संपादकीय | सत्ता, नौकरशाही और जनता के विश्वास के बीच खड़ा उत्तराखंड
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | अवतार सिंह बिष्ट, रुद्रपुर
उत्तराखंड राज्य का गठन जिन सपनों के साथ हुआ था, उनमें रोजगार, पारदर्शी शासन, भ्रष्टाचार से मुक्ति, पहाड़ों का विकास और आम आदमी को न्याय दिलाना प्रमुख था। आंदोलनकारियों ने अपना घर-परिवार छोड़ा, सड़कों पर संघर्ष किया, लाठियां खाईं और अलग राज्य के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगाया। सवाल यह है कि जिस उत्तराखंड को जनता ने अपने संघर्ष से हासिल किया, उसमें सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों की जवाबदेही आज भी इतनी कमजोर क्यों दिखाई देती है?
अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर
कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य और उनके पति गिरधारी लाल साहू के बीच सामने आए विवाद ने उत्तराखंड की राजनीति में गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ मंत्री ने अपने पति के खिलाफ उत्पीड़न, मारपीट, धमकी और कथित फर्जी दस्तावेजों से जुड़े आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज कराया है। दूसरी तरफ उनके पति ने मंत्री पर लगभग 210 करोड़ रुपये की कथित अवैध संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगाते हुए जांच की मांग की है। ये आरोप हैं, प्रमाणित निष्कर्ष नहीं। मंत्री ने भ्रष्टाचार के आरोपों को निराधार बताया है और जांच का सामना करने की बात कही है। ऐसे में अब सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निष्पक्ष जांच की है।
एसआईटी की जांच में तेजी कब आएगी?
21 अक्टूबर को सामने आई जानकारी के अनुसार, मंत्री रेखा आर्य का बयान दर्ज किया जा चुका है। जांच अधिकारी डिप्टी एसपी जया बलूनी ने बताया कि मंत्री की ओर से फेसबुक पर साझा की गई ऑडियो क्लिप को भी जांच में शामिल किया गया है। बरेली गई टीम को कुछ दस्तावेजों की फोटोकॉपी मिली है, जबकि मूल दस्तावेज हासिल करने और कथित फर्जी दस्तावेजों का सत्यापन करने की प्रक्रिया जारी है।
यह कार्रवाई जांच का हिस्सा है, लेकिन जनता के मन में सवाल हैं। ऑडियो की फोरेंसिक जांच कब पूरी होगी? दस्तावेजों की प्रमाणिकता कौन तय करेगा? कथित संपत्ति के स्रोत की जांच कौन करेगा? क्या बैंक खातों, जमीनों, कंपनियों, आयकर रिकॉर्ड और घोषित संपत्तियों का स्वतंत्र परीक्षण होगा? क्या जांच में सामने आने वाले तथ्यों को सार्वजनिक किया जाएगा?
