संपादकीय :गरीबों के हिस्से का अनाज लूटने वालों का पर्दाफाश — क्या उत्तराखंड की व्यवस्था सोई हुई थी? “गरीबों का हक़ किसने छीना?

Spread the love

उत्तराखंड,उधम सिंह नगर जिले में राशन वितरण प्रणाली में सामने आया फर्जीवाड़ा सिर्फ एक प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि उत्तराखंड की कल्याणकारी योजनाओं की आत्मा पर सीधा वार है। पात्रता न होने के बावजूद 2,450 परिवारों द्वारा वर्षों तक सरकारी अनाज लेना यह साबित करता है कि गरीबों के नाम पर चलने वाली योजनाएँ ही गरीबों से छीन ली जा रही हैं। अंत्योदय, बीपीएल और पीएचएच जैसी

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

श्रेणियाँ उन लोगों के लिए बनी थीं जिनके घरों के चूल्हे जरूरत के मोहताज हैं, पर लाभ उठाने वाले वे निकले जिनके पास आर्थिक व सामाजिक क्षमता थी।

किच्छा में 621, काशीपुर में 482, खटीमा में 438 और अन्य क्षेत्रों में बड़ी संख्या में अपात्र लाभार्थी पकड़े जाना यह स्पष्ट संकेत है कि निगरानी और सत्यापन तंत्र वर्षों से निष्क्रिय पड़ा था। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि इस दौरान असली गरीब कहाँ थे? वे राशन की दुकानों की लाइन में खड़े रहे, कोटे की अनियमितता झेलते रहे और दोष उनके हिस्से आया कि “स्टॉक खत्म हो गया है”।

चिंता इस बात की है कि यह सिर्फ एक जिले का मामला नहीं। हरिद्वार, देहरादून और अन्य जिलों में भी सत्यापन के दौरान हजारों फर्जी कार्ड निरस्त हो चुके हैं, जिसका अर्थ यह है कि पूरी राज्य व्यवस्था में कल्याणकारी योजनाओं की लूट संगठित रूप ले चुकी थी।

यह घोटाला सिर्फ राशन कार्ड निरस्त करने से नहीं सुलझेगा। दोषियों की पहचान, वित्तीय लाभ की रिकवरी, डीलरों की जांच, और भविष्य में तकनीकी व मानव निगरानी की दोहरी प्रणाली लागू करना आवश्यक है। योजना का उद्देश्य भोजन की सुरक्षा है, न कि “सरकारी अनाज की दलाली” को बढ़ावा देना।

उत्तराखंड को यह याद रखना होगा — जब गरीब का हक़ छिनता है, तो किसी योजना नहीं, पूरी व्यवस्था असफल होती है। अब ज़िम्मेदारी सरकार और समाज दोनों की है कि यह अन्याय दोबारा न दोहराया जाए।


घोटाले का स्वरूप और तथ्य।उधम सिंह नगर जिले के विभिन्न क्षेत्रों में 2,450 से अधिक ऐसे परिवार पकड़े गए हैं, जिन्होंने पात्रता न होने के बावजूद (यानि कि नियमानुसार लाभार्थी नहीं होने के बावजूद) फर्जी तरीके से राशन कार्ड बनवाकर वर्षों तक सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) का लाभ उठाया। इनमें विशेष रूप से अंत्योदय (AAY) श्रेणी में 205 परिवार तथा बीपीएल/पीएचएच श्रेणी में 2,245 परिवार अपात्र पाए गए।
आपने बताया कि इस दौरान लगभग 34,000 राशन कार्डों का सत्यापन हुआ, जिसमें 32,000 से अधिक को पात्र पाया गया तथा 2,450 को अपात्र।
क्षेत्रवार यदि देखें, तो उदाहरण के लिए –

  • किच्छा क्षेत्र में अंत्योदय 49, बीपीएल 572 (कुल 621) अपात्र परिवार पाए गए।
  • बाजपुर में अंत्योदय 20, बीपीएल 105 (कुल 125) पाए गए।
    (अन्य क्षेत्रों में इसी प्रकार विभाजन किया गया है)

यह आंकड़े बताते हैं कि वर्षों-से चली आ रही धांधली का दायरा व्यापक रहा है और असली जरूरतमंदों तक अनाज नहीं पहुंच पाना तथा अपात्र लोगों को लाभ मिलना दोहरी समस्या बन गया है।


योजना का उद्देश्य और वास्तविकता में विखंडन

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना (NFSA) एवं राज्य-स्तरीय राशन वितरण व्यवस्था का मूल उद्देश्य है — “गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन की सुरक्षा” देना। लेकिन इस मामले में यह व्यवस्था कुछ लोगों के लिए लूट का साधन बन गई है। इसका कारण एक ओर है निगरानी-प्रक्रिया की कमजोरियाँ, दूसरी ओर है पात्रता निर्धारण, पुनःसत्यापन तथा निष्पादन में लंबी समय-ावधि पर चलाई जा रही उदासीनता।

