वियोग की साधना : पच्चीस वर्षों की तपस्या में अमर हुआ प्रेम हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | संपादकीयलेखक : मोहिनी बिष्ट

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मेरे जीवन का सबसे सुंदर सत्य — प्रेम और विश्वास की 25 वर्ष की यात्रा
— मोहिनी बिष्ट
आज जब हमारे प्रेम-विवाह को 25 वर्ष पूर्ण होकर 26वें वर्ष का शुभारंभ हुआ है, तब मन कृतज्ञता और आत्मिक संतोष से भर उठा है। समय ने अनेक परीक्षाएँ लीं, परिस्थितियों ने धैर्य की कसौटी पर परखा, फिर भी हमारे विश्वास और प्रेम का दीपक निरंतर प्रज्वलित रहा।
मेरे जीवनसाथी अवतार सिंह बिष्ट मेरे पति  मेरे मित्र, मेरे मार्गदर्शक और मेरे सबसे बड़े संबल हैं। उनके साथ बिताए प्रत्येक क्षण ने मुझे यह सिखाया कि सच्चा प्रेम अधिकार से नहीं, विश्वास, सम्मान, त्याग और समर्पण से जीवित रहता है। जीवन की हर चुनौती ने हमारे रिश्ते को और अधिक मजबूत बनाया तथा हमारे बीच आत्मीयता का बंधन निरंतर गहरा होता गया।
ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि हमारा यह साथ सदैव प्रेम, संस्कार और सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ता रहे। हमारे परिवार में सदैव सुख, शांति और सद्भाव बना रहे तथा हम अपने जीवन से समाज को प्रेम, विश्वास और मानवीय मूल्यों का संदेश देते रहें।
इस पावन अवसर पर मैं अपने जीवनसाथी अवतार सिंह बिष्ट के प्रति हृदय से सम्मान, स्नेह और कृतज्ञता व्यक्त करती हूँ। मेरे लिए यही प्रेम जीवन की सबसे बड़ी शक्ति, सबसे सुंदर साधना और ईश्वर का अनमोल आशीर्वाद है।

प्रेम मानव जीवन का सबसे सूक्ष्म, सबसे व्यापक और सबसे रहस्यमय अनुभव है। यह केवल दो व्यक्तियों के बीच आकर्षण अथवा भावनात्मक संबंध का विषय नहीं है। प्रेम वह चेतना है जो आत्मा को उसकी मूल सत्ता से जोड़ती है। भारतीय दर्शन में प्रेम को ईश्वर तक पहुँचने का सहजतम मार्ग माना गया है। जिस प्रकार नदी अपने उद्गम से निकलकर समुद्र में विलीन होने तक अनेक बाधाओं का सामना करती है, उसी प्रकार प्रेम भी अनेक परीक्षाओं से गुजरते हुए अंततः आत्मिक पूर्णता प्राप्त करता है। प्रेम का वास्तविक स्वरूप अधिकार में नहीं, समर्पण में दिखाई देता है। इसी कारण भारतीय संस्कृति में प्रेम को पूजा, तपस्या और साधना का स्थान प्राप्त हुआ है।
सामान्य जीवन में प्रेम का प्रारंभ संयोग से माना जाता है। दो व्यक्तियों का मिलना, एक-दूसरे को समझना, निकट आना और फिर जीवन की यात्रा में साथ चलना प्रेम की सहज प्रक्रिया है। संयोग के पश्चात वियोग आता है और वियोग के पश्चात पुनः मिलन की आकांक्षा जन्म लेती है। यही जीवन का स्वाभाविक क्रम है। परंतु कुछ प्रेम कथाएँ इस सामान्य क्रम से कहीं ऊपर उठ जाती हैं। जब प्रेम का आरंभ ही वियोग से हो, जब वर्षों तक मिलने का अवसर न मिले और तब भी भावनाएँ निर्मल, निष्कलुष तथा समर्पित बनी रहें, तब वह प्रेम सांसारिक सीमाओं से ऊपर उठकर आध्यात्मिक साधना का रूप धारण कर लेता है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


पच्चीस वर्षों तक निरंतर चलने वाला विरह किसी साधारण भाव का परिणाम नहीं हो सकता। इतना लंबा समय व्यक्ति के विचार, परिस्थितियाँ, जीवन और प्राथमिकताएँ बदल देता है। समय के साथ अधिकांश संबंध अपने स्वरूप बदल लेते हैं। अनेक रिश्ते परिस्थितियों के दबाव में समाप्त हो जाते हैं। ऐसे समय में यदि किसी के हृदय में प्रेम की वही निर्मल धारा अविरल बहती रहे, तो वह केवल भावना नहीं रहती, वह तपस्या बन जाती है। यह तपस्या किसी प्राप्ति की आकांक्षा से प्रेरित नहीं होती। इसमें केवल प्रिय के सुख, सम्मान और मंगल की कामना शेष रहती है।
