रुद्रपुर मेट्रोपोलिस सिटी,हिसाब-किताब को लेकर बैठक में गरमाया माहौल, क्लब के बाहर भुगतान के लिए धरने पर बैठे ठेकेदार; जिलाधिकारी से लेकर जनप्रतिनिधियों तक गुहार के बाद भी आश्वासन ही मिलने का आरोप
रुद्रपुर। शहर की प्रतिष्ठित मेट्रोपोलिस सोसाइटी में ठेकेदारों के भुगतान को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। ठेकेदारों ने सोसाइटी प्रबंधन पर अनुबंध की शर्तों के अनुरूप भुगतान रोकने, कार्य के लिए परिसर में लाई गई मशीनरी और सामग्री को वापस ले जाने में बाधा डालने तथा गेट पास के नाम पर उन्हें लगातार टरकाने के गंभीर आरोप लगाए हैं। ठेकेदारों का दावा है कि उनका लगभग आधा करोड़ रुपये का भुगतान लंबे समय से अटका हुआ है। इसके साथ ही किराये पर ली गई मशीनों का किराया लगातार बढ़ रहा है, जिससे उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
रविवार को मेट्रोपोलिस के क्लब परिसर में सोसाइटी की बैठक के दौरान भुगतान और हिसाब-किताब को लेकर माहौल गर्म हो गया। हाउसिंग क्लब मेट्रोपोलिस सिटी बैठक के भीतर पदाधिकारियों निवासियों के बीच वित्तीय मामलों को लेकर तीखी बहस की स्थिति बनी रही। दूसरी ओर भुगतान की मांग कर रहे ठेकेदार क्लब के बाहर धरने पर बैठे रहे। ठेकेदारों का कहना है कि वे लंबे समय से अपने भुगतान के लिए सोसाइटी के चक्कर काट रहे हैं, मगर हर बार उन्हें आश्वासन देकर वापस भेज दिया जाता है।
अनुबंध हुए, काम हुआ, भुगतान पर विवाद
ठेकेदारों द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों के अनुसार मेट्रोपोलिस रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन और श्री गणेश एंड कंपनी के बीच रिपेयर एवं रिपेंटिंग कार्य को लेकर बाकायदा लिखित समझौता और वर्क ऑर्डर जारी किया गया था।
17 जुलाई 2025 को तैयार समझौते में टावर B2-1 के बाहरी पेंटिंग एवं सिविल रिपेयरिंग कार्य का उल्लेख है। वर्क ऑर्डर में बाहरी क्षेत्र की पेंटिंग के लिए 38,080 वर्गफुट क्षेत्र और ₹7.70 प्रति वर्गफुट की दर दर्ज है। सिविल रिपेयरिंग के लिए ₹35.50 प्रति वर्गफुट की दर का उल्लेख किया गया है। दस्तावेज में कुल राशि ₹4,28,400 दर्ज है।
समझौते में सतह की सफाई, सतह की तैयारी, मामूली मरम्मत, एक कोट प्राइमर और दो कोट एक्सटीरियर इमल्शन पेंट सहित सिविल रिपेयरिंग कार्य शामिल किया गया है। एमएस ग्रिल की पेंटिंग और संबंधित सामग्री भी कार्य का हिस्सा बताई गई है।
अनुबंध में भुगतान चार चरणों में करने की शर्त रखी गई थी। 25 प्रतिशत राशि कार्यादेश और अग्रिम के समय, 25 प्रतिशत सिविल कार्य पूरा होने के बाद, 25 प्रतिशत प्राइमर कोट पूरा होने के बाद तथा शेष 25 प्रतिशत अंतिम पेंट कोट पूरा होने के बाद भुगतान किया जाना था।
ठेकेदारों का आरोप है कि काम पूरा करने के बाद भी निर्धारित भुगतान व्यवस्था के अनुरूप उनका हिसाब पूरी तरह से नहीं किया गया।
ब्लॉक ए से एच तक अलग-अलग अनुबंधों का हवाला
ठेकेदारों की ओर से उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों में मेट्रोपोलिस के अलग-अलग ब्लॉकों के लिए भी कार्य और अनुमानित राशि का उल्लेख है। दस्तावेज के अनुसार ब्लॉक ए-यूनिट 1 के लिए ₹4,15,800, ब्लॉक बी-यूनिट 1 के लिए ₹4,28,400, ब्लॉक सी-यूनिट 1 के लिए ₹4,93,200, ब्लॉक डी-यूनिट 1 के लिए ₹6,40,800 तथा ब्लॉक एच-यूनिट 1 के लिए ₹3,13,200 की राशि दर्ज है।