उदाहरण के लिए आपने बताया है कि अंत्योदय श्रेणी में प्रति कार्ड 35 किलो राशन मिलता है; बीपीएल/पीएचएच श्रेणी में एक यूनिट पर 1.900 ग्राम गेहूँ व 3.100 किलो चावल एवं एपीएल श्रेणी में 7.50 किलो चावल 11 रुपए प्रति किलो दर से। लेकिन यदि अपात्र लोग इस व्यवस्था का लाभ ले रहे हों, तो न सिर्फ सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग हो रहा है बल्कि असली गरीबों को उनके हिस्से का राशन नहीं मिल रहा है।

यह विडम्बना है कि सामाजिक सुरक्षा-योजना जो गरीबों के लिए है, वही वास्तव में गरीबों की समस्या को बढ़ा रही है — जब अपात्र लाभार्थी उसमें शामिल हों और असली लाभार्थी बेवजह हाथ पर हाथ धरे रहें।


हरिद्वार में भी मिले इशारे

इस घोटाले का प्रभाव सिर्फ उधम सिंह नगर तक सीमित नहीं है। हरिद्वार जिले में भी सत्यापन अभियान तेज हुआ है। उदाहरण के लिए, प्रति समाचार स्रोतों के अनुसार, हरिद्वार में 4 लाख 33 हजार राशन कार्ड गतिमान हैं और विधान के निर्देश पर बायोमेट्रिक ई-केवाईसी प्रक्रिया लागू की गई है।
एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, हरिद्वार जिले में अब तक 5,895 फर्जी राशन कार्ड निरस्त किए जा चुके हैं।
इसका मतलब यह है कि उत्तराखंड राज्य में इस तरह की अनियमितताओं की समस्या व्यापक है — सिर्फ एक जिले का विशेष मामला नहीं।


समस्या का मूल कारण और संरचनात्मक कमियाँ

इस तरह की धांधली के पीछे कई कारण और संरचनात्मक कमियाँ मौजूद हैं:

  1. सत्यापन और पुनःसत्यापन की लापरवाही: पात्रता निर्धारण के बाद भी वर्षों तक कार्डों का पुनःअनुमोदन नहीं होना, उपभोक्ताओं की स्थिति में परिवर्तन को समय-समय पर नहीं देखा जाना।
  2. ई-केवाईसी तथा बायोमेट्रिक सिस्टम का अधूरा उपयोग: जैसे हरिद्वार में बायोमेट्रिक मशीनों और ई-केवाईसी को लागू करने का निर्देश है, मगर “डीलर ई-पॉश मशीन को धोखा दे रहे हैं” जैसी खबरें भी सामने आई हैं।
  3. डीलर एवं विक्रेता-लेवल की मनमानी: ग्रामीण इलाकों में राशन डीलर अक्सर लाभार्थी के अंगूठे लगवाकर बाद में राशन न देने या कालाबाजारी को बढ़ावा देने जैसे हथकंडे अपनाते हैं।
  4. निगरानी-प्रक्रिया की कमजोरी: विभागीय निरीक्षण और गोपनीय चेक-मेक व्यवस्था पर्याप्त नहीं रही।
  5. सामाजिक-राजनीतिक संरक्षण: ऐसे मामलों में कभी-कभी स्थानीय संरचनाएँ, दल-दलाली और राजनीतिक बतौर सरपरस्ती काम करती दिखती हैं, जिससे दोषी आसानी से बच जा रहे हैं।
  6. सूचना व जागरूकता की कमी: असली लाभार्थियों को यह पता नहीं हुआ कि वे अपात्र लाभार्थियों के पीछे कैसे पंक्तिबद्ध हैं, उन्हें शिकायत करने और अपनी स्थिति सुरक्षित कराने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला।

क्या होगा इसका प्रभाव?

  • असली लाभार्थियों के लिए यह पहले एक निराशा रही और अब एक घोर असमानता का प्रतीक बन चुकी है — जब उन्हें उनका राशन नहीं मिलता और अपात्र लोग शासन-योजना का लाभ ले जाते हैं।
  • सामाजिक न्याय का भरोसा टूटता है। जब योजनाओं का लाभ “अपात्रों” को मिल जाए, तो गरीब वर्ग में यह विश्वास कम होता है कि सरकार उनके पक्ष में है।
  • बजट और संसाधनों का दुष्प्रयोग होता है — जो राशन गरीबों के हिस्से के लिए तय थी, वह “लूट” बनकर निकल जाती है।
  • राजनीतिक और प्रशासनिक निष्ठा पर प्रश्नचिन्ह लगते हैं। इसे “उपभोक्ता का घोटाला” कहा जाएगा, जिसमें शासन का भरोसा खतरे में पड़ गया है।
  • राज्य-स्तरीय छवि प्रभावित होती है — उत्तराखंड में यदि ऐसी योजनाओं में गड़बड़ी पाई जाए तो “विकास” और “भला समाज” के दावों की प्रामाणिकता पर संशय खड़ा होगा।