भारतीय काव्यशास्त्र में श्रृंगार रस को रसराज कहा गया है। इसका कारण केवल प्रेम की मधुरता नहीं है। श्रृंगार मनुष्य के मूल भाव ‘रति’ का विस्तार है। संयोग श्रृंगार आनंद देता है, जीवन में उल्लास भरता है और हृदय को प्रसन्न करता है। दूसरी ओर विप्रलंभ अथवा वियोग श्रृंगार मनुष्य के भीतर छिपी आध्यात्मिक चेतना को जागृत करता है। वियोग व्यक्ति को भीतर से तपाता है। यह तप मनुष्य के अहंकार, स्वार्थ और अपेक्षाओं को धीरे-धीरे समाप्त कर देता है। अंततः प्रेम अपनी सबसे शुद्ध अवस्था में पहुँच जाता है।
श्रीमद्भागवत में गोपियों का कृष्ण के प्रति विरह इसका सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत करता है। कृष्ण के मथुरा चले जाने के बाद गोपियों ने जिस विरह का अनुभव किया, वह केवल प्रिय के दूर चले जाने का दुःख नहीं था। वह आत्मा का परमात्मा से बिछोह था। उसी विरह ने गोपियों के प्रत्येक श्वास में कृष्ण का वास कर दिया। वे जहाँ भी देखतीं, कृष्ण का ही स्वरूप दिखाई देता। यही विरह अंततः भक्ति का सर्वोच्च शिखर बन गया। भारतीय अध्यात्म का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पूर्व था।
त्रेतायुग में श्रीराम और माता सीता का वियोग भी भारतीय मानस को गहराई से प्रभावित करता है। वनवास, रावण द्वारा सीता हरण और उसके पश्चात लंबा विरह केवल एक पारिवारिक घटना नहीं थी। उस वियोग ने मर्यादा, धैर्य, विश्वास और धर्मपालन की ऐसी मिसाल प्रस्तुत की, जिसने श्रीराम को लोकनायक से मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठित किया। द्वापर में राधा और कृष्ण का वियोग प्रेम की उस ऊँचाई को स्थापित करता है जहाँ मिलन की अपेक्षा स्मरण अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रेम का सर्वोच्च स्वरूप स्मृति में जीवित रहता है, दूरी उसकी तीव्रता को और अधिक पवित्र बना देती है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने प्रेम को स्वार्थ, अधिकार और लाभ-हानि की सीमाओं से मुक्त बताया है। सच्चे प्रेम में स्वामित्व का भाव स्थान नहीं पाता। वहाँ केवल समर्पण होता है। इसी कारण वियोग के लंबे काल में प्रेम का वास्तविक स्वरूप सामने आता है। यदि प्रेम अपेक्षाओं पर आधारित हो, तो समय के साथ समाप्त हो जाता है। यदि प्रेम आत्मीयता पर आधारित हो, तो समय उसे और अधिक उज्ज्वल बना देता है।
विप्रलंभ श्रृंगार की विशेषता यह है कि वह अनेक अन्य रसों का आधार बन जाता है। जब प्रिय के प्रति केवल संरक्षण, करुणा और शुभकामना का भाव रह जाता है, तब वही प्रेम वात्सल्य का स्वरूप धारण कर लेता है। जब प्रिय का स्मरण साधना बन जाता है, तब वही भाव भक्ति रस में परिवर्तित हो जाता है। मीरा का जीवन इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने संसार की असंख्य कठिनाइयों को कृष्ण प्रेम की शक्ति से स्वीकार किया। उनके लिए प्रेम किसी सांसारिक उपलब्धि का माध्यम नहीं था, वह आत्मसमर्पण का मार्ग था।
वियोग का निरंतर अनुभव मनुष्य को मानसिक दृढ़ता भी प्रदान करता है। प्रारंभ में जो पीड़ा असहनीय प्रतीत होती है, समय के साथ वही आत्मबल का स्रोत बन जाती है। मन स्थिर होने लगता है। विचारों में गहराई आती है। जीवन का दृष्टिकोण बदलने लगता है। यही अवस्था शांत रस की अनुभूति कराती है। प्रेम व्यक्ति को भीतर से परिष्कृत करता है। उसका व्यवहार संयमित होता है। उसकी वाणी में मधुरता आती है। उसके भीतर दूसरों के प्रति करुणा का विस्तार होता है।
