पार्ट-2 : मिशन 2027 में विकास शर्मा की नजर 2031 पर! शिव अरोड़ा की राजनीति के बीच राजकुमार ठुकराल से बढ़ता प्रेम, एक तीर से कई निशाने?


महापौर विकास शर्मा की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का केंद्र विधानसभा की कुर्सी या रुद्रपुर की राजनीति में लंबी पारी? 2027 में टिकट मिला तो ठीक, नहीं मिला तो 2031 के लिए जमीन तैयार करने का राजनीतिक गणित! विधायक शिव अरोड़ा के साथ कथित तल्खी, पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल से नजदीकियां और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का सानिध्य, आखिर क्या है रुद्रपुर की बदलती सियासत का पूरा गणित?
रुद्रपुर। रुद्रपुर भाजपा की राजनीति को केवल 2027 के विधानसभा चुनाव तक सीमित करके देखना शायद पूरी तस्वीर को समझना नहीं होगा। यहां महापौर विकास शर्मा की राजनीतिक गतिविधियां, विधायक शिव अरोड़ा के साथ उनके संबंध और पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल के साथ दिखाई दे रही नजदीकियां एक अलग ही राजनीतिक चर्चा को जन्म दे रही हैं। सवाल यह है कि क्या विकास शर्मा की निगाह केवल 2027 के विधानसभा टिकट पर है या फिर वह 2031 तक रुद्रपुर की राजनीति में अपनी मजबूत जगह बनाने की तैयारी कर रहे हैं? राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेजी से उठ रही है कि महापौर विकास शर्मा की राजनीतिक महत्वाकांक्षा केवल एक विधानसभा चुनाव तक सीमित नहीं है। यदि 2027 में टिकट मिल गया तो विधानसभा की दावेदारी और यदि टिकट नहीं मिला तो भी महापौर के रूप में अपने कार्यकाल के जरिए राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश जारी रह सकती है। इस नजरिये से देखें तो 2027 उनके लिए एक अवसर और 2031 उनकी लंबी राजनीतिक पारी का संभावित लक्ष्य माना जा रहा है। हालांकि यह उनकी घोषित रणनीति नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीतिक घटनाक्रमों से निकाला जा रहा विश्लेषण है।
2027 में टिकट नहीं मिला तो क्या खत्म हो जाएगी राजनीतिक महत्वाकांक्षा?
विकास शर्मा को लेकर राजनीतिक चर्चाओं में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उन्हें विधानसभा टिकट की कोई तत्काल मजबूरी नहीं दिखाई देती। यदि भाजपा 2027 में मौजूदा विधायक शिव अरोड़ा पर ही भरोसा जताती है तो विकास शर्मा के पास महापौर के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने और जनता के बीच अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत करने का समय रहेगा। वहीं यदि पार्टी किसी दूसरे चेहरे पर विचार करती है तो उनके लिए भी दावेदारी का अवसर बन सकता है। लेकिन इस पूरे राजनीतिक गणित में 2031 का चुनाव महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि 2027 में शिव अरोड़ा चुनावी मुकाबले में सफल नहीं होते या पार्टी के भीतर परिस्थितियां बदलती हैं तो रुद्रपुर में नए राजनीतिक समीकरण बन सकते हैं। ऐसी स्थिति में विकास शर्मा अपनी विधानसभा दावेदारी को नए सिरे से मजबूत करने की कोशिश कर सकते हैं। सवाल यह भी है कि क्या वह अभी से ऐसे राजनीतिक समीकरण तैयार कर रहे हैं, जिनका लाभ उन्हें भविष्य में मिल सके? रुद्रपुर जिला मुख्यालय होने के कारण यहां सत्ता, प्रशासन, संगठन और राजनीतिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र है। यहां अपनी मजबूत पहचान बनाने वाला नेता केवल नगर निगम की राजनीति तक सीमित नहीं रहता। विकास शर्मा की राजनीतिक गतिविधियों को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है।
राजकुमार ठुकराल से बढ़ता प्रेम, भाजपा की राजनीति में नए समीकरण?