इनके साथ बालकनी ग्रिल के कार्य के लिए अलग-अलग राशि का भी उल्लेख किया गया है। अनुबंध में यह व्यवस्था भी दर्ज है कि अंतिम बिल वास्तविक रूप से किए गए कार्य की माप के आधार पर तैयार किया जाएगा।
ठेकेदारों का कहना है कि इन अनुबंधों और कार्यादेशों के आधार पर उन्होंने सामग्री, श्रमिक और मशीनरी लगाकर काम कराया। अब भुगतान को लेकर सोसाइटी प्रबंधन और ठेकेदारों के बीच विवाद खड़ा हो गया है।
मशीनें और सामग्री परिसर में फंसी होने का आरोप
ठेकेदारों का सबसे गंभीर आरोप यह है कि पेंटिंग और सिविल कार्य के लिए मेट्रोपोलिस परिसर में लाई गई उनकी मशीनरी और अन्य सामग्री भी परिसर में ही पड़ी है। उनका कहना है कि मशीनें उन्होंने किराये पर ली थीं और भुगतान रुकने के कारण मशीनों का किराया लगातार बढ़ता जा रहा है।
ठेकेदारों के मुताबिक मशीनों और सामग्री को बाहर ले जाने के लिए जब वे सोसाइटी प्रबंधन से संपर्क करते हैं तो गेट पास की प्रक्रिया का हवाला देकर उन्हें रोक दिया जाता है। ठेकेदारों का कहना है कि उनके पास कार्य से संबंधित अनुबंध और वर्क ऑर्डर मौजूद हैं, फिर भी अपनी मशीनरी और सामग्री वापस ले जाने के लिए उन्हें लगातार चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
ठेकेदारों ने आरोप लगाया कि सोसाइटी परिसर में तैनात सुरक्षा कर्मियों और बाउंसरों के व्यवहार को लेकर भी उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उनके अनुसार भुगतान की मांग करने पर दबाव बनाने और डराने-धमकाने जैसी स्थिति पैदा की जाती है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल शेष है।
जिलाधिकारी से विधायक तक गुहार, आश्वासन ही मिलने का दावा
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स से बातचीत में ठेकेदारों ने कहा कि वे अपनी समस्या को लेकर जिलाधिकारी, तहसील स्तर के अधिकारियों, सोसाइटी के पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों तक अपनी बात पहुंचा चुके हैं। उनका कहना है कि उन्होंने क्षेत्रीय विधायक और अन्य जनप्रतिनिधियों से भी मदद की गुहार लगाई है।
ठेकेदारों के अनुसार हर स्तर से समस्या के समाधान का आश्वासन मिला, मगर वास्तविक भुगतान और मशीनरी वापस मिलने के मामले में अभी तक उन्हें अपेक्षित राहत प्राप्त नहीं हुई है।
ठेकेदारों ने सवाल उठाया कि यदि किसी कार्य के लिए विधिवत अनुबंध किया गया, काम कराया गया और उसके लिए ठेकेदारों ने अपनी पूंजी लगाई तो भुगतान को लेकर महीनों तक विवाद की स्थिति क्यों बनी हुई है।
पुरानी और नई कार्यकारिणी के बीच फंसा भुगतान
विवाद का एक बड़ा पहलू सोसाइटी की पुरानी और नई कार्यकारिणी के बीच जिम्मेदारी को लेकर सामने आ रहा है।
ठेकेदारों के अनुसार पूर्व कार्यकारिणी में अध्यक्ष देवेंद्र शाही और उपाध्यक्ष विक्रांत फूटेला पद पर थे। कुछ माह पहले नई कार्यकारिणी का गठन हुआ, जिसमें अध्यक्ष पद पर पटवाल और उपाध्यक्ष पद पर पीयूष भाटिया के आने की बात कही जा रही है।
ठेकेदारों का आरोप है कि पुरानी कार्यकारिणी अब अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने को तैयार दिखाई देती है और नई कार्यकारिणी पूर्व कार्यकाल के भुगतान को लेकर जिम्मेदारी लेने से बच रही है। दूसरी ओर नई कार्यकारिणी की ओर से भुगतान नहीं किए जाने के कारण ठेकेदार खुद को दो कार्यकारिणियों के बीच फंसा हुआ बता रहे हैं।