इन सवालों के जवाब जरूरी हैं। केवल बयान दर्ज करने और कागजात जुटाने से जनता का संदेह दूर नहीं होगा। जांच को निष्कर्ष तक पहुंचना चाहिए। हालांकि, निष्पक्ष जांच के लिए समय, साक्ष्य और कानूनी प्रक्रिया आवश्यक हैं, इसलिए बिना आधिकारिक समयसीमा के जांच पूरी होने की तारीख बताना भी उचित नहीं होगा।
210 करोड़ रुपये का आरोप: सच सामने आना चाहिए
210 करोड़ रुपये की कथित संपत्ति का आरोप छोटा मामला नहीं है। यदि आरोप लगाने वाले के पास दस्तावेज, संपत्ति का विवरण या वित्तीय लेन-देन से जुड़े प्रमाण हैं, तो उन्हें सक्षम जांच एजेंसी के सामने प्रस्तुत करना चाहिए। यदि आरोप गलत हैं, तो जांच से यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि सार्वजनिक जीवन में किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के लिए निराधार आरोप तो नहीं लगाए गए।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और राज्य सरकार के सामने यह अवसर है कि वे राजनीतिक पक्षधरता से ऊपर उठकर निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करें। किसी मंत्री पर आरोप लगने मात्र से उसे दोषी नहीं माना जा सकता। इसी तरह किसी प्रभावशाली पद पर बैठे व्यक्ति को केवल उसके पद के कारण जांच से छूट भी नहीं मिलनी चाहिए।
सवाल यह भी है कि कथित 210 करोड़ रुपये की संपत्ति का आकलन किस आधार पर किया गया है। क्या यह बाजार मूल्य है, कुल संपत्ति का अनुमान है या कथित अवैध कमाई का दावा? इन तीनों में अंतर है। जांच एजेंसी को इस अंतर को स्पष्ट करना होगा। फिलहाल इस रकम को सिद्ध घोटाला कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
रेखा आर्य की शिकायत की भी निष्पक्ष जांच हो
इस पूरे विवाद में मंत्री रेखा आर्य की शिकायत को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यदि उन्होंने अपने पति के खिलाफ उत्पीड़न, धमकी और कथित जालसाजी की शिकायत दर्ज कराई है, तो पुलिस को उस पर कानून के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए। किसी महिला की शिकायत को केवल राजनीतिक विवाद मानकर खारिज करना गलत होगा।
यह भी उल्लेखनीय है कि मंत्री ने अपने पति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग करके मामले को सार्वजनिक जांच के दायरे में लाने का रास्ता चुना है। उनके इस कदम का मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। साथ ही, यदि पति के पास कथित भ्रष्टाचार से संबंधित ठोस साक्ष्य हैं, तो उन्हें सामने लाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। भ्रष्टाचार उजागर करने का दावा करने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी भी है कि वह प्रमाण प्रस्तुत करे।
निजी रिश्तों का विवाद अपनी जगह है, लेकिन जब उसमें सार्वजनिक पद, सरकारी विभागों और करोड़ों रुपये की कथित संपत्ति के सवाल जुड़ जाएं, तो मामला केवल पारिवारिक विवाद तक सीमित नहीं रह जाता। जनता को निष्पक्ष जांच चाहिए, किसी पक्ष की जीत या हार का राजनीतिक तमाशा नहीं।
राज्य बनने के बाद किसका विकास हुआ?
उत्तराखंड आंदोलन के दौरान जनता ने कल्पना की थी कि अलग राज्य बनने के बाद स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा, गांवों से पलायन रुकेगा, पहाड़ों में अस्पताल और स्कूल बेहतर होंगे तथा प्रशासन जनता के प्रति जवाबदेह बनेगा।
आज सवाल उठता है कि विकास का लाभ किसे अधिक मिला? आम नागरिक आज भी रोजगार, महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और जमीन से जुड़े मामलों को लेकर परेशान है। दूसरी ओर राजनीतिक पदों, सरकारी ठेकों, प्रभावशाली संपर्कों और नौकरशाही के गठजोड़ पर लगातार सवाल उठते रहते हैं।
