंत्री स्तर पर संवाद हो रहा है, यदि निष्पक्ष जांच की बात हो रही है और यदि पीड़ित परिवारों को आश्वासन मिल रहा है, तो इसमें जनदबाव और मीडिया की सक्रिय भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हालांकि इस अवसर पर आत्ममुग्धता नहीं बल्कि आत्ममंथन की आवश्यकता है। प्रश्न यह नहीं कि किसने मुद्दा उठाया, बल्कि प्रश्न यह है कि ऐसी त्रासदियां बार-बार क्यों होती हैं। दिल्ली, मुंबई, सूरत, कोलकाता और देश के अनेक शहरों में होटल, अस्पताल, कोचिंग सेंटर, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में आग लगने की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। हर हादसे के बाद जांच बैठती है, रिपोर्ट बनती है, कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई होती है और फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है—जब तक कि अगला हादसा न हो जाए।
मालवीय नगर अग्निकांड ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि कागजों पर मौजूद नियम और वास्तविक धरातल पर उनका पालन दो अलग-अलग बातें हैं। यदि किसी भवन में आपातकालीन निकास नहीं था, यदि अग्निशमन उपकरण पर्याप्त नहीं थे, यदि अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र नहीं था, तो संबंधित विभागों की जिम्मेदारी तय क्यों नहीं होनी चाहिए? क्या केवल होटल संचालक ही दोषी होगा या उन अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होगी जिन्होंने वर्षों तक आंखें मूंदे रखीं?
यहां डबल इंजन सरकार की अवधारणा भी चर्चा में आती है। जब केंद्र और राज्य में समन्वय हो, तब जनता अपेक्षा करती है कि समस्याओं का समाधान अधिक प्रभावी तरीके से होगा। यदि उत्तराखंड और दिल्ली की सरकारें इस मामले में पारदर्शी और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करती हैं तो यह लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का सकारात्मक उदाहरण होगा। लेकिन यदि जांच केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है, तो जनता का विश्वास कमजोर होगा।
आज आवश्यकता है कि जांच का दायरा व्यापक हो। केवल गिरफ्तारी कर देना समाधान नहीं है। यह पता लगाया जाना चाहिए कि होटल को लाइसेंस किस आधार पर मिला, सुरक्षा निरीक्षण कब-कब हुए, किस अधिकारी ने अनुमति दी, किसने अनियमितताओं को नजरअंदाज किया और किन परिस्थितियों में यह त्रासदी हुई।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स का स्पष्ट मत है कि मृतकों को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब इस दुर्घटना के वास्तविक कारणों को सार्वजनिक किया जाए और दोषियों पर निष्पक्ष कार्रवाई हो। न्याय केवल अदालतों का शब्द नहीं, बल्कि समाज का विश्वास भी है। यदि निर्दोष व्यक्ति फंसता है तो न्याय हारता है और यदि दोषी बच निकलता है तो भी न्याय हारता है।
इसलिए आज देश की नजर जांच एजेंसियों पर है। जनता यह देख रही है कि क्या जांच तथ्यों पर आधारित होगी या दबावों के आधार पर। क्या व्यवस्था अपने भीतर झांकने का साहस करेगी या फिर एक व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराकर फाइल बंद कर दी जाएगी।
मालवीय नगर अग्निकांड केवल दिल्ली का मामला नहीं है। यह पूरे देश के लिए चेतावनी है। हर शहर में हजारों भवन ऐसे हैं जहां सुरक्षा मानकों की अनदेखी की जा रही है। यदि इस घटना से भी सबक नहीं लिया गया तो भविष्य में ऐसी त्रासदियां फिर सामने आएंगी।
अंत में, हम एक बार फिर सभी मृतकों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। ईश्वर दिवंगत आत्माओं को शांति प्रदान करे और शोक संतप्त परिवारों को इस अपार दुःख को सहन करने की शक्ति दे। साथ ही हमारी अपेक्षा है कि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और तथ्यों पर आधारित हो, ताकि सत्य सामने आए और न्याय की स्थापना हो सके।
यही पीड़ितों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। यही लोकतंत्र की आत्मा है। और यही पत्रकारिता का उद्देश्य भी।