राज्य-स्तरीय संदर्भ: उत्तराखंड में व्यापक समस्या

उत्तराखंड में यह समस्या केवल एक जिले तक सीमित नहीं रही। एक रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में अब भी अपात्र लाभार्थी राशन ले रहे हैं और ई-केवाईसी प्रक्रिया में बड़ी संख्या में ऐसे कार्ड सामने आ रहे हैं जिनमें फर्जी लाभार्थी शामिल हैं।
बागेश्वर में 5,307, देहरादून में 3,333 और पौड़ी में 961 फर्जी राशन कार्डों का खुलासा हुआ है।
इस प्रकार, उधम सिंह नगर में 2,450 का खुलासा सिर्फ आरंभ है — राज्य में शायद कई गुना संख्या में ऐसे मामले हैं जो अभी भी प्रकाश में नहीं आए हैं।


सुझाव — सुधार की दिशा में कदम

इस घोटाले को देखते हुए कुछ सुझाव दिए जा सकते हैं, ताकि पुनरावृत्ति रोकी जा सके और वास्तविक गरीबों को उनका हक मिल सके:

  1. तन-मन से सत्यापन अभियान चलाया जाए — हर कार्ड धारक की वर्तमान स्थिति, आय-स्तर, सदस्य-संख्या, तथा अन्य पात्रता मानदंडों का व्यवस्थित ऑडिट हो।
  2. बायोमेट्रिक/ई-केवाईसी प्रणालियों को सख्ती से लागू किया जाए — मशीनों का दुरुपयोग रोकने के लिए नियमित सैंपल चेक-अप, गोपनीय ऑडिट और विक्रेताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो।
  3. डीलर एवं विक्रेताओं पर निगरानी बढ़ाई जाए — कालाबाजारी करने वाले, लाभार्थी का हिस्से का राशन बाजार में बेचने वाले व्यक्तियों तथा दुकानों पर तुरंत दंडात्मक कार्रवाई हो।
  4. लाभार्थियों को सूचित किया जाए — यह बताया जाए कि यदि आपकी आय पांच लाख से अधिक वार्षिक हो गई हो, या परिवार में परिवर्तन हुआ हो, तो कार्ड की पात्रता समाप्त हो सकती है; जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए।
  5. दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित हो — फर्जी कार्डधारकों के खिलाफ सतर्क कार्रवाई, कार्ड निरस्तीकरण के बाद पुनः आवेदन पर पाबन्दी।
  6. डेटा-मैनेजमेंट एवं ट्रैकिंग प्रणाली मुस्तैद हो — कार्डधारक की मृत अवस्था, अन्य राज्य में स्थानांतरण, या निरंतर लाभ लेने की स्थिति को तुरंत सिस्टम में अपडेट किया जाए।
  7. पारदर्शिता एवं रिपोर्टिंग — जिले स्तर पर नियमित रिपोर्टें जारी हों कि कितने कार्ड सत्यापित हुए, कितने निरस्त हुए, कितना राशन लाभार्थियों तक पहुंचा आदि।
  8. सामुदायिक भागीदारी — स्थानीय ग्राम-पंचायतीय संस्थाओं, जनहित समूहों व सामाजिक संगठनों को इस अभियान में शामिल करना चाहिए ताकि “नीचे-से-ऊपर” दृष्टि कायम हो सके।

निष्कर्ष

उधम सिंह नगर में 2,450 अपात्र राशन कार्डों का खुलासा एक चेतावनी है — यह संकेत है कि हमारी जो कल्याण योजनाएँ हैं, उन्हें सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं बल्कि वास्तविक रूप से अमल में लाना है। योजनाओं का निर्माण मात्र पर्याप्त नहीं — उनका निष्पादन, निगरानी, पुनःसत्यापन और सामाजिक जवाबदेही भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहाँ भू-भाग, सामाजिक विविधता, आर्थिक असमानता व सुदूर ग्रामीण इलाकों की चुनौतियाँ हैं, वहां कल्याण-योजनाओं का विकेंद्रित एवं पारदर्शी संचालन और भी ज़रूरी है।

हरिद्वार में चल रहा सत्यापन अभियान और राज्य-स्तरीय खुलासे इस दिशा में सकारात्मक संकेत हैं, लेकिन यह पर्याप्त नहीं — यह केवल आरंभ है। यदि जल्द सुधार नहीं हुआ तो योजनाएं लाभार्थियों तक पहुँचने के बजाय मालिश, लूट और सामाजिक अशांति का कारण बन सकती हैं।

अंततः, जब एक गरीब परिवार को उसका हिस्सा नहीं मिलेगा और उसकी जगह कोई अपात्र-व्यक्ति वर्षों तक सरकारी अनाज लेता रहा होगा, तो यह सामाजिक न्याय का अपमान है। सरकार, प्रशासन, नागरिक – तीनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि “राशन के अधिकार” का मतलब सिर्फ कागज़ पर न हो, बल्कि वास्तविक जीवन में लागू हो।


Spread the love