यह कहना उचित नहीं होगा कि हर मंत्री, विधायक, जनप्रतिनिधि या अधिकारी भ्रष्ट है। अनेक लोग ईमानदारी से काम भी करते हैं। लेकिन जहां अनियमितताओं के गंभीर आरोप सामने आएं, वहां जांच और कार्रवाई का स्पष्ट रिकॉर्ड जनता के सामने होना चाहिए। निर्वाचित प्रतिनिधि हों, पंचायत के सदस्य हों या वरिष्ठ अधिकारी—सभी पर कानून और जवाबदेही के समान मानक लागू होने चाहिए।
उत्तराखंड की जनता यह जानना चाहती है कि जिन नेताओं को उसने विकास के लिए चुना, वे उसकी समस्याओं का समाधान कर रहे हैं या सत्ता को निजी प्रभाव बढ़ाने का माध्यम बना रहे हैं।
बुलडोजर न्याय का प्रतीक बने, निजी हितों का हथियार नहीं
राज्य में अतिक्रमण हटाने और अवैध निर्माणों पर कार्रवाई के दौरान एक और बड़ा सवाल उठता है। गरीब या कमजोर व्यक्ति के मकान और प्रतिष्ठान पर कार्रवाई तेजी से होती दिखाई दे, जबकि प्रभावशाली लोगों के मामलों में प्रक्रिया लंबी चले, तो प्रशासन पर पक्षपात का संदेह पैदा होता है।
किसी भी निर्माण के अवैध होने का फैसला कानून, अभिलेख और उचित प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए। प्रभावित व्यक्ति को नोटिस, सुनवाई और उपलब्ध कानूनी उपायों का अवसर मिलना चाहिए। यदि किसी सरकारी जमीन को लीज पर दिया जाता है, तो उसका आधार, शर्तें, लाभार्थी और सार्वजनिक हित स्पष्ट होने चाहिए।
बुलडोजर कानून लागू करने का औजार है, किसी के निजी स्वार्थ की पूर्ति का माध्यम नहीं। कार्रवाई गरीब और अमीर, स्थानीय और बाहरी, सत्ता के करीबी और सामान्य नागरिक—सभी पर एक समान नियमों के अनुसार होनी चाहिए। यदि कहीं पक्षपात या अवैध लाभ पहुंचाने के प्रमाण हैं, तो उनकी भी जांच होनी चाहिए।
दोषी कौन है, सजा किसे मिली?
भ्रष्टाचार के मामलों में सबसे बड़ी समस्या केवल आरोप लगना नहीं, बल्कि जांच का वर्षों तक लंबित रहना और अंतिम परिणाम का जनता तक न पहुंचना है। रेखा आर्य प्रकरण में अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह दावा नहीं किया जा सकता कि कथित 210 करोड़ रुपये के मामले में कोई व्यक्ति दोषी सिद्ध हो चुका है या उसे सजा मिल गई है। इस प्रकरण में जांच के अंतिम निष्कर्ष और न्यायिक निर्णय की प्रतीक्षा करनी होगी।
सरकार को चाहिए कि वह जांच की प्रगति के बारे में समय-समय पर आधिकारिक जानकारी दे। यदि संपत्ति और आय के बीच असंगति मिलती है, तो संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई हो। यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो यह भी स्पष्ट किया जाए। जांच में किसी भी पक्ष को अनुचित संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
राज्य आंदोलनकारियों के सपनों का उत्तर कौन देगा?
उत्तराखंड आंदोलनकारियों ने जिस राज्य की कल्पना की थी, वह ऐसा राज्य था जहां सत्ता जनता की सेवक बने, नौकरशाही जनता की समस्याएं सुने और भ्रष्टाचार करने वाला व्यक्ति अपने पद के कारण बच न सके। आज जरूरत है कि सरकार इस मूल भावना को याद करे।
रेखा आर्य प्रकरण में जांच पूरी होने की तारीख अभी स्पष्ट नहीं है। इसलिए सरकार और पुलिस को अनावश्यक देरी से बचते हुए जांच की समयबद्ध रूपरेखा प्रस्तुत करनी चाहिए। ऑडियो की सत्यता, मूल दस्तावेजों की प्रमाणिकता, कथित संपत्ति के स्रोत और दोनों पक्षों के आरोपों की अलग-अलग जांच होनी चाहिए।
अंतिम सवाल यही है—क्या उत्तराखंड सरकार इस मामले में सच को सामने लाकर कानून का राज स्थापित करेगी, या यह प्रकरण भी आरोप-प्रत्यारोप और लंबी जांच की फाइलों में दबकर रह जाएगा?
उत्तराखंड की जनता को न किसी नेता का अंधसमर्थन चाहिए, न किसी को पहले से दोषी ठहराने की राजनीति। उसे चाहिए निष्पक्ष जांच, प्रमाणों पर आधारित निर्णय और दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार सजा। राज्य आंदोलन की शहादतों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि भी यही होगी कि उत्तराखंड में सत्ता का प्रभाव नहीं, कानून का शासन सर्वोपरि हो।