इस पूरी राजनीतिक कहानी में पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल का नाम सबसे अधिक चर्चा में है। कभी भाजपा की राजनीति में अलग-अलग खेमों की पहचान रखने वाले नेताओं के बीच आज यदि सार्वजनिक मंचों पर नजदीकियां दिखाई दे रही हैं तो राजनीतिक गलियारों में उनके मायने तलाशे जाना स्वाभाविक है। हंस विहार की रामलीला में महापौर विकास शर्मा और पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल का एक जैसी पोशाक में दिखाई देना भी चर्चा का विषय बना। दोनों ने कुर्ता-पायजामा और गमछा पहना हुआ था। गमछा आयोजकों की ओर से पहनाया जाना सामान्य बात हो सकती है, लेकिन दोनों की एक जैसी पोशाक ने राजनीतिक चर्चाओं को हवा दी। सोशल मीडिया पर भी इस दृश्य को लेकर तरह-तरह की टिप्पणियां सामने आईं। सवाल उठता है कि क्या यह महज संयोग था या दोनों नेताओं के बीच बढ़ते व्यक्तिगत और राजनीतिक तालमेल का कोई संकेत? हालांकि एक जैसी पोशाक किसी राजनीतिक समझौते का प्रमाण नहीं है और न ही यह पुष्टि हुई है कि दोनों के कपड़े एक ही दुकान या दर्जी से तैयार कराए गए थे। लेकिन रुद्रपुर की राजनीति में इस दृश्य को नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है। राजकुमार ठुकराल की अपनी अलग राजनीतिक पहचान है। उनके समर्थक उन्हें हिंदू हृदय सम्राट के रूप में संबोधित करते रहे हैं। 2027 में उनकी राजनीतिक भूमिका क्या होगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है। यदि वह कांग्रेस की ओर से विधानसभा चुनाव में उतरते हैं तो भाजपा के स्थानीय समीकरणों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, यह आने वाला समय बताएगा। ऐसे में विकास शर्मा और ठुकराल के बीच दिखाई देने वाला मेलजोल राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है।
शिव अरोड़ा और विकास शर्मा के बीच 36 का आंकड़ा क्यों चर्चा में?
रुद्रपुर की राजनीति में विधायक शिव अरोड़ा और महापौर विकास शर्मा दोनों भाजपा के महत्वपूर्ण स्थानीय चेहरे हैं, लेकिन दोनों की राजनीतिक कार्यशैली और सार्वजनिक छवि को लेकर अलग-अलग धारणाएं सामने आती रही हैं। शिव अरोड़ा के समर्थक उनकी सौम्य शैली, पढ़े-लिखे व्यक्तित्व और लोगों से संवाद को उनकी राजनीतिक ताकत बताते हैं। दूसरी ओर विकास शर्मा की कार्यशैली को लेकर भी समर्थकों और आलोचकों की अपनी-अपनी राय है। कुछ लोग उनकी राजनीतिक शैली को प्रभावशाली नेतृत्व मानते हैं तो आलोचक इसे वर्चस्व की राजनीति से जोड़कर देखते हैं। सोशल मीडिया पर दोनों नेताओं के बीच बयानबाजी और सार्वजनिक मंचों पर दिखाई देने वाली नजदीकियों या दूरियों को लेकर भी चर्चाएं होती रही हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि विधानसभा का चुनाव विधायक शिव अरोड़ा को लड़ना है, यदि भाजपा उन्हें दोबारा उम्मीदवार बनाती है, तो स्थानीय राजनीतिक कार्यक्रमों और चुनावी तैयारियों में उनकी भूमिका कितनी प्रभावी रहेगी? मुख्यमंत्री के कार्यक्रम से लेकर नगर के विकास कार्यों तक विधायक और महापौर के बीच समन्वय जरूरी है। यदि दोनों के बीच राजनीतिक मतभेदों की चर्चाएं बढ़ती हैं तो उसका असर कार्यकर्ताओं और संगठन पर भी पड़ सकता है।
रोडवेज की दुकानों पर बुलडोजर और प्रभावित कार्यकर्ताओं की नाराजगी!
रुद्रपुर रोडवेज के सामने दुकानों और प्रतिष्ठानों पर हुई कार्रवाई भी इस राजनीतिक घटनाक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कार्रवाई से प्रभावित कुछ दुकानदार भाजपा से जुड़े कार्यकर्ता और पदाधिकारी बताए जाते हैं। वर्षों तक पार्टी के कार्यक्रमों में सक्रिय रहने वाले लोगों के प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई होने के बाद उनके सामने रोजगार और पुनर्वास का सवाल खड़ा हुआ। प्रभावित लोगों की शिकायत रही कि उन्हें उचित मुआवजा या वैकल्पिक व्यवस्था नहीं मिल पाई। स्थानीय स्तर पर इस कार्रवाई को लेकर विधायक और महापौर की भूमिकाओं पर भी सवाल उठे। राजनीतिक दृष्टि से यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव के समय बूथ स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं की भूमिका अहम होती है। यदि पार्टी से जुड़े लोग स्वयं को उपेक्षित महसूस करते हैं तो उनकी नाराजगी संगठन के लिए चिंता का विषय बन सकती है। हालांकि इस कार्रवाई को विकास शर्मा की व्यक्तिगत राजनीतिक रणनीति बताने के लिए कोई प्रमाण सामने नहीं है। लेकिन इतना जरूर है कि प्रशासनिक फैसलों का राजनीतिक प्रभाव पड़ता है और जनता तथा प्रभावित दुकानदार अपने जनप्रतिनिधियों से जवाब मांगते हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कार्यक्रम में भी राजनीतिक गोटियों की चर्चा!
