डबल इंजन सरकार, पोस्टमैन की लाचारी और उत्तराखंड के लोग?पहाड़ की चढ़ाई और सरकारी नीतियों की ढलान

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उत्तराखंड में इन दिनों पोस्टमैनों की चर्चा किसी राजनीतिक बहस से कम नहीं है। सामान्यतः डाकिया भारतीय समाज का वह पात्र रहा है जो खुशियों, दुखों, नियुक्ति पत्रों, पेंशन के कागज़ों और दूर बैठे अपनों के संदेशों का वाहक माना जाता था। लेकिन आज उत्तराखंड के कई इलाकों में डाकिया चर्चा का विषय इसलिए बना हुआ है क्योंकि स्थानीय लोगों और बाहर से आए कुछ कर्मचारियों के बीच कार्यशैली, भाषा, संस्कृति और भौगोलिक परिस्थितियों को लेकर टकराव की स्थिति दिखाई दे रही है।
कहा जाता है कि मैदानों में नौकरी करने वाला व्यक्ति जब पहली बार पहाड़ के वास्तविक भूगोल से परिचित होता है, तब उसे नक्शे और वास्तविकता के बीच का अंतर समझ में आता है। उत्तराखंड के दुर्गम गांवों में डाक पहुंचाना केवल सरकारी नौकरी नहीं, बल्कि एक प्रकार की सामाजिक सेवा है। कई क्षेत्रों में आज भी डाकिया प्रतिदिन 15 से 20 किलोमीटर तक पैदल चलता है। रास्ते में खड़ी चढ़ाइयाँ हैं, संकरे रास्ते हैं, बरसाती नाले हैं, जंगल हैं और मौसम की अनिश्चितताएँ हैं। कई बार एक पत्र पहुंचाने के लिए घंटों की पैदल यात्रा करनी पड़ती है।
ऐसे में जब मैदानों की अपेक्षाकृत आसान परिस्थितियों में कार्य करने वाले कर्मचारी अचानक पहाड़ की वास्तविकताओं से रूबरू होते हैं, तो उन्हें कठिनाई होना स्वाभाविक है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब कठिनाई व्यक्तिगत अनुभव से निकलकर जनता की सेवा पर असर डालने लगती है।
पहाड़ की नौकरी, मैदान की मानसिकता
उत्तराखंड के लोगों का आरोप है कि कुछ बाहरी कर्मचारी गांव तक डाक पहुंचाने के बजाय लोगों को पोस्ट ऑफिस बुलाकर डाक लेने के लिए कह रहे हैं। यदि ऐसा हो रहा है तो यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं बल्कि सेवा व्यवस्था की विफलता भी है।
सरकारी नौकरी केवल वेतन लेने का माध्यम नहीं है; उसके साथ जिम्मेदारियाँ भी जुड़ी होती हैं। यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति डाक वितरण के लिए हुई है तो उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी डाक पहुंचाना ही है। नागरिकों को यह अधिकार है कि उन्हें निर्धारित सेवा मिले।
हालांकि दूसरी ओर यह भी समझना होगा कि यदि किसी कर्मचारी को ऐसे भौगोलिक क्षेत्र में नियुक्त कर दिया जाए जिसकी परिस्थितियों के लिए वह प्रशिक्षित नहीं है, तो समस्या केवल कर्मचारी की नहीं बल्कि व्यवस्था की भी है।
प्रश्न यह है कि क्या भर्ती प्रक्रिया में इस बात का ध्यान रखा गया कि जिस व्यक्ति को पहाड़ के दुर्गम क्षेत्र में भेजा जा रहा है, वह उस कार्य के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार है?
भाषा का विवाद या मनोविज्ञान का खेल?
उत्तराखंड में चर्चा का दूसरा विषय भाषा है।
हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्रों में बोली जाने वाली खड़ी बोली और हरियाणवी प्रभाव वाली भाषा का स्वर अपेक्षाकृत सीधा, तेज और दबंग माना जाता है। वहीं उत्तराखंड के पहाड़ी समाज की संवाद शैली अपेक्षाकृत विनम्र, धीमी और सौम्य होती है।
यहीं से गलतफहमियाँ जन्म लेती हैं।
हरियाणा का व्यक्ति यदि सामान्य स्वर में भी बात करे तो कई पहाड़ी लोगों को लग सकता है कि वह झगड़े के मूड में है। दूसरी ओर हरियाणा का व्यक्ति सोच सकता है कि सामने वाला अत्यधिक औपचारिक या संकोची है।
भारत की विविधता का यही सबसे रोचक और कभी-कभी सबसे कठिन पक्ष है। भाषा केवल शब्द नहीं होती, उसके साथ संस्कृति, व्यवहार और सामाजिक मनोविज्ञान भी जुड़ा होता है।
संभव है कि एक हरियाणवी कर्मचारी पूरी ईमानदारी और स्नेह से बात कर रहा हो, लेकिन उसकी आवाज़ और शैली पहाड़ी व्यक्ति को कठोर लगे। इसी प्रकार पहाड़ी व्यक्ति की शांत प्रतिक्रिया हरियाणवी कर्मचारी को अनावश्यक दूरी या असहयोग जैसी प्रतीत हो सकती है।
समस्या भाषा नहीं, बल्कि भाषा को समझने की कमी है।
पहाड़ बनाम मैदान नहीं, व्यवस्था बनाम वास्तविकता
आज सोशल मीडिया के दौर में किसी भी छोटी घटना को क्षेत्रीय संघर्ष का रूप देना आसान हो गया है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में यह हरियाणा बनाम उत्तराखंड का मुद्दा है?