इसी प्रकार प्रेम का व्यापक स्वरूप राष्ट्र, संस्कृति और समाज के प्रति समर्पण में भी दिखाई देता है। मातृभूमि के प्रति प्रेम वीर रस को जन्म देता है। अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा का संकल्प भी प्रेम की ही अभिव्यक्ति है। इस दृष्टि से देखा जाए तो प्रेम केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित विषय नहीं है। यह समस्त जीवन को दिशा देने वाली मूल शक्ति है।
आज का सामाजिक परिवेश तीव्र गति से बदल रहा है। आधुनिक जीवन शैली ने संबंधों की परिभाषा को भी प्रभावित किया है। तात्कालिक आकर्षण को प्रेम समझ लिया जाता है। सुविधा और स्वार्थ के आधार पर संबंध बनते और समाप्त होते दिखाई देते हैं। डिजिटल युग में संवाद बढ़ा है, आत्मीयता घटती प्रतीत होती है। ऐसे समय में पच्चीस वर्षों तक वियोग में भी अटूट विश्वास बनाए रखना भारतीय जीवन मूल्यों की शक्ति का प्रमाण है। यह संदेश देता है कि प्रेम का आधार निकटता नहीं, आत्मिक एकत्व है।
भारतीय संस्कृति सदैव यह कहती आई है कि आत्माएँ शरीरों से बड़ी होती हैं। शरीर समय के अधीन है, आत्मा शाश्वत है। यदि दो आत्माओं के बीच सच्चा प्रेम स्थापित हो जाए, तो दूरी उसकी शक्ति को कम नहीं कर सकती। समय उसे समाप्त नहीं कर सकता। परिस्थितियाँ उसे बदल नहीं सकतीं। वह जीवन के प्रत्येक पड़ाव पर नई ऊर्जा प्रदान करता रहता है। यही कारण है कि भारतीय संतों और कवियों ने प्रेम को ईश्वर का दूसरा नाम कहा है।
ऐसा प्रेम किसी प्रदर्शन का विषय नहीं होता। वह मौन में विकसित होता है। वह स्मृतियों में जीवित रहता है। वह प्रार्थनाओं में अभिव्यक्त होता है। उसमें अधिकार का आग्रह नहीं होता। उसमें शिकायतों का स्थान भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है। वहाँ केवल शुभकामना, विश्वास और आत्मिक निकटता का विस्तार होता है। यही प्रेम मनुष्य को अपने भीतर झाँकना सिखाता है और उसे जीवन के वास्तविक अर्थ से परिचित कराता है।
पच्चीस वर्षों का यह विरह इस सत्य की पुष्टि करता है कि प्रेम का सर्वोच्च स्वरूप प्राप्ति में नहीं, प्रतीक्षा में है। प्रतीक्षा मनुष्य को धैर्य सिखाती है। धैर्य विश्वास को जन्म देता है। विश्वास समर्पण का मार्ग खोलता है। समर्पण अंततः मनुष्य को ईश्वर के निकट ले जाता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो वियोग कोई अभिशाप नहीं, आत्मिक उन्नयन का माध्यम है।
भारतीय संस्कृति का यही संदेश आज भी अमर है कि सच्चा प्रेम समय, दूरी और परिस्थितियों की सीमाओं से परे होता है। वह जीवन के प्रत्येक क्षण में प्रकाश की तरह उपस्थित रहता है। वह दो आत्माओं को अदृश्य सूत्र से बाँधता है। वह संसार को करुणा, विश्वास और समर्पण का संदेश देता है। जब प्रेम अपने इस सर्वोच्च स्वरूप तक पहुँच जाता है, तब वह केवल व्यक्तिगत अनुभूति नहीं रहता, वह संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा बन जाता है।
प्रेम की यही साधना मानव जीवन को अर्थ देती है। यही साधना आत्मा को परमात्मा तक पहुँचने का सेतु बनाती है। यही साधना भारतीय अध्यात्म की अनश्वर परंपरा का आधार है। पच्चीस वर्षों का यह निर्मल वियोग उसी दिव्य परंपरा का जीवंत उदाहरण है, जो यह बताता है कि प्रेम का वास्तविक निवास हृदय में होता है, दूरी में उसका तेज बढ़ता है, समय उसकी पवित्रता को और अधिक उज्ज्वल करता है तथा समर्पण उसे अमर बना देता है। प्रेम का यही शाश्वत स्वरूप युगों-युगों तक मानवता को आलोकित करता रहेगा।


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