65 पदों में 60 हरियाणा के अभ्यर्थियों के चयन का दावा, स्थानीय युवा पूछ रहे सवाल—धामी सरकार की उपलब्धियों में पहाड़ के बेरोजगारों का नंबर कब आएगा?
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | रुद्रपुर।
उत्तराखंड में रोजगार, पलायन रोकने और युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के दावे लगातार सुनाई देते हैं। सरकारी मंचों से रोजगार मेलों, निवेश और युवाओं के भविष्य की योजनाओं की चर्चा भी होती है। लेकिन पिथौरागढ़ में ग्रामीण डाक सेवक (जीडीएस) भर्ती को लेकर सामने आए आंकड़ों ने इन दावों के सामने कुछ असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय स्तर पर दावा किया जा रहा है कि जिले में 65 पदों में से 60 पर हरियाणा के अभ्यर्थियों का चयन हुआ है। इनमें 50 अभ्यर्थियों के हाईस्कूल में 100 प्रतिशत अंक होने की बात कही जा रही है। यदि ये आंकड़े आधिकारिक रिकॉर्ड से पुष्ट होते हैं, तो भर्ती व्यवस्था और स्थानीय युवाओं को मिलने वाले अवसरों पर गंभीर चर्चा जरूरी है।
अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर
रोजगार के दावे बनाम पहाड़ के युवाओं की उम्मीदें
उत्तराखंड का युवा अपने ही प्रदेश में रोजगार की उम्मीद करता है। पहाड़ के गांवों से पलायन, सीमित निजी रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं की लंबी तैयारी के बीच सरकारी नौकरी अनेक परिवारों के लिए भविष्य की सुरक्षा मानी जाती है। ऐसे में जब किसी जिले के अधिकांश पदों पर दूसरे राज्य के अभ्यर्थियों के चयन की खबर सामने आती है, तो स्थानीय युवाओं के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।
यहीं से बीजेपी सरकार की रोजगार संबंधी उपलब्धियों को लेकर राजनीतिक कटाक्ष का अवसर भी पैदा होता है। सवाल यह है कि यदि उत्तराखंड के युवाओं को रोजगार देने की योजनाएं इतनी प्रभावी हैं, तो उनके लाभ और भर्ती के अवसरों का वास्तविक हिसाब जनता के सामने क्यों नहीं रखा जाता? रोजगार के दावों की चमक के बीच पहाड़ के बेरोजगार युवाओं की चिंता को भी उतनी ही गंभीरता से सुनना होगा।
मेरिट में सौ प्रतिशत अंक, फिर उठ रहे सवाल क्यों?
ग्रामीण डाक सेवक भर्ती में सामान्यतः दसवीं कक्षा के अंकों के आधार पर मेरिट तैयार की जाती है। इस व्यवस्था में लिखित प्रतियोगी परीक्षा के बजाय बोर्ड के अंकों की अहम भूमिका रहती है। पिथौरागढ़ में चयन को लेकर उठे सवाल इसी व्यवस्था से जुड़े हैं।
स्थानीय लोगों का दावा है कि लगभग दो महीने पहले जिले में 51 पदों की भर्ती प्रक्रिया के दौरान 31 पदों पर चयन हुआ था, जिनमें 28 अभ्यर्थी हरियाणा के बताए जा रहे हैं। अब 65 पदों में से 60 पर हरियाणा के अभ्यर्थियों के चयन की चर्चा ने असंतोष बढ़ा दिया है।
हालांकि, केवल दूसरे राज्य के अभ्यर्थियों के चयन को अनियमितता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। यदि भर्ती के नियम पूरे देश के अभ्यर्थियों को आवेदन का अवसर देते हैं, तो चयन निर्धारित मेरिट के अनुसार ही होना चाहिए। लेकिन जब असाधारण रूप से बड़ी संख्या में शत-प्रतिशत अंक वाले अभ्यर्थी सामने आते हैं, तो अंकों के सत्यापन और चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवालों का जवाब देना संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है।
कोरोना काल के अंकों पर भी होनी चाहिए स्पष्टता
कोरोना महामारी के दौरान शिक्षा व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई थी। अलग-अलग राज्यों में परीक्षाओं, मूल्यांकन और परिणाम घोषित करने की प्रक्रियाओं में बदलाव किए गए थे। इसी पृष्ठभूमि में यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या उस समय घोषित बोर्ड परिणामों का वर्तमान भर्ती प्रक्रिया पर कोई प्रभाव पड़ा है।