शायद नहीं।
असल प्रश्न यह है कि क्या भर्ती और तैनाती की नीतियाँ स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं?
यदि किसी रेगिस्तानी क्षेत्र के व्यक्ति को हिमालय की ऊँचाइयों में भेज दिया जाए, या हिमालयी क्षेत्र के व्यक्ति को बिना तैयारी के समुद्री तटीय आपदा क्षेत्र में भेज दिया जाए, तो कठिनाइयाँ स्वाभाविक होंगी।
भारत जैसे विशाल देश में सरकारी सेवाओं का राष्ट्रीय स्वरूप आवश्यक है, लेकिन स्थानीय परिस्थितियों की समझ भी उतनी ही आवश्यक है।
डबल इंजन सरकार का राजनीतिक प्रश्न
यहाँ से बहस राजनीतिक स्वरूप ग्रहण कर लेती है।
डबल इंजन सरकार का विचार मूल रूप से केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय को बढ़ाने के लिए प्रस्तुत किया गया था। इसका उद्देश्य विकास योजनाओं को तेज गति देना था।
लेकिन आम नागरिक इस विचार को अपने अनुभवों की कसौटी पर परखता है।
जब उत्तराखंड का युवा बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहा हो और उसे लगे कि उसके राज्य की नौकरियाँ दूसरे राज्यों के लोगों को मिल रही हैं, तब स्वाभाविक रूप से असंतोष पैदा होता है।
लोग सवाल पूछते हैं कि यदि स्थानीय युवक पहाड़ की परिस्थितियों को बेहतर समझता है, स्थानीय भाषा जानता है, स्थानीय भूगोल से परिचित है और शारीरिक रूप से भी उस वातावरण के अनुरूप है, तो उसे प्राथमिकता क्यों नहीं मिलनी चाहिए?
यह प्रश्न केवल उत्तराखंड का नहीं है। भारत के लगभग सभी राज्यों में समय-समय पर स्थानीय रोजगार को लेकर ऐसी बहसें होती रही हैं।8
हालांकि दूसरी ओर भारतीय संविधान पूरे देश को एक साझा रोजगार क्षेत्र के रूप में देखता है। किसी भी भारतीय नागरिक को देश के किसी भी हिस्से में नौकरी करने का अधिकार है।
यहीं लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी होती है—राष्ट्रीय एकता और स्थानीय आकांक्षाओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?
पहाड़ का युवा क्या चाहता है?
उत्तराखंड का युवा किसी विशेष राज्य के लोगों के खिलाफ नहीं है। उसकी मुख्य चिंता रोजगार है।
पलायन, बेरोजगारी और सीमित आर्थिक अवसर लंबे समय से उत्तराखंड की प्रमुख समस्याएँ रही हैं।
जब गांव खाली हो रहे हों, स्कूलों में छात्र कम होते जा रहे हों और युवा रोजगार के लिए देहरादून, दिल्ली, चंडीगढ़ या मुंबई की ओर जा रहे हों, तब स्थानीय रोजगार का प्रश्न भावनात्मक मुद्दा बन जाता है।
ऐसी स्थिति में यदि किसी सरकारी विभाग में बाहरी कर्मचारियों की संख्या बढ़ती दिखाई देती है, तो असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है।
समाधान क्या है?
समाधान क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है।
समाधान है—
पहला, भर्ती में स्थानीय परिस्थितियों की समझ को महत्व दिया जाए।
दूसरा, दुर्गम क्षेत्रों में नियुक्त कर्मचारियों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाए।
तीसरा, कठिन भौगोलिक क्षेत्रों के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन और सुविधाएँ प्रदान की जाएँ।
चौथा, स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए।
पाँचवाँ, नागरिकों और कर्मचारियों दोनों को संवाद और सहयोग की संस्कृति विकसित करनी चाहिए।
निष्कर्ष
उत्तराखंड में पोस्टमैन को लेकर चल रही चर्चाएँ केवल डाक वितरण की समस्या नहीं हैं। वे हमें भारत के बदलते सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य की झलक दिखाती हैं।
एक तरफ पहाड़ की कठिन भौगोलिक वास्तविकताएँ हैं, दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्तर की भर्ती व्यवस्था। एक तरफ स्थानीय रोजगार की आकांक्षा है, दूसरी तरफ संवैधानिक समानता का सिद्धांत। एक तरफ भाषा और संस्कृति का अंतर है, दूसरी तरफ राष्ट्रीय एकता का आदर्श।
डबल इंजन सरकार की सफलता केवल सड़कों, पुलों और भवनों से नहीं मापी जाएगी। उसकी असली परीक्षा तब होगी जब दूरस्थ पहाड़ी गांव में रहने वाले नागरिक को भी यह महसूस हो कि सरकार की व्यवस्था उसके दरवाजे तक पहुंच रही है—चाहे वह डाक हो, विकास हो या रोजगार का अवसर।
आखिर लोकतंत्र की असली ताकत राजधानी के दफ्तरों में नहीं, बल्कि उस आखिरी गांव में दिखाई देती है जहाँ एक डाकिया आज भी पहाड़ की चढ़ाई चढ़कर किसी बुजुर्ग के हाथ में उसकी प्रतीक्षित चिट्ठी सौंपता है।


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