तीन नवंबर को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में रुद्रपुर में प्रस्तावित भाजपा के कार्यक्रम को लेकर भी स्थानीय राजनीति में चर्चाएं तेज हैं। जिला भाजपा कार्यालय में हुई बैठक में कार्यक्रम की तैयारियों और यात्रा के स्वरूप पर विचार-विमर्श हुआ। गांधी पार्क से यात्रा शुरू होकर बाटा चौक, मुख्य बाजार, भगत सिंह चौक, अग्रवाल धर्मशाला, काशीपुर बाईपास रोड और अग्रसेन चौक होते हुए वापस गांधी पार्क पहुंचने का कार्यक्रम बताया गया। बैठक में विधायक शिव अरोड़ा, महापौर विकास शर्मा और भाजपा जिलाध्यक्ष कमल कुमार जिंदल सहित अन्य पदाधिकारी मौजूद रहे। इससे पहले बैठक में कार्यक्रम के समापन स्थल को लेकर अलग-अलग सुझाव सामने आने की चर्चा थी। विधायक शिव अरोड़ा की ओर से गांधी पार्क से शुरुआत और गल्ला मंडी में समापन का सुझाव दिए जाने की बात सामने आई, जबकि महापौर विकास शर्मा गांधी पार्क से शुरू होकर गांधी पार्क में ही कार्यक्रम समाप्त करने के पक्ष में बताए गए। हालांकि संबंधित नेताओं ने किसी विवाद से इनकार करते हुए इसे सामान्य विचार-विमर्श बताया। लेकिन राजनीतिक सवाल यह है कि जब विधानसभा क्षेत्र का निर्वाचित विधायक कार्यक्रम की जिम्मेदारी संभाल रहा है तो उसके सुझावों और भूमिका को कितना महत्व मिलना चाहिए? महापौर की जिम्मेदारी नगर क्षेत्र से जुड़ी है और विधायक की जिम्मेदारी विधानसभा क्षेत्र के राजनीतिक नेतृत्व से। दोनों के बीच समन्वय ही संगठन की मजबूती का आधार होना चाहिए। ऐसे में एक सामान्य कार्यक्रम के स्वरूप को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं होना रुद्रपुर भाजपा की अंदरूनी परिस्थितियों को दर्शाता है।
जातीय समीकरण से अधिक महत्वपूर्ण होगी व्यक्तिगत राजनीतिक पहचान!
रुद्रपुर विधानसभा में जातीय समीकरणों को लेकर भी समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं। कुछ नेता स्थानीय और जातीय पहचान के आधार पर अपनी दावेदारी मजबूत करने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन केवल किसी एक समुदाय का समर्थन चुनावी सफलता की गारंटी नहीं हो सकता। रुद्रपुर की राजनीति में व्यापारी, श्रमिक, किसान, युवा, पहाड़ी समाज, पूर्वांचली समाज और विभिन्न सामाजिक वर्गों की अपनी भूमिका है। ऐसे में किसी एक जातीय समीकरण को निर्णायक मान लेना जल्दबाजी होगी। भाजपा के भीतर 2027 में टिकट को लेकर यदि दावेदार सामने आते हैं तो पार्टी संगठन, मौजूदा विधायक का कामकाज, जनसंपर्क, राजनीतिक समीकरण और चुनावी परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण होंगी। फिलहाल स्थानीय स्तर पर विधायक शिव अरोड़ा को लेकर चर्चा का केंद्र उनकी मौजूदा राजनीतिक स्थिति है, जबकि विकास शर्मा और राजकुमार ठुकराल की नजदीकियों ने एक अलग बहस शुरू कर दी है।
धामी का सानिध्य और विकास शर्मा की लंबी राजनीतिक पारी!