लेकिन यह मान लेना उचित नहीं होगा कि हरियाणा के सभी चयनित अभ्यर्थियों को बिना परीक्षा के ही सौ प्रतिशत अंक मिले थे। इस दावे की पुष्टि संबंधित बोर्ड के रिकॉर्ड, परीक्षा वर्ष और मूल्यांकन पद्धति से ही हो सकती है। यदि किसी भी अभ्यर्थी के अंकों या प्रमाणपत्रों पर संदेह है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। जांच का आधार राज्य की पहचान नहीं, बल्कि दस्तावेज और निर्धारित नियम होने चाहिए।
हिंदी में काम करने की कठिनाई का दावा भी जांच के दायरे में आए
स्थानीय स्तर पर यह भी कहा जा रहा है कि कुछ चयनित ग्रामीण डाक सेवकों को हिंदी में सरकारी कामकाज करने में कठिनाई होती है, जबकि उनके दसवीं के परिणाम में हिंदी विषय में अच्छे अंक दर्ज हैं। यदि यह शिकायत सही है, तो विभाग को संबंधित कर्मचारियों की कार्यक्षमता, प्रशिक्षण और भाषा संबंधी आवश्यकताओं की समीक्षा करनी चाहिए।
हालांकि, किसी कर्मचारी की भाषा संबंधी क्षमता पर लगाए गए आरोपों को प्रमाण के बिना तथ्य नहीं माना जा सकता। विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि नियुक्ति के समय कौन-सी योग्यताएं निर्धारित थीं, प्रमाणपत्रों का सत्यापन कैसे किया गया और कार्यस्थल पर कर्मचारियों को क्या प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
धामी सरकार से सवाल—उपलब्धियों का लाभ स्थानीय युवाओं तक कब?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार के सामने रोजगार और पलायन उत्तराखंड के महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। सरकार अपनी योजनाओं और रोजगार संबंधी प्रयासों को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती है। ऐसे में पिथौरागढ़ की भर्ती को लेकर उठे सवालों का तथ्यात्मक जवाब देना भी आवश्यक है।
राजनीतिक कटाक्ष यही है कि रोजगार के मंचों पर घोषणाओं और उपलब्धियों का बखान तो होता है, लेकिन जब स्थानीय युवा भर्ती के नतीजों को लेकर सवाल पूछते हैं, तो उन्हें स्पष्ट आंकड़े और संतोषजनक जवाब भी मिलने चाहिए। क्या पहाड़ का युवा केवल रोजगार के वादे सुनने के लिए है, या उसे भर्ती व्यवस्था की पारदर्शिता और समान अवसरों का भरोसा भी मिलेगा?
यह भी ध्यान रखना होगा कि यदि भर्ती अखिल भारतीय नियमों के तहत होती है, तो किसी दूसरे राज्य के अभ्यर्थियों को केवल उनके मूल निवास के कारण बाहर करने की मांग उचित नहीं होगी। समाधान स्थानीय युवाओं के लिए बेहतर शिक्षा, प्रतियोगी तैयारी, कौशल विकास और रोजगार के अतिरिक्त अवसर तैयार करने के साथ-साथ भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करने में है।
जांच हो, आंकड़े सार्वजनिक हों
इस मामले में डाक विभाग को चयनित अभ्यर्थियों की आधिकारिक सूची, प्राप्त अंकों, संबंधित बोर्ड के सत्यापन और नियुक्ति संबंधी नियमों की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। यह भी बताया जाना चाहिए कि पिथौरागढ़ में कुल कितने पद थे, कितने पदों पर चयन पूरा हुआ और चयनित अभ्यर्थियों का राज्यवार विवरण क्या है।
लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना विरोध नहीं, जवाबदेही की मांग है। उत्तराखंड के युवाओं को आश्वासन से आगे बढ़कर पारदर्शी भर्ती व्यवस्था और रोजगार के ठोस अवसर चाहिए। बीजेपी सरकार की उपलब्धियों का वास्तविक आकलन भी इसी आधार पर होना चाहिए कि योजनाओं का लाभ जमीन पर कितना पहुंचा और बेरोजगार युवाओं की समस्याओं का समाधान कितना हुआ।
फिलहाल पिथौरागढ़ के जीडीएस भर्ती परिणामों को लेकर उठे दावों की आधिकारिक पुष्टि और निष्पक्ष जांच जरूरी है। जब तक तथ्य सामने नहीं आते, किसी भी तरह की गड़बड़ी का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। लेकिन स्थानीय युवाओं के सवालों को अनसुना करना भी उचित नहीं होगा।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