ठेकेदारों का कहना है कि जिस समय उन्होंने काम किया, उस समय सोसाइटी की अलग कार्यकारिणी थी। अब कार्यकारिणी बदल गई है और भुगतान का मुद्दा पुरानी तथा नई व्यवस्था के बीच उलझ गया है। इसका सीधा असर उन ठेकेदारों पर पड़ रहा है जिन्होंने काम में अपनी पूंजी और मशीनरी लगाई।
आज की बैठक ने बढ़ाई गर्मी
रविवार को मेट्रोपोलिस क्लब में सोसाइटी की बैठक के दौरान भुगतान और हिसाब-किताब का मुद्दा गर्माया। बैठक के दौरान आपसी बहस और गर्मागर्मी की स्थिति बनी रहने की बात सामने आई।
उधर, क्लब के बाहर भुगतान की मांग को लेकर ठेकेदार धरने पर बैठे रहे। ठेकेदारों का कहना था कि जब तक उनके बकाये का स्पष्ट हिसाब और भुगतान की दिशा में ठोस निर्णय सामने नहीं आता, तब तक उनका संकट बना रहेगा।
ठेकेदारों का दावा है कि सभी संबंधित पक्षों से संपर्क करने के बाद भी समाधान की स्थिति सामने नहीं आई है।
सवाल सोसाइटी प्रबंधन से भी
पूरा मामला कई गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि ठेकेदारों के साथ लिखित अनुबंध और वर्क ऑर्डर हुए हैं तो भुगतान की जिम्मेदारी किसकी है? पुराने अनुबंधों का भुगतान नई कार्यकारिणी किस प्रक्रिया के तहत करेगी? कार्य के लिए परिसर में लाई गई मशीनरी और सामग्री को बाहर ले जाने की अनुमति किस नियम के तहत रोकी जा रही है? किराये की मशीनों का लगातार बढ़ रहा किराया कौन वहन करेगा? और यदि ठेकेदारों के आरोप गलत हैं तो सोसाइटी प्रबंधन की ओर से उनके दावों का दस्तावेजी जवाब कब सामने आएगा?
इन सवालों के जवाब सामने आना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि मामला केवल ठेकेदार और सोसाइटी के बीच भुगतान विवाद तक सीमित दिखाई नहीं दे रहा, इसमें अनुबंध, कार्य की वास्तविक माप, भुगतान की जिम्मेदारी, मशीनरी और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दे भी जुड़े हुए हैं।
ठेकेदारों की सरकार से गुहार
ठेकेदारों ने जिला प्रशासन और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार से मामले में निष्पक्ष हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि वे किसी विवाद को बढ़ाना नहीं चाहते। उनकी मांग केवल किए गए कार्य का अनुबंध के अनुसार हिसाब, वैध बकाया भुगतान और अपनी मशीनरी एवं सामग्री को सुरक्षित रूप से वापस प्राप्त करना है।
ठेकेदारों ने कहा कि उन्होंने अपनी ओर से अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और सोसाइटी प्रबंधन के सामने लगातार अपनी बात रखी है। यदि जल्द समाधान की ठोस प्रक्रिया शुरू नहीं हुई तो उनके सामने आर्थिक संकट और बढ़ सकता है।
(मेट्रोपोलिस सिटी की नई कार्यकारिणी पर निवासियों ने गंभीर आरोप लगाते हुए कार्यप्रणाली, अनुबंधों, भुगतान और सोसाइटी की संपत्ति से जुड़े मामलों में पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं। मामले ने तूल पकड़ लिया है। अगली खबर में खुलेंगे कई चौंकाने वाले राज और सामने आएंगे दस्तावेजों से जुड़े अहम तथ्य।!!)
फिलहाल मेट्रोपोलिस में ठेकेदारों के भुगतान का विवाद गर्माया हुआ है। एक ओर सोसाइटी की नई कार्यकारिणी और पूर्व कार्यकारिणी के बीच जिम्मेदारी को लेकर सवाल हैं, वहीं दूसरी ओर ठेकेदार अपने बकाये, मशीनरी और सामग्री को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। अब निगाह जिला प्रशासन और सोसाइटी प्रबंधन की ओर है कि इस पूरे मामले में दस्तावेजों के आधार पर क्या स्थिति स्पष्ट की जाती है और ठेकेदारों को कब तक राहत मिलती है।