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ महापौर विकास शर्मा की राजनीतिक निकटता भी उनके समर्थकों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। मुख्यमंत्री के नेतृत्व में प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहना और स्थानीय स्तर पर अपनी भूमिका बढ़ाना किसी भी जनप्रतिनिधि के लिए अवसर पैदा कर सकता है। लेकिन मुख्यमंत्री का सानिध्य अपने आप विधानसभा टिकट की गारंटी नहीं होता। भाजपा में टिकट का फैसला प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व, संगठनात्मक समीकरणों और चुनावी परिस्थितियों के आधार पर होता है। विकास शर्मा के सामने भी सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह महापौर के रूप में अपने कार्यकाल में जनता के बीच कितनी स्थायी स्वीकार्यता बना पाते हैं। राजनीतिक पहचान केवल नेताओं की नजदीकियों से नहीं बनती, बल्कि जनता के बीच व्यवहार, विकास कार्यों और उपलब्धता से बनती है। यदि जनता के बीच उनकी कार्यशैली को लेकर सवाल उठते हैं तो उन्हें उनका जवाब भी देना होगा। वहीं विधायक शिव अरोड़ा के सामने अपनी राजनीतिक जमीन और संगठनात्मक समन्वय को मजबूत रखने की चुनौती है।
2027 की लड़ाई, 2031 की तैयारी और रुद्रपुर की सियासी बादशाहत!
इस पूरे घटनाक्रम को जोड़कर देखें तो रुद्रपुर की राजनीति में तीन अलग-अलग राजनीतिक भूमिकाएं चर्चा में हैं। एक तरफ मौजूदा विधायक शिव अरोड़ा हैं, दूसरी तरफ महापौर विकास शर्मा हैं और तीसरी तरफ पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल हैं। इन तीनों की राजनीतिक गतिविधियां आने वाले समय में रुद्रपुर के समीकरणों को प्रभावित कर सकती हैं। यदि 2027 में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनती है तो भी विकास शर्मा की व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा का सवाल अपनी जगह बना रहेगा। महापौर का कार्यकाल और नगर निगम की जिम्मेदारियां अलग हैं, जबकि विधानसभा की राजनीति में भविष्य की दावेदारी अलग विषय है। इसलिए यह मानना जल्दबाजी होगी कि उनकी पूरी राजनीति केवल 2027 के परिणाम पर निर्भर है। संभव है कि वह अभी से अपनी राजनीतिक पहचान को मजबूत करने में लगे हों और 2031 को भविष्य के अवसर के रूप में देखते हों। दूसरी ओर शिव अरोड़ा के लिए भी यह समय अपनी राजनीतिक और संगठनात्मक भूमिका को साबित करने का है। राजकुमार ठुकराल की अगली राजनीतिक भूमिका भी आने वाले समय में स्थानीय समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।
रुद्रपुर में फिलहाल राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र यही है कि विकास शर्मा की नजर विधानसभा के टिकट पर है या उससे आगे की लंबी राजनीतिक पारी पर। क्या 2027 में वह अपनी दावेदारी पेश करेंगे? क्या टिकट नहीं मिलने की स्थिति में भी वह 2031 तक अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करते रहेंगे? क्या राजकुमार ठुकराल के साथ उनकी नजदीकियां सामान्य राजनीतिक मेलजोल हैं या भविष्य के समीकरणों का हिस्सा? और क्या विधायक शिव अरोड़ा के साथ उनके संबंध आने वाले दिनों में सामान्य रहेंगे?
इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन एक बात साफ है कि रुद्रपुर की राजनीति में अब केवल वर्तमान विधायक और महापौर की भूमिका की चर्चा नहीं हो रही, बल्कि भविष्य के राजनीतिक नेतृत्व को लेकर भी अटकलें शुरू हो चुकी हैं।
कहते हैं राजनीति में एक तीर से कई निशाने साधे जाते हैं। रुद्रपुर में मिशन 2027 की तैयारी के बीच 2031 की राजनीतिक बिसात की चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं। अब देखना यह है कि विकास शर्मा की लंबी राजनीतिक पारी की संभावनाएं किस दिशा में आगे बढ़ती हैं, शिव अरोड़ा अपनी राजनीतिक जमीन को किस तरह मजबूत रखते हैं और राजकुमार ठुकराल की भूमिका आने वाले चुनाव में क्या रंग दिखाती है। फिलहाल रुद्रपुर की सियासत में दोस्ती, महत्वाकांक्षा, वर्चस्व और भविष्य की राजनीति की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | अवतार सिंह बिष्ट, उत्तराखंड देश-दुनिया की खबरों पर नजर